इसीलिए तो जिलाते रहे 370
ओशो ने कहीं कहा है कि किताबें लिखना इंसानों के हाथ में था. लिहाजा उन्होंने अपने को सर्वश्रेष्ठ लिख दिया. अब जब तक किसी दूसरे जानवर के हाथ में किताबों से बेहतर कोई अस्त्र न आ जाए, या दूसरे जानवरों को भी किताबें लिखना न आ जाए, मानकर चलिए कि हमें यही मानना पड़ेगा. अगर हमसे पहले गधों को किताबें लिखनी आ गई होतीं तो जानते हो वो क्या लिखते? वो भी यही लिखते - और तब खुदा न अपनी ही शक्ल में गधों को बनाया. मुझे यह बात सच के बहुत करीब लगती है. लोक में भी एक उक्ति प्रचलित है. जो जैसा होता है, वो दूसरों के बारे में भी वैसा ही सोचता है. एक शाकाहारी सोचता है कि लोग मांस कैसे खा लेते हैं. ठीक उसी तरह मांसाहारी भी सोचता है कि यार, घास-पात पर लोग ज़िंदा कैसे रह लेते हैं. दोपहर तक बिस्तर मेल्हने वाले सोचते हैं कि यार लोग भोर में ही उठ कैसे जाते हैं! शरीर में कुछ आराम-वाराम करने का मन नहीं होता क्या? जो सुबह उठकर टहलने या काम पर जाने के अभ्यस्त हैं, वे सोचते हैं कि लोग इतनी देर सोए कैसे रह लेते हैं? बिस्तर पर पड़े रहा कैसे जाता है इनसे? यह बात केवल आहार-विहार ही नहीं, आचरण और चरित्र के मामले में भी उतनी...