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Showing posts from April, 2009

मुल्ला और इंसाफ़

इधर बहुत दिनों से मुल्ला नसरुद्दीन की बड़ी याद आ रही है. मित्रों से निजी बातचीत के क्रम में उनका जिक्र भी अकसर होता रहा है. पढ़ता भी ख़ूब रहा हूं, गाहे-बगाहे जब भी मुल्ला के बारे में जो कुछ भी मिल गया. पर उधर जूते ने ऐसा परेशान कर रखा था कि मुल्ला को इयत्ता पर याद करने का मौक़ा ही नहीं मिल सका. आज एक ख़ास वजह से उनकी याद आई. एक बात आपसे पहले ही कर लूं कि मुल्ला से जुड़े इस वाक़ये को किसी अन्यथा अर्थ में न लें. कहा यह जाता है कि यह एक चुटकुला है, लिहाजा बेहतर होगा कि आप भी इसे एक चुटकुले के ही तौर पर लें. अगर किसी से इसका कोई साम्य हो जाता है तो उसे बस संयोग ही मानें. तो हुआ यह कि मुल्ला एक बार कहीं जा रहे थे, तब तक सज्जन दौड़ते-दौड़ते आए और उन्हें एक चाटा मार दिया. ज़ाहिर है, मुल्ला को बुरा लगना ही चाहिए था तो लगा भी. लेकिन इसके पहले कि मुल्ला उन्हें कुछ कहते, वह मुल्ला से माफ़ी मांगने लगे. उनका कहना था कि असल में उन्होंने मुल्ला को मुल्ला समझ कर तो चाटा मारा ही नहीं. हुआ यह कि मुल्ला को आते देख दूर से वह किसी और को समझ बैठे थे और इसी धोखे में उन्होंने चाटा मार दिया. पर मुल्ला तो मुल्ला ठहरे. उन

दास्तान- ए- बेदिल दिल्ली

पुस्तक समीक्षा दास्तान- ए- बेदिल दिल्ली संभवतः बहुत कम ही साहित्यप्रेमियों को इस बात की जानकारी होगी कि लब्धप्रतिष्ठ उपन्यासकार द्रोणवीर कोहली , पिछली सदी के उत्तरार्द्ध में प्रकाशित होने वाली अत्यंत लोकप्रिय पत्रिका धर्मयुग में ‘ बुनियाद अली ’ के छद्म नाम से एक स्तंभ लिखा करते थे , जिसका शीर्षक था - बेदिल दिल्ली। धर्मयुग पत्रिका के सर्वाधिक पढे जाने वाले और चर्चित स्तंभों में सम्मिलित बेदिल दिल्ली के अन्तर्गत लिखे गए उन्हीं लेखों को संकलित कर पुस्तकाकार में किताबघर प्रकाशन ने हाल में ही प्रकाशित किया है । कहने की जरूरत नहीं कि पुस्तक में संकलित सभी 52 लेख ऐतिहासिक महत्व के हैं। इनके माध्यम से लेखक ने तत्कालीन दिल्ली की सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक दशाओं का चित्रण पूरी प्रामाणिकता के साथ किया है। दिल्ली स्थित सरकारी महकमों में फैला भ्रष्टाचार हो या सामाजिक स्तर पर पसरी संवेदनहीनता, साहित्यिक गलियारों में होने वाली आपसी टाँग खिचाई हो या फिर राजनीतिक मठाधीशों की छद्म सदाचारिता , हर जगह व्याप्त विसंगति को उकेर कर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने के

चार रंग जिंदगी के

पुस्तक समीक्षा चार रंग जिंदगी के अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में सर्जनात्मक लेखन से जुडने वाली रचनाकार डाॅ अरुणा सीतेश ने बहुत कम समय में ही तत्कालीन कथा-लेखिकाओं के बीच अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर ली थी। उनके कथा- साहित्य के केंद्र में प्रायः स्त्री जीवन की गहन भावनाओं का मार्मिक चित्रण उपस्थित रहता है। कुछ समय पूर्व प्रकाशित कथा संकलन ‘ चार लंबी कहानियां ’ में सम्मिलित उनके द्वारा लिखी गई कहानियां जहां एक ओर नारी मन के अंतद्र्वंद्व को उजागर करती हैं तो साथ ही मानवीय मनोविज्ञान का विश्लेषण भी करती हैं। समीक्ष्य संग्रह में संकलित पहली कहानी ‘डूबता हुआ सूरज’ एक असफल प्रेम की मार्मिक गाथा को बयान करती है। आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई यह कहानी यद्यपि चिर- परिचित कथानक पर ही आधारित है , लेकिन इसका शिल्प और मनोभावों को पूरी सशक्तता से व्यक्त करने के लिए गढे गए वाक्य विन्यास , पाठकों को बांध कर रखने में पूर्णतः सक्षम हैं। भावुक इंसान के जीवन की मुश्किलें तब और बढ जाती हैं , जब उस पर अपने ही परिजनों और जीवन को व्यावहारिकता से देखने वालों का दबाव पडने लगता है। बुद्धिजनित तर्

अथातो जूता जिज्ञासा-32

आप कई बार देख चुके हैं और अकसर देखते ही रहते हैं कि ख़ुद को अजेय समझने वाले कई महारथी इसी खड़ाऊं के चलते धूल चाटने के लिए विवश होते हैं. यह अलग बात है कि अकसर जब आप धूल चाटने के लिए उन्हें मजबूर करते हैं तो यह काम आप जिस उद्देश्य से करते हैं, वह कभी पूरा नहीं हो पाता है. हर बार आप यह पाते हैं कि आप छले गए. इसकी बहुत बड़ी वजह तो यह है कि आप अकसर 'कोउ नृप होय हमें का हानी' वाला भाव ही रखते हैं. कभी अगर थोड़ा योगदान इस कार्य में करते भी हैं तो केवल इतना ही कि अपना खड़ाऊं चला आते हैं, बस. और वह काम भी आप पूरी सतर्कता और सम्यक ज़िम्मेदारी के साथ नहीं करते हैं. आप ख़ुद तमाशेबाज खिलाड़ियों के प्रचार तंत्र से प्रभावित होते हैं और इसी झोंक में हर बार अपने खड़ाऊं का पुण्यप्रताप बर्बाद कर आते हैं. और यह तो आप अपनी ज़िम्मेदारी समझते ही नहीं हैं कि आपके आसपास के लोगों के प्रति भी आपकी कोई ज़िम्मेदारी बनती है. अगर आपका पड़ोसी ग़लती करता है और आप उसे ग़लती करते हुए देखते हैं तो ज़्यादा न सही पर थोड़े तो आप भी उस ग़लती के ज़िम्मेदार होते ही हैं न! बिलकुल वैसे ही जैसे अत्याचार को सहना भी एक तरह का अत्याचार है, ग़

अथातो जूता जिज्ञासा-31

तो अब बात उस खड़ाऊं की जो भगवान राम ने आपके लिए छोड़ी थी और जिसकी पहचान अब आप भूल गए हैं, या फिर पहचान कर भी उससे अनजान बने हुए हैं. यह भी हो सकता है कि आप उसे पहचान कर भी अनजान बने हों. इसकी एक वजह तो आपका आलस्य हो सकता है और दूसरी आपमें इच्छाशक्ति की भयावह कमी भी. अपनी इसी कमज़ोरी की वजह से आप तब वाह-वाह तो कर रहे हैं जब दूसरे लोग उल्टे-सीधे जूते परम माननीयों पर फेंक रहे हैं, लेकिन ख़ुद अपने हाथों में मौजूद खड़ाऊं का उपयोग करने से बच रहे हैं. मुझे मालूम है कि आप वह जूता भी नहीं चला सकेंगे. आख़िर आप बुद्धिजीवी हैं. बुद्धिजीवी कोई ऐसा-वैसा काम थोड़े करता है. असल बुद्धिजीवी तो सारा तूफ़ान चाय की एक प्याली में उठाता है और चाय के साथ ही उसे थमने के लिए मजबूर भी कर देता है. आजकल तो चाय की प्याली की भी ज़रूरत नहीं है. आज का बुद्धिजीवी तो एक ब्लॉग बनाता है और ब्लॉगे पे बेमतलब का बखेड़ा खड़ा कर देता है. ब्लॉग पर ही वह ख़ुश हो लेता है और ब्लॉग पर ही नाराज हो लेता है. कभी इस बात पर तो कभी उस बात पर. कभी इस बात पर कि कोई गाली क्यों देता है और कभी इस बात पर कि कोई गाली क्यों नहीं देता है. कभी इस बात पर कि क

अथातो जूता जिज्ञासा-30

यक़ीन मानें आम जनता जो  जूता चला रही है, असल में वह जूता है ही नहीं. यह तो वह खड़ाऊं है जो भगवान राम ने दिया था भरत भाई को. भरत भाई ने यह खड़ाऊं अपने लिए नहीं लिया था, उन्होंने यह खड़ाऊं लिया था आम जनता के लिए. इसीलिए उनके समय में उस खड़ाऊं का इस्तेमाल उनके मंत्रियों, अफ़सरों और निजी सुरक्षाकर्मियों ने नहीं किया. यही वजह थी जो ख़ुद भरत राजधानी के बाहर कुटी बना कर रहते रहे और वहां से राजकाज चलाते रहे. जनता की व्याकुलता की वजह इस दौरान राम की अनुपस्थिति भले रही हो, पर शासन या व्यवस्था में किसी तरह की कोई कमी कतई नहीं थी. और सबसे बड़ी बात तो यह कि अधिकारों के उस खड़ाऊं में भरत के लिए कोई रस भी नहीं था. उनकी रुचि अगर थी तो उस ज़िम्मेदारी में जो राम की अनुपस्थिति के कारण उन पर आ पड़ी थी. जबकि अब के शासकों की रुचि अपनी ओढ़ी हुई ज़िम्मेदारी में कभी ग़लती से भी दिख जाए तो यह एक असामान्य बात मानी जाती है. क्योंकि सामान्यतया उनकी कुल रुचि केवल उस अधिकार में है जो उन्होंने जनता को बहला-फुसला कर या डरा-धमका कर अपने ही जैसे अपने प्रतिद्वन्द्वियों से छीना है. नतीजा यह है कि आपके जनप्रिय नेताओं के बंगलों के बिजली

अथातो जूता जिज्ञासा-29

इन समानधर्माओं में सबसे पहला नाम आता है इराकी पत्रकार मुंतजिर अल ज़ैदी का, जिन्होंने ख़ुद को दुनिया सबसे ताक़तवर समझने वाले महापुरुष जॉर्ज बुश पर जूतास्त्र का इस्तेमाल किया. इसकी आवश्यकता कितने दिनों से महसूस की जा रही थी और कितने लोगों के मन में यह हसरत थी, यह बात  आप केवल इतने से ही समझ सकते हैं कि यह जूता चलते ही दुनिया भर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. भले ही कुछ लोगों ने दिखावे के तौर पर शिष्टाचारवश इसकी भर्त्सना की हो, पर अंतर्मन उनका भी प्रसन्न हुआ. बहुत लोगों ने तो साफ़ तौर पर ख़ुशी जताई. गोया करना तो वे ख़ुद यह चाहते थे, पर कर नहीं सके. या तो उन्हें मौक़ा नहीं मिला या फिर वे इतनी हिम्मत नहीं जुटा सके. सोचिए उस जूते की जिसकी क़ीमत चलते ही हज़ारों से करोड़ों में पहुंच गई. असल में ज़ैदी ने यह बात समझ ली थी कि अब अख़बार तोप-तलवार के मुकाबले के लिए नहीं, सिर्फ़ मुनाफ़े के लिए निकाले जाते हैं. उन्होंने देख लिया था कि अख़बार में बहुत दिनों तक लिख-लिख कर, टीवी पर बहुत दिनों तक चिल्ला-चिल्ला कर बहुतेरे पत्रकार तो थक गए. मर-खप गए और कुछ नहीं हुआ. वह समझ गए थे कि कलम में अब वह ताक़त नहीं रही कि इंकलाब ला सके.

अथातो जूता जिज्ञासा-28

और अब बात आधुनिक भारत में जूता चिंतन की. निराला जी से थोड़े पहले उनके ही धातृ शहर इलाहाबाद में हुए एक अकबर इलाहाबादी साहब. अपने ज़माने के बहुत उम्दा शायरों में गिने जाते हैं वह और अगर क़रीने से देखा जाए तो बिलकुल आधुनिक सन्दर्भों में जूता चिंतन की शुरुआत ज़नाब अकबर इलाहाबादी साहब से ही होती है. यह अलग बात है कि उनके पूर्वजों को जूते चलाने का भी शौक़ रहा हो, पर जहां तक मैं जानता हूं, अकबर साहब के शौक़ सिर्फ़ जूते पहनने तक ही सीमित थे. उन्होंने कभी भी जूते चलाने में किसी तरह की हिस्सेदारी नहीं की. ख़ास कर जूते बनाने का शौक़ तो उनके पूर्वजों को भी नहीं था. इसके बावजूद पढ़े-लिखे लोगों के बीच जूते पर केन्द्रित उनका एक जुमला अत्यंत लोकप्रिय है. जब भी कोई ऐसी-वैसी बात होती है, भाई लोग उन्हें फट से कोट कर देते हैं. जूते पर केन्द्रित उनका शेर है : बूट डासन ने बनाया मैंने एक मज़्मूं लिखा मुल्क में मज़्मूं न फैला और जूता चल पड़ा. ख़ुद मुझे भी यह शेर बेहद पसन्द है. पर इस शेर के साथ एक दिक्कत है. इस दिक्कत की वजह शायद यह है कि शिल्प के स्तर पर वह ज़रूर थोड़े-बहुत पश्चिमी मानसिकता से प्रभावित रहे होंगे. जहां साह

अथातो जूता जिज्ञासा-27

अब मध्यकाल से निकल कर अगर आधुनिक काल में आएं और जूतोन्मुखी रचनाधर्मिता की बात करें तो चचा ग़ालिब का नाम सबसे पहले लेने का मन करता है. एक तो सूफ़ियाना स्वभाव (तमाम तरह के दुराग्रहों को टाटा बाय-बाय वह पहले ही कह चुके थे) और दूसरे दुनियादारी की भी बेहतर समझ (ख़रीदारी कर के नहीं सिर्फ़ गज़रते हुए देखा था उन्होंने दुनिया के बाज़ार को), सच पूछिए तो दुनिया की हक़ीक़त ऐसा ही आदमी क़ायदे से जान पाता है. जूते की इस सर्वव्यापकता और सर्व शक्तिसम्पन्नता को उन्होंने बड़े क़ायदे से समझा और साथ ही  उसे शहद में भिगोने की कला भी उन्हें आती है. ऐसा लगता है कि रैदास और तुलसी द्वारा क़ायम की गई परंपरा को उन्होंने ही ठीक से समझा और इन दोनों को वह साथ लेकर आगे बढ़े. कभी-कभी तो उनके यहां सूर भी दिखाई दे जाते हैं. यह शायद सूर का, या कि सूफ़ी संतों का ही असर है जो वह भी ख़ुदा से दोस्ती के ही क्रम को आगे बढ़ाते हैं, यह कहते हुए - या तो मुझे मस्जिद में बैठकर पीने दे, या फिर वो जगह बता जहां पर ख़ुदा न हो . और ग़ालिब भी एक को मार कर दूसरे को छोड़ने वाले छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी नहीं हैं. वह भी अपने दूसरे पैर का जूता निकालते हैं, बि

अथातो जूता जिज्ञासा-26

यह तो आप जानते ही हैं कि भरत भाई ने भगवान राम की पनही यानी कि खड़ाऊं यहीं मांग ली थी. यह कह कर आपके नाम पर ही राजकाज चलाएंगे. भगवान राम ने उन्हें अपनी खड़ाऊं उतार के दे दी और फिर पूछा तक नहीं कि भाई भरत क्या कर रहे हो तुम मेरे खड़ाऊं का? अगर वह आज के ज़माने के लोकतांत्रिक सम्राट होते तो ज़रा सोचिए कि क्या वे कभी ऐसा कर सकते थे? नहीं न! तब तो वे ऐसा करते कि अपने जब चलते वन के लिए तभी अपने किसी भरोसेमन्द अफ़सर या पार्टी कार्यकर्ता को प्रधानमंत्री बना देते. छांट-छूंट के किसी ऐसे अफ़सर को जो ख़ुद को कभी इस लायक ही नहीं समझता कि वह देश चलाए. आख़िर तक यही कहता रहता कि भाई देखो! देश चलाने का मौक़ा मेरे हाथ लगा तो यह साहब की कृपा है. वह निरंतर महाराज और युवराज के प्रति वफ़ादार अफ़सर की तरह सरकार और राजकाज चलाता रहता. अगर कभी विपक्ष या देशी-विदेशी मीडिया का दबाव पड़्ता तो वनवासी साहब के निर्देशानुसार कह देता कि भाई देखो! ऐसा कुछ नहीं है कि मैं कठपुतली हूं. बस तुम यह जान लो कि मैं सरकार अपने ढंग से चला रहा हूं और अपनी मर्ज़ी से भी. यह अलग बात है कि किसी भी मौक़े पर वह सम्राट और युवराज के प्रति अपनी वफ़ादारी ज

अथातो जूता जिज्ञासा-25

तो साहब कविवर रहीम ने पनही ही कहा था. उन्होंने पानी नहीं कहा था. मेरा ख़याल है कि यह बात अब तक आप समझ गए होंगे. वैसे हिन्दी के हतबुद्धि और कठकरेजी आलोचकों की  तरह इतने साफ़-साफ़ तर्कों के बावजूद अगर आप न ही समझना चाहें तो भी मेरे पास आपको समझाने का एक उपाय है. और वह भी कविवर रहीम के ही शब्दों में. ग़ौर फ़रमाइए: खीरा सिर ते काटिए, मलियत नमक मिलाय रहिमन ओछे जनन को चहियत इहे सजाय. ज़रा सोचिए, इतना कड़ा प्रावधान करने वाले महाकवि रहीम भला पानी की बात क्यों करेंगे? पानी रखने का नतीजा क्या होता है, इसका सबक उन्होंने इतिहास से ले लिया था. ध्यान रहे, वह सिर्फ़ फ़ौजी थे. फ़ौजी शासक नहीं थे. इसलिए पूरे निष्ठुर नहीं हो सकते थे. अगर शासक रहे होते तब तो कवि होकर भी निष्ठुर हो सकते थे. राजनीतिक कवि तो वही होता है जो जब पूरे देश के नौजवान आत्मदाह कर रहे हों, तब अपनी कुर्सी बचाने के जोड़-तोड़ में व्यस्त होता है. पर रहीम ऐसे नहीं थे. वे तो उनमें से थे जो अपना सारा कुछ लुटा कर कहते थे : देनहार कोउ और है, ताते नीचे नैन. अगर राजनीतिक होते हो बात जस्ट उलटी होती. जनता के पैसे से ऐश करते और जनता पर एहसान लादते कि दे

गांधी इज ग्रेट ...अपने पीछे यह गधों की फौज छोड़कर जाएंगे : फिराक

भारत की असली पराजय अध्यात्म के धरातल पर नहीं बल्कि युद्ध के मैदान में हुई है...इतिहास चीख-चीख कर यही कह रहा है...सिकदंर की सेना के यहां पर हाथ पाव फूल गये थे...और उसे अपने सैनिक अभियान को बीच में छोड़कर लौटना पड़ा था...मगध की सेना के नाम से यवन सेना नायकों को अपने बीवी बाल बच्चों की याद आने लगी थी।....उसके बाद हमला पर हमला हुआ...युद्ध तकनीक में भारत मात खाया... भारत में न जाने कैसे और कब युद्ध देवता इंद्र की पूजा बंद हो गई...कहा जाता है गौतम ऋषि का शाप था इंद्र को...उनकी पत्नी गौतमी पर बुरी नजर डाली थी इंद्र ने....कहानी जो भी हो लेकिन इंद्र की पूजा बंद हो गई..मुझे इंद्र का मंदिर आज तक कहीं नहीं मिला है....यकीनन कहीं न कहीं होगा ही....लेकिन सार्जनिक तौर पर इंद्र की पूजा नहीं होती है...भारत के पतन को इंद्र के पतन के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिये...इंद्र एक प्रैक्टिकल देवता था...जो युद्ध में खुद लड़ता था, चाहे वह युद्ध किसी के भी खिलाफ क्यों न हो, और उस युद्ध का उद्देश्य कुछ भी क्यों न हो....इंद्र युद्ध का देवता था....इंद्र की पूजा न करके भारत में युद्ध के देवता की अवहेलना की गई...और भारत न

अथातो जूता जिज्ञासा-24

अथातो जूता जिज्ञासा-23 जूता चिंतन का यह क्रम संत रैदास पर आकर ठहर गया हो, ऐसा भी नहीं है. इतना ज़रूर है कि उनके बाद उनके ही जैसे जूते चलाने का रिवाज शुरू हो गया. आई मीन शहद में भिगो-भिगो कर जूते चलाने का. जूते सूर ने भी चलाए, लेकिन ज़रा धीरे-धीरे. शहद में भिगो-भिगो कर. हल्के-हल्के. जब वह कह रहे थे 'निर्गुन को को माई-बाप', तब असल में वह जूते ही चला रहे थे, लेकिन शहद में भिगो के, ज़रा हंस-हंस के. ताकि पता न चले. वही मरलस त बकिर पनहिया लाल रहे. वह साफ़ तौर पर यह जूते उन लोगों पर चला रहे थे जो उस ज़माने में एकेश्वरवाद और निर्गुन ब्रह्म को एक कट्टर पंथ के तौर पर स्थापित करने पर तुले हुए थे. अपने समय की सत्ता की शह उन्हें बड़े ज़ोरदार तरीक़े से मिली हुई थी. वह देख रहे थे कि इस तरह वे सामासिकता में यक़ीन करने वाली भारत की बहुलतावादी आस्था पर जूते चला रहे थे. जहां सभी अपने-अपने ढंग से अपने-अपने भगवान बनाने और उसमें विश्वास करने को स्वतंत्र हों, ऐसी खुली मानसिकता वाली संस्कृति का तालिबानीकरण वह बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे और इसीलिए उन्होंने कृष्ण के उस बालस्वरूप को अपने इष्ट के रूप में स्थापित क

भारत मां क्यो है, पिता क्यों नहीं ?

उन दिनो दिमाग को किताबों में घूसेड़ कर उसे बुरी तरह से थका देने के बाद थोड़ा चैन लेने शराब में डूब जाता था..फटे तक पीता था, कोनवालोय के अंदाज में। दारू कब और कैसे मुंह से लगी थी मुझे खुद याद नहीं...शायद सरस्वती पुजा के दिन। मुहल्ले भर के आवारा लौंडे सरस्वती पुजा बड़ी धुमधाम से करते थे, एक महीना पहले से ही घूम-घूम कर चंदा काटा जाता था और उसी चंदे के पैसे से पूजा के साथ-साथ दारू चलता था। हां मां सरस्वती के प्रति गहरी आस्था में कोई कमी नहीं होती थी, लेकिन यह भी सच है कि दारू उन्हीं दिनों मुंह लगा था. बाद के दिनों में शराब के नशे में डाक बंगला चौराहे की एक दुकान पर हिटलर का मीन कैंफ हाथ लगा और एक बार जब उसको पढ़ना शुरु किया तो शराब का नशा भी उसके सामने फीका लगने लगा...बस पढ़ता ही गया...पूरी किताब खत्म करने के बाद ही अगल-बगल की दुनिया दिखाई दी...और इसका हैंगओवर लंबे समय तक बना रहा...शायद यहां जो कुछ भी मैं लिख रहा हूं, वह मीन कैंफ के हैंगओवर का ही असर है। हिटलर की आत्मकथा को दुनिया का मैं सर्वश्रेष्ट आत्मकथा मानता हूं...उस आत्मकथा में एक स्पष्ट उद्देश्य दिखाई देता है, और इसी में किसी भी आत

भूंसा खोपड़ी में भरा होता है

आज क्या लिखा जाये कुछ समझ में नहीं आ रहा है, जरूरी नहीं है कि आप हर दिन कुछ लिखने की स्थिति में ही होते हैं, कई बार आपके दिमाग में कई तरह के ख्याल आते हैं और आपको लगता कि वो दुनिया के बेहतर ख्याल हैं,लेकिन आप उन्हे कलमबद्ध नहीं कर पाते हैं,और फिर वो ख्याल उड़ जाते हैं और चाहकर भी आप उन्हें दोबारा अपने दिमाग में नहीं ला पाते हैं...कई बार आप कुछ लिखना चाहते हैं, लेकिन आपके दिमाग में लिखने के लिए कुछ खास नहीं होता है। क्या लिखने के लिए किसी विषय का होना जरूरी है..???? हम बेतरतीब तरीके से नहीं लिख सकते हैं..??? कभी इधर की बात, कभी ऊधर की बात, कभी कहीं की बात...शायद लेखन कला के नजरिये से यह गलत हो... बहुत मुश्किल से लोगों ने लेखन को विभिन्न विधाओं में ढाला है...लिखने के लिए सबजेक्ट मैटर की जरूरत तो होती है...लेकिन जब आप दिमाग के पूरे कैनवास को खोलकर लिखेंगे तो शायद आपको अहसास होगा कि सबकुछ वृतीय रूप में जुड़ा है..इसका मतलब यह हुआ कि आप कही से भी शुरु करके बढ़ सकते हैं, और परिणाम शायद वही आएगा...बेहतर है लेखक की कृति के बजाय लेखक को पढ़ना...यह कहाना ज्यादा उचित होगा कि आप लेखक को नहीं उसके द

बेबाक लेखनी दावपेच का शिकार नहीं हो रही

प्रेम का पाठ पढ़ाया जाता है, जबकि हिंसा एक सहज प्रवृति है...आपके अंदर दौड़ रही होती है, खून में। लियो तोलोस्तोव कहता है, इनसान के नसों से खून निकाल कर पानी भर दो, फिर युद्ध नहीं होंगे। सभी जीव जंतुओं में हिंसा जनन और प्रजनन का आधार है। दुनियाभर के तमाम धर्मग्रंथों की रचना मानव के अंदर व्याप्त इसी मौलिक प्रवृति की रोकथाम करने के लिए की गई है। यही कारण है कि दुनिया के तमाम धर्म ग्रन्थ शांति के उपदेशों से भरे हैं, और उनमें शांति बनाये रखने की बात कही गई है। शांति एक परिकल्पना है जबकि हिंसा प्रवृति है। इसके बावजूद शांति के गीतों के बीच हिंसा का राग अलापने वाले महानयक चमकते हुये दिखते हैं, चाहे वह सिकन्दर हो, नेपोलियन हो, चंगेज खान हो,सम्राट अशोक हो, या फिर फ्यूरर। ये लोग इतिहास की छाती पर मजबूती से पांव रखे हुये नजर आते हैं, और उस वक्त तमाम धर्मग्रन्थ प्रलाप की मुद्रा में दिखते हैं। मजे की बात है कि सामुहिक रूप से हिंसा का काफिला शांति शांति करते हुये आगे बढ़ता है। उस पेंटर लौंडिया को मेरी आंखों में हिंसा दिखाई देता था, जबकि उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में मैं डूबता जाता था। उसके मुंह से निकलन

अलग- अलग उम्र की अलग-अलग लड़कियों की टोलियां

कुछ समय है लिख सकता हूं...दिमाग का घोड़ा दौड़ रहा..शोले के गब्बर सिंह के घोड़े की तरह...वेसे वसंती के घोड़े के नाम धन्नु था..घोड़ों ने इनसान को गति प्रदान की है...इनसान को हवा से बात करने की अदा है...मशीनी युग आज भी होर्स पावर जैसे शब्दे मेजरमेंट के इकाई बने हुये हैं। नगालैंड की घाटियों से निकल कर शहर में पटका खाने के बाद सबकुछ जुदा -जुदा सा लग रहा था...कमरे में बंद होकर पंखा की हवा खाने से शरीर में शरीर में अकड़ने होती थी...और लोटने के लिये कहीं मिट्टी का टिला भी नहीं था...नगालैंड में लकड़ी के मकान में रहता था...वह मकान जमीन से पांच फीट ऊपर था...लकड़ी के मोटे-मोटे पाये पर खड़ा था...और अक्सर जंगली सुअर रात बिताते थे...उनकी गुर्राहट को सुनते हुये सोने की आदत थी...पहाड़ी जिंदगी बैखौफ होती है, जबकि मैदानी इलाके के गली मोहल्लों में चिपचिपाहटत होती है..हर स्तर पर। शाम को दरबे से निकल कर छत पर जाने की इजाजत थी...एक ही मकान में पच्चीस तीस परिवार रहते थे...वह मकान उस मोहल्ले के जमींदार का था...एक बदरंग शरीर वाला मुंशी सभी लोगों से हर महीने किराय वसुलने आता था, एक उबड़ खाबड़ साइकिल से।शाम को व

अथातो जूता जिज्ञासा-23

(भाई लोगों ने बड़ी राहत महसूस की होगी कि चलो अब जूता नहीं पड़ेगा. लेकिन नहीं साहब, जूता अभी थका नहीं है. अभी उसकी यात्रा पूरी भी नहीं हुई है. सच तो यह है कि जूता चिंतन जब अपने शवाब की ओर बढ़ ही रहा था, तभी मुझे यानी जूता चिंतक को वक़्त के कुछ जूते बर्दाश्त करने पड़ गए. बस इसीलिए जूता चिंतन को लिपिबद्ध करने की प्रक्रिया ज़रा थम सी गई थी. पर अब मैं फिर मैदान में हाजिर हूं और तब तक हाजिर ही रहूंगा जब तक कि फिर कोई जूता नहीं पड़्ता या चिंतन की प्रक्रिया अपनी चरम परिणति तक नहीं पहुंच जाती.) अथातो जूता जिज्ञासा-22 जूते बनाने वाला हमेशा सबसे ख़राब जूते ही पहनता है, यह कहावत जितनी पश्चिम में सही है उससे कहीं ज़्यादा सही यह हमारे भारतीय परिप्रेक्ष्य में है. ग़ौर करे तो आप पाएंगे कि हमारे भारत महान में तो बहुत दिनों तक जूते बनाने वाले के लिए जूते पहनना ग़ुनाह जैसी बात रही है. यहां जूते पहनने की अनुमति सिर्फ़ उन्हें ही रही है जो जूते चलाना जानते थे. बिलकुल वैसे ही जैसे फ्रांस की वह रानी साहिबा - मैरी अंतोनिएत. पर अब जूते बनाने वाले भी यहां जूते पहनने लगे हैं और यक़ीन मानिए उन्हें भी यह नसीब तभी हुआ है जब उन

उन गालियों की कनेक्टिविटी अदभुत थी

कभी कभी दिमाग की दही निकल जाती है, आप सोचते कुछ हैं, चाहते हैं कुछ है और होता कुछ है...इनसानी खोपड़ी भी अजीब है। एसी स्थिति में बेहतर है दिमाग को रिर्वस में ले जाकर थोड़ी देर के लिए उन पलों को जिंदा कर कर लिया जाये,जिन्होंने कभी आपको गुदगुदाया है। यह एक थेरेपी है, जिसका इस्तेमाल आप कर सकतेहैं, और यकीनन आपको लाभ लोगा...कम से कम मुझे तो होता है। मुखा सिंह के बारे में एक कवावत प्रसिद्ध था, अपना मैल भी फ्री में नहीं देने वाले हैं...साठ साल के हो गये थे, लंबाई छह फीट चार इंच, हाथ में एक डंडा, मैली कुटैली धोती हमेशा ठेहूने तक लटकती थी...और उसकी उजली गंजी पूरी तरह से बदरंग हो चुकी थी...उस मटमैले मुहल्ले के कुछ लोगों ने उसके कान में फूंक दिया था, कि मरने के पहले कुछ एसा काम कर जाओ कि लोग याद करेंगे, वैसे भी तुम अगला जाड़ा नहीं झेस सकोगे...मरने के नाम पर वह लोगों हजारों गालियां निकालता था, दुनियाभर के तमाम रिश्तों के साथ उन गालियों की कनेक्टिविटी अदभुत थी...प्रतियोगिती परीक्षाओं में रिश्तों से संबंधित प्रश्न ठोकने वाले बाबू लोग भी कनेक्टिविटी निकालने में अकबका जाते....उदाहरण के दौर पर दादी धिकल

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