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आख़िर कब तक और क्यों ढोएँ हम?

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हमारी अपनी ही आबादी 134 करोड़ पार कर चुकी है. यह रुकने का नाम नहीं ले रही है. घटने की तो बात ही बेमानी है. यह बढ़ती आबादी हमारे लिए एक बड़ी मुसीबत है. वे लोग जो आबादी को ह्यूमन रिसोर्स और इस नाते से लायबिलिटी के बजाय असेट मानने की दृष्टि अपनाने की बात करते हैं , जब इस ह्यूमन रिसोर्स के यूटिलाइज़ेशन की बात आती है तो केवल कुछ सिद्धांत बघारने के अलावा कुछ और कर नहीं पाते. दुनिया जानती है कि ये सिद्धांत कागद की लेखी के अलावा कुछ और हैं नहीं और कागद के लेखी से कुछ होने वाला नहीं है. ये कागद की लेखी वैसे ही है जैसे किसी भी सरकार के आँकड़े. जिनका ज़मीनी हक़ीक़त से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता. आँखिन की देखी के पैमान पर इन्हें कसा जाए तो ये प्रायः झूठ और उलझनों के पुलिंदे साबित होते हैं. इस बढ़ती आबादी से पैदा होने वाली उलझनों की हक़ीक़त ये है कि देश में बहुत बड़ी आबादी या तो बेरोज़गारी की शिकार है या फिर अपनी काबिलीयत से कमतर मज़दूरी पर कमतर रोज़गार के लिए मजबूर. इस आबादी में हम और आबादी जोड़ते जा रहे हैं. नए-नए शरणार्थियों का आयात कर रहे हैं. दुनिया भर के टुच्चे नियम-क़ानून और बेसिर-पैर ...

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