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हमारी फितरत है भटक जाना

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हम भारतीय लगातार यह कहते रहते हैं कि सरकारें बदल जाती हैं लेकिन मूलभूत समस्याएँ जस की तस रहती हैं. बदलाव केवल कुर्सियों पर बैठने वाले चेहरों में होता है, उनके चाल-चरित्र में बिलकुल नहीं. व्यवस्था और उसके तौर-तरीक़े हर हाल में वही के वही बने रहते हैं. जानते हैं क्यों? क्योंकि हम अपने लक्ष्य से बहुत जल्दी भटका दिए जाते हैं. थोड़ा ग़ौर से देखें, भटकने की यह आदत कुछ-कुछ हममें ख़ुद भी है. हम दिल्ली की बात करते-करते कब दौलताबाद पहुँच जाएँ, ये हमें ख़ुद ही पता नहीं चलता. साहित्य में कुछ विधाएँ हैं इसी मूलभूत प्रवृत्ति को समेटे हुए. यद्यपि साहित्य में इन विधाओं में रचनाओं को कसी हुई और सधी हुई तभी माना जाता है जब ये चाहें जहाँ तक जाकर अपने मूलभूत बिंदु पर लौट आएँ और इनका सब जगह जाना केवल वह साबित करने के लिए हो जो शुरुआत में उठाया गया था. लेकिन आमजन में और उसकी बात में यह नहीं होता. वह हँसते-हँसते रोने लगता है और प्यार की बात करते-करते लड़ने लगता है. जानते हैं ऐसा क्यों होता है? क्योंकि हम भटक जाते हैं और भटकने के बाद ऐसे गुम होते हैं कि भूल ही जाते हैं कि हम कहाँ के लिए चले थे. जब हम अपना...

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