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साहित्यिक कमी को पूरा करेगी अनुस्वार: प्रो. राजेश कुमार

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कामिनी मिश्र इंडिया नेटबुक्स प्रकाशन की नई पत्रिका अनुस्वार के आवरण का विमोचन करते हुए सुप्रसिद्ध साहित्यकार और समालोचक प्रोफ़ेसर राजेश कुमार ने कहा कि यह पत्रिका एक बहुत बड़े साहित्यिक वैक्यूम को पूरा करेगी। ऐसा इसलिए कि इस समय ऐसी स्तरीय पत्रिकाओं की बहुत कमी है जो साहित्य का विकास करते हुए पाठकों को रुचिपूर्ण और सार्थक साहित्य उपलब्ध करवा सकें। हर्ष का विषय है कि अनुस्वार पत्रिका रंगारंग पत्रिका होगी जिसमें सभी विधाओं की रोचक और श्रेष्ठ रचनाएं प्रकाशित होंगी और प्रतिष्ठित साहित्यकारों को स्थान दिया जाएगा। राजेश जी ने आगे कहा कि त्रैमासिक आधार पर प्रकाशित होने वाली है इस पत्रिका का पाठकों को पहले से ही प्रतीक्षा बढ़ गई है और आकर्षण का विषय बन चुकी है। सभी लोग इसका उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हैं। अनुस्वार पत्रिका के आवरण के लोकार्पण के अवसर पर साहित्य अकादेमी से सम्मानित साहित्यकार डॉ दिविक रमेश ने अपने संदेश में कहा कि आज जबकि साहित्य को स्थान देने वाली पत्रिकाएँ बंद हो गई हैं या बंद होने के कगार पर हैं तथा ऐसे कितने ही समाचार पत्रों के साहित्यिक पृष्ठ शुष्क हो चुके हैं , साहित्यि...

हिंदी वालों का दंभ और समाज में उनकी भूमिका

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इष्ट देव सांकृत्यायन 60 के बाद की जो हिंदी है , दंभ से उसका चोली-दामन का साथ है। क्योंकि 47 में जो संविधान सभा के बहुमत के बावजूद हिंदी के राष्ट्रभाषा बनाए जाने का विरोध कर रहे थे और आखिरकार उसे अपने षड्यनत्रकारी दुष्चक्र में फँसाकर राजभाषा के दायरे में सीमित कर ही डाला , उन्होंने ही अपने उसी षड्यंत्र चातुर्य का उपयोग कर हिंदी की छाती पर अपने वर्चस्व का खूँटा गाड़ लिया। यह किस एक महापुरुष की कृपा का फल है , इस पर बार-बार बोलने का कोई लाभ नहीं। लेकिन जब बात समाज को बचाने में साहित्य की भूमिका की आएगी तो उन्हीं दंभियों में से कई अपनी वे कीलें ले-लेकर निकल आएंगे जो उन्होंने कभी हिंदी सेवा के नाम पर हिंदी भाषा , साहित्य और समाज के चक्के में ठोंकी थीं। उन्होंने वे कीलें ठोंकी तो थीं हिंदी के चक्के की हवा निकालने के लिए , लेकिन सहस्राब्दियों से वंचित समाज की अंतर्निहित चेतना ने उसका भी उपयोग कर लिया। वह उपयोग उसने अपनी मजबूती बढ़ाने में किया। आखिरकार गाड़ी और ज्यादा मजबूती से समय की सड़क पर जम गई और बेहवा ही चलने लगी । लढ़िये की तरह। लढ़िये की ये खासियत है कि वह ज़रा धीमे चलती है , लेकिन जब...

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