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बाज़ार

मुमताज़ अज़ीज़ ना ज़ाँ यहाँ हर चीज़ बिकती है कहो क्या क्या ख़रीदोगे यहाँ   पर मंसब-ओ-मेराज की   बिकती हैं ज़ंजीरें अना को काट देती हैं   ग़ुरूर-ओ-ज़र की शमशीरें यहाँ   बिकता है तख़्त-ओ-ताज बिकता है   मुक़द्दर भी ये वो बाज़ार है बिक जाते हैं इस में सिकंदर भी यहाँ बिकती है ख़ामोशी भी ,  लफ़्फ़ाज़ी भी बिकती है ज़मीर-ए-बेनवा की हाँ   अना साज़ी भी बिकती है दुकानें हैं सजी देखो यहाँ पर हिर्स-ओ-हसरत की हर इक शै मिलती है हर क़िस्म की ,  हर एक क़ीमत की यहाँ ऐज़ाज़ बिकता है ,  यहाँ हर राज़ बिकता है यहाँ पर हुस्न बिकता है ,  अदा-ओ-नाज़ बिकता है सुख़न बिकता है ,  बिक जाती है शायर की ज़रुरत भी यहाँ बिकती है फ़नकारी ,  यहाँ बिकती है शोहरत भी यहाँ पर ख़ून-ए-नाहक़ बिकता है ,  बिकती हैं लाशें भी यहाँ बिकती हैं तन मन पर पड़ी ताज़ा खराशें भी यहाँ नीलाम हो जाती है बेवाओं की मजबूरी यहाँ बीनाई बिकती है ,  यहाँ बिकती है माज़ूरी लहू बिकता है ,  बिकते हैं यहाँ अ ’ अज़ा-ए-इंसानी यहाँ   बिकते हैं दो दो पैसों में जज़्बात-ए-निस्वानी मोहब्बत ,  जज्बा-ओ-हसरत ...

सवाल

  मुमताज़ अज़ीज़ नाज़ाँ एक बेटी ने ये रो कर कोख से दी है सदा मैं भी इक इंसान हूँ ,  मेरा भी हामी है ख़ुदा कब तलक निस्वानियत का कोख में होगा क़िताल बिन्त ए हव्वा पूछती है आज तुम से इक सवाल   जब भी माँ की कोख में होता है दूजी माँ का क़त्ल आदमीयत काँप उठती है ,  लरज़ जाता है अद्ल देखती हूँ रोज़ क़ुदरत के ये घर उजड़े हुए ये अजन्मे जिस्म ,  ख़ाक ओ ख़ून में लिथड़े हुए   देख कर ये सिलसिला बेचैन हूँ ,  रंजूर हूँ और फिर ये सोचने के वास्ते मजबूर हूँ काँप उठता है जिगर इंसान के अंजाम पर आदमीयत की हैं लाशें बेटियों के नाम पर   कौन वो बदबख़्त हैं ,  इन्साँ हैं या हैवान हैं मारते हैं माओं को ,  बदकार हैं ,  शैतान हैं कोख में ही क़त्ल का ये हुक्म किसने दे दिया जो अभी जन्मी नहीं थी ,  जुर्म क्या उसने किया   मर्द की ख़ातिर सदा क़ुर्बानियाँ देती रही माँ है आदमज़ाद की ,  क्या जुर्म है उसका यही ? वो अज़ल से प्यार की ममता की इक तस्वीर है पासदार ए आदमीयत ,  ख़ल्क़ की तौक़ीर है   ये व...

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