खजूर से इतर
यह कहानी मैंने बहुत पहले लिखी थी. शायद सन 2000 में और मन में चल तो यह उसके भी बहुत पहले से रही थी. लेकिन लिखने के बाद भी केवल आलस्यवश मैंने इसे भेजा कहीं नहीं. बहुत दिनों बाद मैंने इसे एक जगह भेजा भी तो लंबे अरसे तक कोई जवाब नहीं आया और न मैंने कोई पूछताछ ही की. फिर पिछले साल इसे भाई फ़ज़ल इमाम मल्लिक ने मांगा तो मैंने उन्हें दे दी. तब यह सनद में छप कर आई. मुझे लगता है अब इसे दुबारा पढ़ा जाना चाहिए. शायद इसे पढ़े जाने के लिए यह एक मुफ़ीद वक़्त है. तो लीजिए आप भी देखिए और अपनी राय भी दीजिए. ...