यात्रा संस्मरण एक दिन अलवर तक -हरिशं कर राढ़ी हरिशंकर राढ़ी : सिलसेढ़ लेक पर ऐसा नहीं है कि यात्रा हुए कोई लंबा अरसा बीत गया था, लेकिन मुझे लग रहा था। अभी पिछले महीने ही वैष्णो देवी की यात्रा से आया था। इधर अप्रैल में छुट्टियाँ दिख रही थीं और उसका उपयोग कर आने का मन था। बेटी के पास समय बिल्कुल नहीं होता, इसलिए पूरे परिवार का एक साथ निकलना मुश्किल था। छुट्टी दिखी तो योजना बनी कि ऋषिकेश हो आते हैं। बेटी का हिसाब नहीं बना। तो चलिए एक दिन के लिए कहीं चलते हैं। कहाँ चलें? कुरुक्षेत्र हो आते हैं। लेकिन कुरुक्षेत्र मैं दो बार घूम चुका हूँ। मथुरा-वृंदावन जाने का न तो मन होता है और न कुछ देखने के लिए खास है। अंततः बेटी ने कहा कि अलवर चलते हैं। अपने को तो बस कहीं निकल जाने से भी संतोष हो जाता है, इसलिए ठीक है। हमारी यात्राएँ प्रायः रेलगाड़ी से होती हैं। कभी-कभी चौपहिया से भी हुई हैं। इधर पिछले साल से अपने पास भी एक गाड़ी हो गई, लेकिन उस गाड़ी से हम दिल्ली से बाहर यात्रा पर एक ही बार मथुरा तक के लिए निकल पाए थे। वह यात्रा बहुत संतोषप्रद नहीं थी। अलवर की बात आते ही सरिस्का अभयारण्य दिम...