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चम्मच दीमकेश्वर की सिंहासन साधना

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इष्ट देव सांकृत्यायन किसी भी सत्ता का सत्यानाश करना उसके विरोधियों के बस की बात नहीं होती। सत्ता का सूरज जब भी डूबता है चमचों के कारण डूबता है। चमचे राहु हैं। वे सत्ताधीशों की बुद्धि पर ऐसा ग्रहण लगाते हैं कि उसे तब तक खुलने ही नहीं देते जब तक कि उसके पार्थिव शरीर का सारा रस न चूस डालें। बिलकुल दीमक की तरह।   राहु के ठीक सामने ही , 180* पर यानी सातवें घर में , केतु महाराज होते हैं। केतु छूटने के कारण होते हैं। जब तक किसी सत्ताधीश की सत्ता पर केतु पूरी तरह सशक्त और सक्रिय न हो जाएं , राहु यानी चम्मच दीमकेश्वर लोग उनके प्रिय नहीं हो सकते। अकसर यह देखा गया है कि सत्ता जैसे जैसे पुरानी होती जाती है चम्मच दीमकेश्वर लोग प्रिय से अतिप्रिय , और यहाँ तक कि प्राणप्रिय तक होते चले जाते हैं।   चम्मच दीमकेश्वर लोगों का व्यवहार , प्रायः देखा गया है कि जनता एंटी इनकम्बेंसी के व्युत्क्रमानुपाती होता है। जनता और समझदार लोग सत्ता से जितने नाराज होते जाते हैं , चम्मच दीमकेश्वर लोग उतने ही खुश होते जाते हैं। उनकी दक्षता भी बढ़ती चली जाती है। जो पहले रूमाल की तुरपाई करते थे , वे कुर्ते क...

Yatra Manual

व्यंग                                         यात्रा मैनुअल                                                                                   -हरिशंकर  राढ़ी (यह व्यंग्य ‘जागरण सखी’ में प्रकाशित हो चुका है. यह दूसरी और अंतिम किश्त है। )          स्लीपर क्लास में यात्रा के लिए जिन विशिष्ट  वस्तुओं की आवश्यकता  होती है, उनकी सूची एक्सक्लूसिवली यहां दी जा रही है। (खाना-पानी, बिस्तर-चादर जैसे सामानों का उल्लेख कर यहां मैनुअल का स्तर नहीं गिराया जाएगा।) यात्रीगण एक किता संड़सी, पेंचकस और मजबूत रस्सी प्राथमिकता के तौर पर रख लें। दरअसल, स्लीपर क्लास की कौन सी खिड़की की चिटकनी खराब है, किसका शीशा  टूटा हुआ है और कौन...

हाय, हम क्यों न बिके?

हरिशंकर  राढ़ी मैं शाम  की चाय का सुख लेने ही जा रहा था कि बोधनदास पधार गए। वे मेरे अज़ीज़  और अजीब पडोसी  हैं और अक्सर पधारते ही रहते हैं। आप एक सरकारी महकमे से सेवानिवृत्त हो चुके हैं, इसलिए दुनिया का सर्वोत्तम व्यावहारिक ज्ञान रखते हैं। ऐसे समय पर आते हैं कि चाय भी मिल जाए और समय भी कट जाए। इसके बदले वे अपना उपदेश  रूपी ट्यूशन पढ़ा  जाते हैं, ऐसा माना जा सकता है। मेरा भभका हुआ किन्तु निराश  सा चेहरा देखकर वे अपने कर्तव्यपथ पर आ डटे। शायद उन्हें एहसास हो गया कि कोई जोर का झटका लगा है।  बोधनदास जी बिना किसी औपचारिकता के सामने वाली कुर्सी को सुविधानुसार व्यवस्थित करके जम गए। छूटते ही बोले,'' भाई क्या बात है? बेवक्त ही चेहरे पर बारह क्यों बज रहे हैं ? क्या हो गया ? घर में सब ठीक तो है ?'' मन में आया कि कह दूँ कि आप जैसे लोगों ने ही तो देश  का बेडा गर्क कर रखा है ! 'घर' से बाहर न निकलने की तो जैसे कसम ही खा ली है। सारा जीवन अपने और अपने घर के बारे में ही तो सोचते रहे। घर के बाहर तो मानो कोई दुनिया...

युधिष्ठिर का कुत्ता - दूसरी किश्त

--- हरि शंकर राढ़ी यह भी एक शाश्वत सत्य है कि अपनी जाति एवं समाज की चिन्ता करने वाला कभी भी व्यक्तिगत विकास नहीं कर पाता है। यदि अपनी जाति के स्वाभिमान की चिन्ता मैं ही करता तो आज स्वर्ग पहुँच पाने वाला इकलौता आदरणीय कुत्ता नहीं बन पाता। मैं भी किसी पुरातन समाजवादी की भांति इधर-उधर के धक्के खाकर अबतक मर चुका होता या अज्ञातनामा जिन्दगी जी रहा होता। स्वर्ग का सुख शोषित समाज का साथ देकर नहीं पाया जा सकता और न ही अपनी जाति का अपकार करने वाले के प्रतिशोध की भावना रखकर। स्वर्ग का सुख या तो ऐसे लोगों की शरण में जाकर पाया जा सकता है या फिर अपनी जाति के लोगों को स्वर्ग का सपना दिखाकर। कम से कम लोकतंत्र में तो ऐसा ही होता है। इस तथ्य के प्रमाण में आपको मुझसे अच्छा दूसरा उदाहरण नहीं मिल सकता है। मैं उसी युधिष्ठिर का घोर समर्थक रहा जिन्होंने धर्मराज होने के बावजूद मेरी पूरी जाति के लिए सदैव के लिए नंगा कर दिया । मुझे मालूम था कि धर्मराज ने मेरी जाति को खुले यौन सम्बन्ध का श्राप दिया है क्योंकि मेरे एक भाई की वजह से उन पति -पत्नी के निजी संबंधों में विघ्न पड़ा था। बड़...

उत्तर आधुनिक शिक्षा में मटुक वाद - दूसरी किश्त

- हरिशंकर राढ़ी माना कि प्रो० मटुकनाथ से पूर्व और उनकी उम्र से काफी अधिक या यूँ कहें कि श्मशानोंमुख असंखय प्राध्यापकों ने ऐसा या इससे भी ज्यादा पहले किया था, किन्तु वे इसे आदर्श रूप में प्रस्तुत नहीं कर पाए थे।उनके अन्दर न तो इतना साहस था और न ही क्रान्ति की कोई इच्छा।जो भी किया , चुपके से किया। छात्राओं के सौन्दर्य एवं कमनीयता का साङ्‌गोपांग अध्ययन किया, गहन शोध किया और अपनी गुरुता प्रदान कर दी । प्रत्युपकार भी किया, पर चुपके- चुपके। आज न जाने कितनी पीएचडियाँ घूम रही हैं और न जाने कितने महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में ज्ञान बांटकर पैसे और इज्जत बटोर रही हैं, देश की बौद्धिक सम्पदा की प्रतीक बनी बैठी हैं ।ये बात अलग है कि गुरुजी ने कितना बड़ा समझौता शिक्षा जगत से किया, कितना बड़ा पत्थर सीने पर रखा , ये वही जानते हैं। पर मन का क्या करें? अब वे भी उदार भाव से पीएचडी बाँट रही हैं। प्रोफेसर साहब की असली शिष्या जो ठहरीं! पर दाद देनी होगी अपने प्रोफेसर मटुकनाथ जी को जिन्होंने इस तरह के गुमशुदा एवं निजी संबन्धों को मान्यता प्रदान की और मटुकवाद स्थापित किया। उनको एक उच्...

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