दुनिया भर में उथल-पुथल कराएगी केतु- गुरु-मंगल की तिकड़ी

 इष्ट देव सांकृत्यायन 

श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः

यह बात मैं साल के आरंभ में ही कह चुका हूँ कि यह पूरा साल धरना-प्रदर्शन और आंदोलनों से भरा रहेगा। युद्ध दुनिया भर में होंगे, लेकिन मध्य-पूर्व और मध्य यूरोप इसके ज्यादा शिकार होंगे। बाकी जगहों पर युद्ध सीधे लड़े जाने के बजाय छद्म रूप में लड़े जाएंगे। शनि-राहु का अगल-बगल होना यह जाहिर करता है कि घोर पूँजीवादी शक्तियाँ पहले तो दूसरे देशों में जनरोष उभारेंगी, फिर उसी के जरिये युद्ध लड़ेंगी। चोरों की तरह घात लगाकर कमजोर देशों पर कब्जे की साजिशें रचेंगी। कहीं सफल होंगी और कहीं विफल। देशों के भीतर सरकारों के अपने गलत फैसले और नेताओं का अहंकार भी इसमें बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इन युद्धों में रंगे भेड़ियों की भूमिका भी बहुत महत्त्वपूर्ण होगी, जो जनता के बीच उसके बहुत बड़े हितैषी बनकर भेड़ों की खाल ओढ़कर आएंगे। ऊपर से ओढ़ी गई कोई भी खाल चिरकाल तक बनी नहीं रहती। यह भी नहीं रहेगी। लेकिन कहीं तो उनकी खाल समय से उतर जाएगी और कहीं बहुत देर से उतरेगी। तब तक वे बहुत कुछ क्षति पहुँचा चुके होंगे। यह अलग-अलग देशों की अपनी कुंडली पर निर्भर है। यह पिछले एक वर्ष में हम कई बार देख चुके हैं। वेनेजुएला, बांग्लादेश और नेपाल इसके उदाहरण हैं। यूक्रेन, ईरान, सऊदी अरब, फिलस्तीन, इजरायल में भी काफी कुछ इसका असर देखा जा सकता है।


आइए, पहले हम ग्रहों की गतियों को समझते हैं। 31 अक्टूबर से लेकर 16 नवंबर के बीच ग्रहों की स्थिति में कुछ बड़े परिवर्तन होने जा रहे हैं। ये हैं गुरु, मंगल और सूर्य। गुरु अभी अतिचारी अवस्था में हैं। अतिचारी अवस्था पर इस साल काफी कुछ लिखा जा चुका है। मैं खुद पिछले लेखों में इस पर बात कर चुका हूँ, फिर लिखने की जरूरत नहीं समझता। अतिचारी अवस्था में ही गुरु अभी कर्क राशि में हैं। कर्क में गुरु उच्चस्थ होते हैं, लेकिन अतिचारी होने के नाते उनके उच्चस्थ होने का जो लाभ मिलना चाहिए था, वह पूरा नहीं मिल सका। अभी 31 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक तो वे आश्लेषा नक्षत्र में ही थे, लेकिन इसके बाद आश्लेषा से मघा यानी कर्क राशि छोड़कर सिंह में आ गए हैं। मंगल अभी आश्लेषा नक्षत्र यानी कर्क राशि में गोचर कर रहे हैं। कर्क में मंगल नीचस्थ होते हैं। 12 नवंबर को रात 8 बजकर 30 मिनट तक वहीं बने रहेंगे, लेकिन इसके बाद वे भी मघा नक्षत्र में चले जाएंगे। केतु पहले से ही सिंह राशि में ही चल रहे हैं और 29 मार्च 2026 को ही मघा नक्षत्र में प्रविष्ट हो चुके हैं। आज यानी 31 अक्टूबर को वे 1 अंश 52 कला पर हैं। चूँकि राहु-केतु की गति हमेशा वक्री यानी उलटी होती है, इसलिए 16 नवंबर को वे 1 अंश 6 कला पर पहुँच जाएंगे। सूर्यनारायण अभी स्वाती नक्षत्र यानी तुला राशि में हैं। 6 नवंबर को वे विशाखा नक्षत्र में प्रविष्ट होंगे। राशि तुला ही बनी रहेगी। लेकिन 16 नवंबर को शाम 7 बजकर 48 मिनट पर वे विशाखा नक्षत्र के चौथे चरण में पहुँच जाएंगे, जहाँ से उनका भी राशि परिवर्तन हो जाएगा और वे वृश्चिक राशि में पहुँच जाएंगे। तुला में सूर्य नीचस्थ होते हैं। वृश्चिक में वे नीचस्थ तो नहीं रह जाएंगे, लेकिन यह बहुत अच्छी स्थिति भी नहीं होगी। क्योंकि सूर्य अग्नि तत्त्व ग्रह हैं और वृश्चिक जल तत्त्व राशि।


यह कुल मिलाकर शासक वर्ग के संकट में पड़ने का संकेत है। किसी एक जगह के नहीं, पूरी दुनिया के शासक वर्ग के। इसके कारण वे स्वयं होंगे। ऐसा क्यों? गुरु-केतु की युति को ऐसे तो मोक्षदायक कहा जाता है, लेकिन यह गुरु-चांडाल योग भी है। जो कि गुरु-केतु के बिलकुल निकट, यानी अगल-बगल के घर में होने के नाते आंशिक रूप से पहले से ही प्रभावी है और जिसका प्रभाव हमें दुनिया भर के शासकों के फैसलों में देखने को मिल रहा है। अब गुरु-केतु के एक साथ आ जाने से इसकी गति और तीव्रता दोनों ही बढ़ जाएगी। इसके अलावा, सिंह एक अग्नि तत्त्व राशि है और यह शासन-सत्ता की प्रतिनिधि राशि भी है। मघा नक्षत्र के देवता पितर हैं, और इसका प्रतीक है सिंहासन। इस प्रकार इसका कारकत्व क्षेत्र है सत्ता। केतु अभी मघा के पहले चरण में हैं। यह नवांश मेष यानी मंगल का होगा। अग्नि तत्त्व राशि, अग्नि तत्त्व नवांश, राशि और नवांश दोनों ही स्थितियों में अग्नि तत्त्व ग्रहों का स्वामित्व, और उसमें एक अग्नि तत्त्व ग्रह की उपस्थिति, जो स्वयं ही उस नक्षत्र का स्वामी भी है। अग्नि तत्त्व का इतना आधिक्य अपने आप में शुभ नहीं है, खासकर मघा नक्षत्र के प्रतीक सिंहासन यानी सत्ता पक्ष के लिए। मघा के पहले चरण में आकर केतु और भी मजबूत हो जाएंगे। ऐसी स्थिति में बृहस्पति यानी कारकत्व में विवेक का प्रभाव घट जाएगा। शासक वर्ग जनता के घोर असंतोष और रोष के बावजूद न मालूम किस उपलब्धि के अहंकार में डूबा दिखाई देगा। इसी प्रभाव में उलटे-सीधे निर्णय लेगा। ये निर्णय ही जनता में असंतोष पैदा करेंगे और उसे रोष की ओर ले जाएंगे।


बात केवल इतनी ही नहीं है। 12 नवंबर को स्वयं मंगल भी वहीं आ चुके होंगे। मंगल यानी साक्षात अग्निदेव। मघा नक्षत्र के पहले चरण में वे अपने ही नवांश मेष में होंगे। यानी सबसे मजबूत। केतु वहाँ पहले से ही मौजूद हैं और मंगल उनके साथ जुड़कर अंगारक योग बनाएंगे। वैसे तो लाल किताब वाले केतु को बृहस्पति का पक्का चेला कहते हैं, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में केतु ऐसे चेले बनते दिख रहे हैं जो अपने गुरु का ही गुरु बनने की कोशिश करने लगता है। यहाँ बृहस्पति का हाल लगभग वही हो जाएगा जो किसी जातक की कुंडली के तीसरे भाव में होता है। विवेक अनिश्चितकालीन अवकाश पर चला जाएगा। बृहस्पति ऐसे भी अतिचारी हैं। अतिचारी बृहस्पति की हालत पुराने जमाने के उस गुरु जी जैसी होती है जिनकी प्रसन्न मुद्रा में कल्पना ही नहीं की जा सकती। क्लास में वे मुँह से कम, छड़ी से ज्यादा बात करते हैं। ऐसे देशों में जहाँ युवा लोग शासक हैं, युद्ध की आशंका बढ़ जाएगी। राजनैतिक सत्ता पर सैन्य बल का प्रभुत्व बढ़ता दिखेगा। अपेक्षाकृत शांत समझे जाने वाले लोकतांत्रिक शासक भी पुलिस व अर्धसैनिक बलों आदि का उपयोग कर बैठेंगे; और इससे किसी समस्या का समाधान निकलेगा, इसकी संभावना कम ही है। कहीं-कहीं सैन्य विद्रोह या सत्ता पर सेना के कब्जे की घटना भी सुनी जा सकती है।

कुछ देशों में राष्ट्रप्रमुखों को अचानक पद छोड़ने की नौबत आ सकती है। यह सैन्य विद्रोह और जनरोष दोनों के परिणामस्वरूप हो सकता है। इसके बाद वहाँ जिस नए नेतृत्व का उदय होगा, उस पर मंगल और केतु का पूरा प्रभाव होगा। अपनी कार्यप्रणाली में वह अत्यंत उग्र और आक्रामक होगा। युद्ध भी भड़केंगे। खासकर मध्य एशिया, मध्य यूरोप, उत्तरी यूरोप और पूर्वी अफ्रीका में शांति व्यवस्था बहुत बुरे दौर से गुजरती दिखेगी। नेप्चून अभी मीन राशि में हैं। उत्तरा भाद्रपद के दूसरे चरण में। शनि भी मीन में ही हैं। उत्तराभाद्रपद के ही चौथे चरण में। दोनों की सीधी दृष्टि गुरु-मंगल-केतु की इस तिकड़ी पर है। यह दृष्टि धार्मिक उन्माद बढ़ाएगी। शनि और नेप्चून दोनों वक्री हैं। इनका चेष्टाबल बहुत अधिक होगा। सांप्रदायिक कारणों से देशों के बीच युद्ध होंगे और यह कारण साफ तौर पर दिखाई देगा। कई देशों में गृहयुद्ध की स्थिति भी बनेगी। संप्रदायों के भीतर उप-संप्रदायों तक के बीच संघर्ष की स्थिति अधिक भयावह रूप ले लेगी।


 प्राकृतिक दुर्घटनाओं की आशंका भी प्रबल होगी। खासकर भूमि और अग्नि से जुड़ी। जिन देशों में सुप्तावस्था वाले ज्वालामुखी हैं, उन्हें सचेत रहना चाहिए। कई जगह सुप्त ज्वालामुखियों में अचानक विस्फोट हो सकता है। आग के चलते औद्योगिक दुर्घटनाएँ हो सकती हैं। पेट्रोलियम, केमिकल और बिजली से जुड़े कारखानों को अपने संरक्षा मानकों का अनुपालन सुनिश्चित कर लेना चाहिए। किसी को भी ऐसी कोई चूक नहीं छोड़नी चाहिए जो अग्नि संबंधी दुर्घटना का कारण बने। घरों में भी इस बात का पूरा खयाल रखना चाहिए।  मंगल और केतु की युति भूकंप का भी कारण बनती है। खासकर तब यह आशंका अधिक प्रबल हो जाती है जबकि इससे आठवें भाव में शनि और नेप्चून की युति हो।


 

आठवाँ भाव भूमि के नीचे की हलचलों को बताता है, साथ समुद्र की गहराइयों का भी द्योतक है। वह सब जो अज्ञात है, जिसके बारे में सटीक आकलन का कोई त्रुटिरहित उपाय नहीं है, आठवें भाव से ही द्योतित होता है। गुरु की जलतत्त्व राशि और कालपुरुष के बारहवें भाव में नेप्च्यून के साथ शनि का होना ग्लेशियर दुर्घटना से जन-धन की व्यापक क्षति का संकेत देता है। यह आशंका पूर्वी और उत्तरी क्षेत्रों में अधिक है। गुरु के अतिचारी होने के प्रमुख उद्देश्यों में से एक प्रकृति का रेस्टोरेशन भी है। पारिस्थितिकी में जो असंतुलन हमने पैदा किए हैं, गुरु उसे मिटाकर संतुलन लाने का प्रयास करते हैं। इसलिए मौसम चक्र में परिवर्तन देखने को मिल सकता है। साथ ही अतिचारी गुरु धर्म के नाम पर जो पाखंड पैदा हुए हैं, उन्हें जगजाहिर करके धर्म के विशुद्ध स्वरूप की स्थापना का प्रयास करते हैं। अतः धर्म-संप्रदाय की आड़ में जो लोग कुछ उलटे-सीधे काम कर रहे हैं उनकी पोल पट्टी खुल सकती है।

चूँकि गुरु-केतु और मंगल की यह त्रिग्रही युति 12 नवंबर से लेकर 25 नवंबर तक बनी रहेगी, इसलिए 12 नवंबर से 5 दिसंबर के बीच यह स्थिति अधिक सघनता से दिखेगी। इसमें भी 15 से लेकर 21 नवंबर के बीच करीब एक सप्ताह की अवधि में सबसे ज्यादा सचेत रहने की जरूरत होगी। उसका एक कारण तो यह है कि इस बीच 17 और 18 नवंबर को ये तीनों ही ग्रह अंशबल में काफी निकट होंगे। यानी इनके बीच की दूरी अत्यंत कम हो जाएगी। राहु की सप्तम दृष्टि इन पर पड़ेगी ही। इसके अलावा 17 नवंबर को दिन में ही चंद्रमा भी कुंभ राशि यानी राहु के साथ आ जाएंगे। सूर्य और बुध की युति पर भी राहु की दृष्टि पड़ेगी। यह कुल मिलाकर भावनात्मक ज्वार जैसी स्थिति बनेगी। इसे संभालना दुनिया भर के शासकों के लिए कठिन होगा। कई देशों के सत्ता के गलियारों में बहुत बड़ी हलचलें होगी। कई जगहों पर भीड़ के चलते भगदड़ की स्थिति भी बन सकती है और ऐसी भगदड़ में कई लोगों के अकारण ही हताहत होने की स्थिति बन सकती है।

 

ध्यान रहे, गुरु केवल अतिचारी ही नहीं, इस वर्ष के राजा, धनेश और नीरसेश भी हैं। गुरु का तत्त्व आकाश है और इस तत्त्व में ही अनंत विस्तार है। सिंह एक स्थिर संज्ञक राशि है। गुरु वित्त और बैंकिंग के कारक हैं और इस वर्ष के धनेश भी। अर्थव्यवस्था में भी कुछ बड़े बदलाव होंगे। बैंकिंग में भी। कुछ आश्चर्यजनक निर्णय आएंगे। लेकिन जैसा कि कुछ लोग बैंक बंद होने या बैंकों से सारा पैसा खत्म हो जाने की आशंका जता रहे हैं, ऐसा कुछ भी नहीं होगा। यहाँ वास्तव में आशय कुछ बड़े नीतिगत परिवर्तनों से है। आम जन को अपने धन की सुरक्षा को लेकर चिंतित होने की बिलकुल आवश्यकता नहीं है। लाल-पीली धातुओं के मूल्य में तेजी देखने को मिलेगी। महाकवि कालिदास के उत्तर कालामृत और महर्षि मंत्रेश्वर की फलदीपिका दोनों ही क्लासिक ग्रंथों में इस ओर स्पष्ट संकेत किए गए हैं। कहा गया है –

जीवारात्रिकृतोर्योगे सुभिक्षं क्षेममेव च।

कनकाग्र्यमहाघर्घ्यं जायते नात्र संशयः॥

ग्रहों की यह तिकड़ी सुभिक्ष लाएगी यानी फसल अच्छी होगी, लेकिन सोना-ताँबा जैसी धातुओं का मूल्य बढ़ जाएगा। कहीं-कहीं नए टैक्स लग सकते हैं। शेयर बाजार में भी अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव आएगा। रक्षा, ऊर्जा, खनिज, तेल और सरकारी कंपनियों पर नंदी जी की कृपा रहेगी। दूसरी तरफ बैंकिंग, फाइनेंस और आईटी के शेयरों पर जामवंत जी चढ़ सकते हैं। केतु की चाल बैंकों में एनपीए से जुड़े कुछ छुपे हुए तथ्य और कुछ घोटाले उजागर करवा सकती है। इसके चलते बैंकिंग से से जुड़े सभी सरकारी-गैर सरकार  संस्थानों पर बियरिश दबाव बनेगा। अमेरिका, चीन और भारत में मौद्रिक नीतियों को लेकर अचानक कोई चौंकाने वाले फैसला आ सकता है। कॉर्पोरेट सेक्टर पर सरकारी दबाव बढ़ेगा। मघा नक्षत्र में केतु और मंगल की युति घाटे में चल रही पुरानी कंपनियों के लिए संकट का कारण बनती है, लेकिन साथ ही गुरु के ज्ञान से कुछ नए और क्रांतिकारी बिजनेस मॉडल्स (जैसे एआई, डिफेंस टेक, और स्पेस स्टार्टअप्स) के लिए यह समय भारी निवेश लेकर भी आएगा। ध्यान रहे, आगे केतु कर्क राशि में जाने वाले हैं और जब जब केतु कर्क राशि में जाते हैं शेयर बाजार की व्यवस्था डगमगाती है। इसलिए कोई भी निवेश भावनाओं में बहकर या जुआरी प्रवृत्ति से न करें। कोई भी महत्त्वपूर्ण आर्थिक फैसला करने से पहले बाजार की स्थितियों और अपने ग्रह-गोचर की सूक्ष्म पड़ताल कर लें। यह विश्लेषण वैश्विक है। जल्दी ही भारत केंद्रित विश्लेषण भी करूंगा।


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