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चम्मच दीमकेश्वर की सिंहासन साधना

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इष्ट देव सांकृत्यायन किसी भी सत्ता का सत्यानाश करना उसके विरोधियों के बस की बात नहीं होती। सत्ता का सूरज जब भी डूबता है चमचों के कारण डूबता है। चमचे राहु हैं। वे सत्ताधीशों की बुद्धि पर ऐसा ग्रहण लगाते हैं कि उसे तब तक खुलने ही नहीं देते जब तक कि उसके पार्थिव शरीर का सारा रस न चूस डालें। बिलकुल दीमक की तरह।   राहु के ठीक सामने ही , 180* पर यानी सातवें घर में , केतु महाराज होते हैं। केतु छूटने के कारण होते हैं। जब तक किसी सत्ताधीश की सत्ता पर केतु पूरी तरह सशक्त और सक्रिय न हो जाएं , राहु यानी चम्मच दीमकेश्वर लोग उनके प्रिय नहीं हो सकते। अकसर यह देखा गया है कि सत्ता जैसे जैसे पुरानी होती जाती है चम्मच दीमकेश्वर लोग प्रिय से अतिप्रिय , और यहाँ तक कि प्राणप्रिय तक होते चले जाते हैं।   चम्मच दीमकेश्वर लोगों का व्यवहार , प्रायः देखा गया है कि जनता एंटी इनकम्बेंसी के व्युत्क्रमानुपाती होता है। जनता और समझदार लोग सत्ता से जितने नाराज होते जाते हैं , चम्मच दीमकेश्वर लोग उतने ही खुश होते जाते हैं। उनकी दक्षता भी बढ़ती चली जाती है। जो पहले रूमाल की तुरपाई करते थे , वे कुर्ते क...

Yudhishthir ka kutta by Hari Shanker Rarhi

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Cover Page of Yudhishthir ka Kutta युधिष्ठिर का कुत्ता   व्यंग्य संग्रह  (लेखक हरिशंकर राढ़ी ) हरिशंकर राढ़ी  का प्रथम व्यंग्य संग्रह " युधिष्ठिर का  कुत्ता " अयन प्रकाशन मेहरौली नई दिल्ली से प्रकाशित होकर आ गया है. यह कुल सोलह व्यंग्यों का संग्रह है जो लगभग बीस साल की अवधि में लिखे गए हैं।  संग्रह की पृष्ठ संख्या 132 है और मूल्य 260 /- है. यह संग्रह अब हिंदी बुक सेंटर पर उपलब्ध है जो की  साइट   पर ऑन लाइन मंगाया  जा सकता है. साथ ही स्नैपडील पर भी उपलब्ध है। इस संग्रह पर वरिष्ठ व्यंग्यकार सुरेश कांत कहते है : कल शाम व्यंग्यकार हरिशंकर राढ़ी ( Hari Shanker Rarhi ) द्वारा भिजवाया गया उनका प्रथम व्यंग्य-संकलन ' युधिष्ठिर का कुत्ता ' मिला। 132 पृष्ठों का 260   रुपये मूल्य वाला यह संकलन अयन प्रकाशन , महरौली , नई दिल्ली- 110030 ने छापा है , जिसमें भूमिका के अतिरिक्त उनके पिछले 20 वर्षों में लिखे गए 16 व्यंग्य शामिल हैं। छोटी-सी भूमिका में उन्होंने कई बड़ी बातें कही हैं। एक तो यह कि यथार्थ-दर्शन का ' पुण्य ' हर आँख को नही...

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