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Showing posts with the label कूटनीति

आपदाओं के दुष्चक्र में फँस रहा अमेरिका-1

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  इष्ट देव सांकृत्यायन ॥श्रीगुरुचरणकमलेभ्यो नम:॥ गुरु के अतिचारी होने के साथ ही ज्योतिषी बड़े बदलावों की घोषणा करने लगे थे। कोई विश्व व्यवस्था में बदलाव की बात कर रहा है तो कोई प्रलय की। आज की दुनिया में अमेरिका की एक बड़ी हैसियत है। विश्व व्यवस्था में अगर कोई बदलाव होता है तो अमेरिका केंद्रीय भूमिका में न हो , यह हो ही नहीं सकता। यह अलग बात है कि आने वाले समय में वह हाशिये पर चला जाए , पर आज उसकी उपेक्षा करके हम विश्व-व्यवस्था संबंधी किसी भी प्रक्रिया को नहीं देख सकते। इसलिए जरूरी है कि एक बार मेदिनी ज्योतिष की दृष्टि से अमेरिका के प्रारब्ध पर विचार किया जाए। ध्यान रहे , मेदिनी ज्योतिष समष्टि चेतना के विश्लेषण की व्यवस्था है। इसके लिए व्यक्ति नहीं , समूह महत्त्वपूर्ण होता है। वह समूह देश , राज्य , शहर , संगठन या गाँव के रूप में भी हो सकता है। पिछले साल जब अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव चल रहे थे , तब मैंने एक लेख लिखा था। मैंने उसमें चार निष्कर्ष दिए थे – ·         नया राष्ट्रपति जो भी हो , वह अपने फैसले खुद नहीं ले सकेगा। बहुत हद तक संभावना...

गुटनिरपेक्षता की नीति और ईरान का साथ

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  इष्ट देव सांकृत्यायन ईरान और इजराइल के बीच चल रहे युद्ध का मसला अभी हल नहीं हुआ , लेकिन ईरान ने भारत से मिले समर्थन और शांति प्रयासों में भागीदारी के लिए आभार जता दिया। क्या यह एक थोथी औपचारिकता भर है ? इसके पहले कि इस तथ्य का विश्लेषण किया जाए , मैं आपको यह याद दिला देना जरूरी समझता हूँ कि कुछ ही दिनों पूर्व सोनिया गांधी ने ईरान के विरुद्ध होने को लेकर भारत सरकार की भर्त्सना की थी और स्पष्ट शब्दों में कहा था कि भारत की विदेश नीति अब ‘ नॉन एलाइंड ’ से ‘ ऑल एलाइंड ’ हो चुकी है। अपने को ‘ निष्पक्ष ’ बताने वाले कुछ पत्रकार और प्रोफेसर भी किंतु-परंतु के साथ ऐसा ही कुछ कर चुके थे। गाजियाबाद से प्रकाशित दैनिक 'अथाह' में  एक अखबार में तो एक पत्रकार और प्रोफेसर ने मिलकर एक पूरा पन्ना रंग डाला था , यह बताने पर कि ईरान पर हुई बमबारी का दुष्परिणाम भारत को भुगतना पड़ेगा , पछुआ हवाओं के चलते। ये चेरनोबिल बनने जा रहा है। यह अलग बात है कि दोनों को यह पता तक नहीं कि भारत में पछुआ हवाएँ चलती कब हैं और कितने दिन। हाँ , बस ये है कि अखबार का एक पन्ना अपनी बकवास से रंगकर उन्होंने अपनी मोदी व...

जनता का ध्यान भटकाने का खेल

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इष्ट देव सांकृत्यायन   चीन एक ऐसा परोपकारी है जो चश्मा थमाकर आँखें छीन लेता है और चश्मा भी ऐसा जो सिर्फ़ धूप का होता है. कुछ नज़र आए तब तक तो वो अपने शिकार के पास आँखें होने का निशान भी ग़ायब कर देता है. भारत ने नेहरू के हाथ में अपनी कमान सौंपकर सिर्फ गलती की थी. उनके खानदान को सौंपकर ब्लंडर किया. ऐसी गलती जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती. नेपाल की जनता ने कम्युनिस्टों पर कभी भरोसा नहीं किया. उसकी गलती सिर्फ यह है कि राजपरिवार के नरसंहार के बाद उसके पास कोई चारा नहीं बचा. दुर्भाग्य से माओवादियों के इस कुकृत्य में हिस्सेदार ख़ुद राजपरिवार के ही कुछ लोग हुए. इसका अभिप्राय उस युवराज से कतई न लिया जाए जिनके सिर बाद में बेवजह सारा दोष मढ़ा गया. उस वक्त जनता के पास कोई चारा नहीं था. सिवा इसके जो भी तथाकथित लोकतांत्रिक प्रक्रिया घोषित कर देती , उसे ही वह मान लेती. इसी क्रम में चीन के पोषित कम्युनिस्टों ने जबरिया नेपाल पर कब्जा कर लिया. चीन ने वहाँ एक झूठमूठ की सत्ता सौंपी नेपाली कम्युनिस्टों को और परदे के पीछे से चलाता वह खुद रहा. बीते करीब दो दशकों से चीन लगातार नेपाल की व्यवस्था को अरा...

युद्ध में नहीं बदलेगा तनाव

इष्ट देव सांकृत्यायन भारत चीन सीमा पर तनाव को लेकर कुछ लोग युद्ध की आशंका से अभी चिंतित होने लगे हैं। स्वाभाविक है। बात केवल युद्ध की नहीं , उसके बाद बनने वाले हालात की होती है। इसका अंदाजा दोनों देशों को है। आशंका यह है कि अगर यह युद्ध शुरू हुआ तो केवल भारत चीन तक सीमित नहीं रहेगा। यह अंततः विश्वयुद्ध में बदल जाएगा। यह आशंका गलत नहीं है। युद्ध हुआ तो वाकई विश्वयुद्ध में बदलेगा। अमेरिका , इजरायल , आस्ट्रेलिया , फ्रांस जैसे बड़े पहलवान अभी से कमर कसने लगे हैं और सब भारत की ओर अखाड़े में कूद चुके हैं। कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों के भारत के अनन्य टाइप मित्र देशों में एक रूस भी शामिल है। पहलवानों में बस एक वही है जो तटस्थ रहेगा। तटस्थ रहने का मतलब हम जानते हैं। भारत का अनन्य मित्र ६२ में भी तटस्थ रहा था। उस तटस्थता में इसने पूरी बेशर्मी के साथ युद्ध के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया था और साथ ही इस युद्ध को भाई और दोस्त के बीच बताया था। इसमें भाई उसके लिए चीन था और दोस्त भारत। अब भी जो लोग रूस को लेकर भ्रम में हों , उन्हें उसकी नई तटस्थता से समझ लेना चाहिए। उधर कांग्रेस और कम्यूनि...

मैं क्यों नहीं लेता चीनी सामान

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इष्ट देव सांकृत्यायन  चीनी सामान खरीदने से मेरा परहेज कोई नया नहीं , बहुत पुराना है. और यह किसी राष्ट्रवाद की नहीं , बल्कि चीनी माल की समझ के नाते है. इसकी भी अपनी एक कहानी है और इस कहानी में समय के साथ कई आयाम जुड़ते चले गए. मैं जिस क्षेत्र से हूँ , वह नेपाल की सीमा से बिलकुल सटे है. नेपाल का सबसे मशहूर सीमावर्ती बाज़ार मेरे गाँव से बमुश्किल 50 किलोमीटर की दूरी पर है. उन दिनों लड़के आम तौर पर साइकिल से चले जाते थे. यह केवल लड़कों की ही बात नहीं है , साइकिल से ही और भी बहुत कुछ होता था और उसकी खबरें तो अखबारों में कम छपती थीं , पर कस्टम में तैनात सिपाही तक साल भर में लखपति बन जाते थे. बॉर्डर के आसपास के पुलिस वालों पर भी लक्ष्मी जी की कृपा ऐसे ही अपरंपार होती थी. गोरखपुर से सोनौली वाले रोड पर कहीं भी पोस्टिंग पाने के लिए पुलिस और कस्टम विभाग में निरंतर एक से एक उद्यम चलते रहते थे. हालांकि तब मुझे इन उद्यमों का कुछ पता नहीं था. इसकी वजह थी. तब भारत उदारीकृत नहीं हुआ था. हमारी अपनी तकनीक ऐसी नहीं थी कि हम उस तरह की चीजें बना पाते. भारतीय जन और उद्योग दोनों का जोर अच्छी और टिकाऊ चीजों पर...

कोरोना के बाद की दुनिया – 4

इष्ट देव सांकृत्यायन  इसके पहले कि भारत में शल्य समस्या , उसके प्रभावों और निराकरण पर बात की जाए , दुनिया के बाजार में साख के महत्व और उसमें चीन की हिस्सेदारी पर बात कर लेते हैं। अधिक विस्तार के लिए मित्रों से क्षमा चाहता हूँ , लेकिन आगे की बातों से इसका बड़ा गहरा संबंध है और इसलिए इसकी चर्चा मुझे जरूरी लगती है। लॉयड ब्लैंकफीन एक अमेरिकी निवेश बैंकर हैं। वह कहते हैं , “ आपको अपने जीवन में ऐसे लोग चाहिए ही होते हैं जो आपके साथ काम करना चाहें और आपकी मदद करना चाहें। मेरे हिसाब से संगठनात्मक ढांचे का बहुत महत्व नहीं है। इसीलिए मैं अपने उच्चाधिकारियों की नज़र में अपनी साख बनाए रखना चाहता हूँ लेकिन अधिक प्रयास अपने सहयोगियों की साख प्राप्त करने की दिशा में करता हूँ।” यह सही है कि किसी की बात कोई ब्रह्मवाक्य नहीं है , लेकिन बाजार और कूटनीति की दुनिया पूरी तरह साख पर ही निर्भर है। बाजार में चीन की साख केवल और केवल सस्ते के लिए है। वहाँ बने सामानों के टिकाऊपन और गुणवत्ता की स्थिति यह है कि दुनिया भर में सबसे ज्यादा चुटकुले चीन के उत्पादों पर ही हैं। चीन में बने किसी भी सामान को दुनिया में ...

कोरोना के बाद की दुनिया-3

इष्ट देव सांकृत्यायन  तो क्या अब केवल अपनी इस आर्थिक ताक़त के भरोसे चीन दुनिया का नंबर एक बन जाएगा। यह सिर्फ सोचने की बात होगी। जब अमेरिका इस रास्ते पर बढ़ रहा था तब और भी कई देशों के पास आर्थिक और सामरिक ताक़त उससे बेहतर थी। विचारधारा के तौर पर लगभग वे सभी कमोबेश पूँजीवाद के समर्थक थे , लेकिन वे बन नहीं सके। पूँजीवाद को बाजारवाद तक सीमित मान बैठे पालतू बुद्धिजीवियों ने इस बात पर विचार करने की कभी जरूरत भी नहीं समझी कि ऐसा क्यों हुआ। एक विचार के तौर पर देखें तो पूँजीवाद खामियों से भरा हुआ है। लेकिन जो लोग सोचते हैं कि साम्यवाद उससे भिन्न है , वे बहुत बड़े मुगालते में हैं। मार्क्स ने जो कल्पना दी थी और लेनिन या माओ ने उसे जिस रूप में धरती पर उतारा , उन दोनों के बीच उतना ही अंतर है जितना जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के शब्दों में इस्लाम और मुसलमान में। दोनों ही ने उसे अव्यावहारिक , अप्रासंगिक और यहाँ तक कि अमानवीय सिद्ध कर दिया। अपनी खामियों के बावजूद पूँजीवाद आमजन को एक सेफ्टी वॉल्व देता है। तथाकथित साम्यवाद वह भी बंद कर देता है। चीन के मामले में उसके साथ पूरी दुनिया में विश्वास और भरोसे की विहीनत...

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