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Showing posts from March, 2013

जोगी जी वाह जोगी जी!

इष्ट देव सांकृत्यायन चढ़ते फागुन में हम मूढ़ों को  ज्ञान बताने आए  खेल धर्म का  खेल चुके तो खुलकर  जात बचाने आए कबीरा सारारारा........ जोगीरा रारारारा ......... जोगी जी वाह जोगी जी! किसकी कीच, कमल किसका है, किसका रंग किसकी पिचकारी  सभी शरीफ़ों की है आपस में गहरी रिश्तेदारी. जांच-फांच की नौटंकी पर धमक जताने आए कबीरा सारारारा जोगीरा रारारारा जोगी जी वाह जोगी जी! दूर बहुत दिखता है उसको जो घर में सुन भी ना पाए इधर जो मौक़ा लहे ज़रा सा लेकर धोकरा दौड़ा आए पंचतत्त की होली में सब दही भुजाने आए कबीरा सारारारा जोगीरा रारारारा जोगी जी वाह जोगी जी! सबने पी है छक कर यारां बादल बरसे भंग गेरुआ बाना भीगा देखो नसों से निकला रंग फागुन में जभी तो वो मल्हार गाने आए कबीरा सारारारा जोगीरा रारारारा जोगी जी वाह जोगी जी!

बात का मर्म

इष्ट देव सांकृत्यायन लोकतंत्र न हुआ, मुसीबत हो गई। किसी महामानव ने कुछ कहा नहीं कि बवाल शुरू। गोया बड़े लोगों को बेवजह छोटा बनाने और उन्हें भी अपनी ही औकात में लाने का सबको पूरा ह$क मिल गया हो। पांच साल में एक बार बड़े लोग मंच से हाथ क्या जोड़ लेते हैं, लोगों का मन इतना बढ़ जाता है कि वे उन्हें हमेशा हाथ जोड़े ही देखते रहना चाहते हैं। भूल ही जाते हैं कि सरकार और सरकारी अफसरों के शासक के बजाय सेवक होने की बात किताब में केवल लिखे जाने के लिए लिख दी गई है। असलियत से उसका संबंध उतना ही है, जितना राजनीति का नीति और डिग्री का योग्यता से। मुझे ठीक-ठीक याद है गर्मी नहीं, जाड़े के दिन थे वे। वह भी ऐसा जाड़ा कि लोगबाग परेशान। दिन में धूप भले निकल आए, पर रात एकदम सर्द। ऊपर से हर तीसरे दिन बारिश और उसमें ओलापात भी। इधर बजट आया, उसने सर्दी से भी ज्य़ादा लोगों के हाथ-पांव टैक्सों के ज़रिये सुन्न कर दिए। भिन्न-भिन्न प्रकार के नेतृत्वविलीन और नेतृत्वविहीन आंदोलनकारियों की पिछले तीन-चार वर्षों में जो दशा हुई, उसने जोशे-जवानी को ठंडई में पहले ही बदल दिया था। माहौल में ऐसा कुछ भी नहीं था, जि
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जमूरियत तरक्की पर

- ऐ जमूरे! - हां उस्ताद. - खेल दिखाएगा? - दिखाएगा. - जो कहेगा, करेगा? - करेगा, बिलकुल करेगा. काहें नईं करेगा उस्ताद? - ओह! तू तो उल्टा सवाल करने लगा बे. लगता है आज बड़ी तड़ी में है! - तड़ी में अपन क्या खा के होएंगा उस्ताद? अपन तो बस तुम्हारे हुकुम का ग़ुलाम है. जो बोलेगा करेंगा. - अच्छा. तो जो बोलेंगा, वो तू करेंगा? - हां, बिलकुल करेंगा उस्ताद. आख़िर पापी पेट का सवाल है. - हुंह! अच्छा तो चल  चाकू निकाल. - निकाला उस्ताद. - अब चल जिबह कर. - किसे उस्ताद? - वो जो दो अंगुल का जीव दिखता है न, उसी को. - क्यों उस्ताद? - सुन ज़्यादा सवाल मत किया कर. ये जमूरियत के लिए नुकसानदेह होता है.  - ओह! माफ़ करना उस्ताद. तू ठीक कहता है. जमूरियत में तो सवाल करने के भी पैसे लगते हैं.  - पर चल, तू पूछता है तो अपन बता देता है. असल में तो वो पहले से ही बेजान है.  - कैसे पता उस्ताद? -बेवकूफ़, तूने फिर सवाल किया. -ओह! ग़लती हो गई. माफ़ करुं उस्ताद. आइन्दा नहीं करेगा. - अच्छा चल माफ़ किया. अब पूछ ही लिया है तो जान ले. देख, वो अगर जानदार होता तो क़ानून-फ़ानून इंसानियत-फिंसानियत जैसी फ़ालतू बात न करता

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