थ्री फिफ्टीन (कहानी)
आलोक नंदन बाहर के लौंडे कैंपस के अंदर रंगदारी करने आ ही जाते थे। सभी झूंड में होते थे, इसलिए उनसे कोई उलझता -नहीं था। किसी की भी साइकिल को छिन लेना और लप्पड़ थप्पड़ कर देना उनके लिए मामूली बात thi, सिगरेट के छल्ले उड़ाने जैसा। श्रेया पूरे कालेज की माल थी, चुपके-चुपके हर कोई उसको अपने सपनों की हीरोईन समझता था। कुछ ज्यादा बोलने वाले लौंडे ग्रुपबाजी में बैठकर आपस में ही श्रेया की खूब ऐसी तैसी करते थे, उसके नाकों में पड़ी नथ से लेकर उसके रूमाल तक की चर्चा होती थी। अब ये लौंडों की औकात पर निर्भर करता था कि कौन क्या बोलता है। उनकी बातों को सुनकर एसा लगता था कि कोका पंडित से लेकर कालीदास तक श्रेया के मामले में फेल हो जाते। प्रैक्टिकल रूम में हाथों में दस्तानों के साथ जार लिये लौंडों की बातें श्रेया की रेटिना से शुरू होकर कहां-कहां घूमती थी कोई नहीं जानता था। भोलुआ बाहरी था, लेकिन छूरा और गोली चलाने का उसका हिस्ट्री रिपोर्ट अंदर के प्रैक्टिकल से लेकर स्पोर्ट्स तक के लौंडों पर भारी पड़ता था। यदि गलती से वह किसी क्लास में घुस जाता था तो प्रोफेसर और लड़के यही सोचते थे कि कैसे जल्दी क्लास खत्म...