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ब्लॉग बनाम माइक्रोब्लॉग

इष्ट देव सांकृत्यायन   इससे पहले :   वर्चुअल दुनिया के रीअल दोस्त और आयाम से विधा की ओर इस सत्र के बाद मेरे पुराने साथी अशोक मिश्र से मुलाक़ात हुई. मालूम हुआ कि अब वे वहीं विश्वविद्यालय की ही एक साहित्यक पत्रिका का संपादन कर रहे हैं. ज़ाहिर है, पुराने दोस्तों से  मिलकर सबको जैसी ख़ुशी होती है, मुझे भी हुई. हम लोग जितनी देर संभव हुआ, साथ रहे. प्रेक्षागृह के बाहर निकले तो मालूम हुआ कि अभी आसपास अभी कई निर्माण चल रहे हैं. ये निर्माण विश्वविद्यालय के ही विभिन्न विभागों, संकायों, संस्थानों और छात्रावासों आदि के लिए हो रहे थे. विश्वविद्यालय से ही जुड़े एक सज्जन ने बताया कि तीन साल पहले तक यहां कुछ भी नहीं था. जैसे-तैसे एक छोटी सी बिल्डिंग में सारा काम चल रहा था. राय साहब के आने के बाद यह सारा काम गति पकड़ सका और विश्वविद्यालय ने केवल पढ़ाई, बल्कि साहित्य-संस्कृति की दुनिया में भी अपनी धाक जमाने लायक हो पाया. अब तो टीचरों से लेकर स्टूडेंटों तक में (माफ़ करें, ये उन्हीं के शब्द हैं) काफ़ी उत्साह है. लोग इसे आपकी दिल्ली के जेएनयू से कम नहीं समझते. अच्छा लगा जानकर कि विश्वव...

भांति-भांति के जन्तुओं के बीच मुंबई बैठक

आलोक नंदन मुंबई के संजय गांधी राष्ट्रीय नेशनल पार्क में भांति-भांति के जन्तुओं के बीच रविवार को भांति-भांति के ब्लौगर जुटे। लेकिन एन.डी.एडम अपनी ड्राइंग की खास कला से वाकई में कमाल के थे। पेंसिल और अपनी पैड से वह लगातार खेलते रहे, किसी बच्चे की तरह। और देखते ही देखते वहां पर मौजूद कई ब्लौगरों की रेखा आकृति उनके पैड पर चमकने लगी। भांति भांति के ब्लौगरों के बीच अपने अपने बारे में कहने का एक दौर चला था, और इसी दौर के दौरान किसी मासूम बच्चे की तरह वह अपने बारे में बता रहे थे। “मुझे चित्र बनाना अच्छा लगता था। एक बार अपने शहर में पृथ्वी कपूर से मिला था। वो थियेटर करते थे। मैं थियेटर के बाहर खड़ा था। एक आदमी ने उनसे मेरा परिचय यह कह कर दिया कि मैं एक चित्रकार हूं। वह काफी खुश हुये और मुझे थियेटर देखने को बोले। शाम को जब मैं अगली पंक्ति में बैठा हुआ था तो लोगों को आश्चर्य हो रहा था,” मुंबईया भाषा में वो इसे तेजी से बोलते रहे। जब वह अपना परिचय दे रहे थे तो बच्चों की तरह उनके मूंह से थूक भी निकल रहा था, जिसे घोंटते जाते थे। “मैं पांचवी तक पढ़ा हूं, फिर चित्र बनाता रहा। मुझे चि...

मोहल्ले का चार सौ बीसा

आज एक मजेदार बात. मोहल्ले ने आज अपने चार सौ बीस पोस्ट पूरे कर लिए. वही अविनाश भाई वाले मोहल्ले ने. मैंने अचानक अपना ब्लोग खोला तो वहाँ मोहल्ले के हिस्से में मुझे यह जानकारी मिली. मुझे एक घटना याद आई. उन दिनों में गोरखपुर में ही था और वहाँ दैनिक जागरण का सिटी रिपोर्टर था. एक सुनसान दिन था. ऐसा दिन कि खबरें न के बराबर थीं और पन्ने पूरे करने थे. विज्ञापन भी ज्यादा नहीं थे. मजबूरन में अपने रिपोर्टर बंधुओं से कह रहा था कि भाइयों कुछ करो. सब कुछ करने के बावजूद जब पेज पूरे नहीं हुए तो मैंने एक-एक बंधु से उनकी बीट के हाल लेने शुरू किए. टेलीफोन विभाग उन दिनों देखते थे गिरीश. उन्होने हँसते हुए बताया कि हमारे यहाँ तो आजकल सिर्फ चार सौ बीसी की चर्चा चल रही है. मैंने डिटेल जानना चाह तो उन्होने बताया कि टेलीफोन विभाग इन दिनों एक नंबर को लेकर परेशान है. नंबर है 33420 और यह जिसे दिया जाता है वही दस-बीस दिन में तंग आकर लौटा जाता है. तब इतनी आसानी से फोन नहीं मिलते थे. उस पर लौटा जाना. यह तो गजब की गुस्ताखी है. कारण पूछने पर पता चला कि वह नंबर मिलते ही जाने कहाँ-कहाँ से अनजान फोन आने लगते हैं और सिर्...

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