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चुलबुली यादें

हम और बिरना खेलें एक संग मैया, पढ़ें इक संग, बिरना कलेवा मैया ख़ुशी -ख़ुशी दीनों, हमरा कलेवा मैया दीयो रिसियाए . मुझे याद है कन्या भ्रूण की सुरक्षा हेतु और बालक-बालिकाओं को सम।नता का दर्जा देने के लिए उन दिनों दूरदर्शन पर इक बड़ा ही प्यारा विज्ञापन आता था. जिसके जरिये पूरा संदेश भी था और वो इस क़दर मन में बसा जो हूबहू मुझे आज तक याद है. तब शायद चैनलों की बाढ़ नहीं आयी थी. तभी तो अश्लीता की गुंजाइशें भी नहीं होती थीं. खैर अब तमाम चैनलों के चलते दूरदर्शन का एंटीना कहीं कुचल गया. क्योंकि इसको लगा डाला तो लाइफ झींगालाला. इतने चैनलों को देखने के लिए बस बटन दबाते रहो, कुछ दिखे तो वहीं रोक दो वरना आगे बढ जाओ. खैर इसमें बढने की कोई कोशिश नहीं करनी होती क्योंकि इसमें एक के साथ एक फ्री जो मिल जाता है. हम वापस पुराने विज्ञापनों की बात करें तो एक और याद आ रहा है हॉकिंस की सीटी बजी खुशबू ही खुशबू उड़ी......... उस वकत सौम्यता का जामा पहने ऐसे न जाने कितने विज्ञापन होंगे. आपको शायद याद हो एक छोटी सी डाँक्युमेंटरी फिल्म आती थी बच्चों के लिए प्रायोजित कार्यक्रम था " सूरज एक चन्दा एक, एक-एक करके तारे...

मौसम का सुरूर मेरा कुसूर

मैंने अब तक यह सुना था कि आज मौसम बड़ा बेईमान है. हकीकत का आज पता चल गया. लंबे इंतज़ार के बाद जब आज बारिश हुई तो लगा सिर मुड़ते ही ओले बरसने लगे. हुआ यूं कि जल्दी उठकर दफ्तर पहुंचने की तैयारी की और रिमझिम फुहारों का सिलसिला बंद होने के आसार नजर नहीं तो अपने तीन मंजिले ऊपर के मकान से नीचे उतरे. ज्यों ही गाडी स्टार्ट की, उसका स्टार्टिंग बटन चलने को राजी ही नहीं हो रह था. करते-करते मैं आधे से अधिक भीग गई, जितना कि ऑफिस पहुचने पर भी न भीगती. साथ ही सोसाइटी के कम से कम 8 लोगों ने आजमाइश भी की लेकिन अपनी धन्नो टस से मस न हुई. बाद मे पता चला कि पड़ोस मे रखी दूसरी उसी प्रजाति की गाडी बगल मे मुह बाए खडी मौसम का मजा ले रही थी. ऐसे में धन्नो मेरे साथ जाने को तैयार न थी. मौसम का सुरूर देखिए. लेकिन भला बताइए इसमे मेरा कुसूर क्या था? आख़िर वो मुझसे बेईमानी कर ही गया. जय बाबा भोलेनाथ. जय राम जी की. इला श्रीवास्तव

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