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  एक समृद्ध शाम - हरिशंकर राढ़ी (यह आलेख/ संस्मरण दिनांक 04 अक्टूबर, 2023 को लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'जनसंदेश टाइम्स' में प्रकाशित है) साहित्य मनीषी प्रो. रामदरश मिश्र जी से मिलना हमेशा ही सुखकर , प्रीतिकर एवं ऊर्जस्विता से भरपूर होता है। यह अपना सौभाग्य ही है कि जब मन होता है , मिश्र जी से मिल लिया करता हूँ। हाँ , इतना ध्यान अवश्य रखता हूँ कि उनका स्वास्थ्य ठीक चल रहा हो ; मेरे कारण उन्हें कोई असुविधा न हो। वैसे , उनका स्वभाव ही ऐसा है कि उन्हें किसी से असुविधा नहीं होती , बशर्ते वह भी उनकी उम्र एवं निष्कलुष मानसिकता को समझता हो। डॉ रामदरश मिश्र जी, प्रो स्मिता मिश्र जी, श्री ओम निश्चल जी और बद्री प्रसाद जी  मिश्र जी से मिलने का कोई विशेष कारण नहीं होता। बस जब भी उनके सान्निध्य की व्याकुलता होती है , बात की और चल दिए। बात तो होती ही रहती है। पिछले 15 अगस्त को जब उनका जन्म शताब्दी समारोह प्रारंभ हुआ था , तब से ऊर्जा एवं गर्व का स्तर अपने आप उठ गया है। समारोहों का साक्षी बनने का अपना आनंद है तो अलग से मिलने का अलग। मिश्र जी के कालखंड में होने व मिलते रहने का तात्पर्य ह...

आत्मबल और धैर्यः कोरोना से जंग जीतने के सबसे बड़े हथियार

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विजय विनीत भयानक सुनामी की तरह मेरी जिंदगी में घुसा कोरोनावायरस। महामारी से भीषण लड़ाई भी हुई। इस लड़ाई ने हमें मुझे बहुत कुछ सिखाया। ताकत का एक बड़ा मंत्र दिया। कोरोना से लड़ने का सबसे बड़ा हथियार-धैर्य और आत्मबल। हम कोरोना की भयावहता को जानते थे। ये भी जानते थे कि यह यह महामारी जान भी ले सकती है। चौदह दिनों तक इस बीमारी का भयंकर कष्ट सहा। रात कराहते बीतती थी। लेकिन मेरा आत्मबल जरा भी कम नहीं हुआ। मैं टूटा नहीं। अपनी जिंदगी का फैसला खुद करता रहा। संज्ञाहीन (कोमा) होने के पहले और बाद में भी। वाइप ऐप के बगैर आक्सीजन के सांस लेना मुश्किल था , पर चेहरे पर तनिक भी शिकन नहीं आने दी। परिजनों और शुभचिंतकों से जब भी बातें होती थी , तो अपनी सेहत के बारे में ढेरों झूठी बातें और कहानियां सुना देता था। अस्पताल में जिनके फोन आते थे , उनसे खूब बातें करता था। उत्साह से बोलता था। एहसास नहीं होने देता था कि कोरोना मेरा कुछ बिगाड़ पाएगा। 26 जुलाई को अस्पताल के डा. सारस्वत राठौर ने मेरी बातें सुन ली। यूं तो वो रोज ही मुझे अल्टीमेटम दिया करते कि आपकी स्थिति ठीक नहीं है...। वह अक्सर नसीहत देते थे। आप य...

रामेश्वरम में

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हरिशंकर राढ़ी दोपहर बाद का समय हमने घूमने के लिए सुरक्षित रखा था और समयानुसार ऑटोरिक्शा  से भ्रमण शुरू  भी कर दिया। पिछले वृत्तांत में गंधमादन तक का वर्णन मैंने कर भी दिया था। गंधमादन के बाद रामेश्वरम द्वीप पर जो कुछ खास दर्शनीय  है उसमें लक्ष्मण तीर्थ और सीताकुंड प्रमुख हैं। सौन्दर्य या भव्यता की दृष्टि  से इसमें कुछ खास नहीं है। इनका पौराणिक महत्त्व अवश्य  है । कहा जाता है कि रावण का वध करने के पश्चात्  जब श्रीराम अयोध्या वापस लौट रहे थे तो उन्होंने सीता जी को रामेश्वर  ज्योतिर्लिंग के दर्शन  के लिए, सेतु को दिखाने के लिए और अपने आराध्य भगवान शिव  के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए पुष्पक  विमान को इस द्वीप पर उतारा था और भगवान शिव की पूजा की थी। यहाँ पर श्रीराम,सीताजी और लक्ष्मणजी ने पूजा के लिए विशेष  कुंड बनाए और उसके जल से अभिषेक  किया । इन्हीं कुंडों का नाम रामतीर्थ, सीताकुंड और लक्ष्मण तीर्थ है । हाँ,  यहाँ सफाई  और व्यवस्था नहीं मिलती और यह देखकर दुख अवश्य  होता है। स्थानीय दर्शनों  में हनुमा...

मुर्दा आचरण के खिलाफ

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इष्ट देव सांकृत्यायन आज वह दिन है जब आचार्य रजनीश ने इस दुनिया से विदा ली थी. आचार्य रजनीश से मेरी कभी मुलाक़ात तो नहीं हुई, रूबरू कभी उनको देखा भी नहीं. जब तक वह थे तब तक उनके प्रति में भी वैसे ही विरोध भाव से भरा हुआ था, जैसे वे बहुत लोग हैं जिन्होंने उनको ढंग से पढा-सूना या जाना नहीं. और यह कोई आश्चर्यजनक या अनहोनी बात नहीं हुई. मैंने उन्हें जाना अचानक और वह भी कबीर के मार्फ़त. हुआ यों कि में अपनी बड़ी बहन के घर गया हुआ था और वहाँ जीजा जी के कलेक्शन में मुझे एक किताब मिली 'हीरा पायो गाँठ गठियायो'. यह कबीर के कुछ पदों की एक व्याख्या थी. सचमुच यह हीरा ही था, जिसे मैंने गाँठ गठिया लिया. कबीर के पदों की जैसी व्याख्या रजनीश ने की थी, वैसी अन्यत्र दुर्लभ है. यहाँ तक कि हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे साहित्य के बडे आलोचकों और व्याख्याकारों से भी नहीं मिल पाई थी. हालांकि तब मैंने उसे अपनी काट-छाँट के साथ पढा था. चूंकि पूरी तरह नास्तिक था, आत्मा-परमात्मा में कोई विश्वास मेरा नहीं था, इसलिए जहाँ कहीं भी वैसी कोई बात आई तो मैंने मन ही मन 'सार-सार को गहि रही, थोथा देई उड़ाय' वाले भाव...

...कच्चे ही हो अभी त्रिलोचन तुम!

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इष्ट देव सांकृत्यायन तारीख 9 दिसम्बर 2007 दिन रविवार होने और अरसे बाद रविवार को रविवारी फुर्सत मिलने के कारण में पूरी तफरीह के मूड में था. करीब शाम को आए विनय और देर तक लुक्कड़ई होती रही. बाद में हम उनके ही घर चले गए और वहीं टीवी आन किया. रात साढ़े नौ बजे. मैंने टीवी खोला तो था डीडी भारती का कार्यक्रम 'सृजन' देखने के लिए, पर पहले सामने कोई न्यूज चैनल आ गया. इसके पहले की चैनल सरकाता, नीचे चल रहे एक प्रोमो पर ध्यान गया- "हिन्दी के वरिष्ठ कवि त्रिलोचन का निधन"। सहसा विश्वास नहीं हुआ. इसके बावजूद कि त्रिलोचन इधर काफी समय से बीमार पड़े थे मन ने कहा कि यह शायद किसी और त्रिलोचन की बात है. हालांकि वह किसी और त्रिलोचन की बात नहीं थी. यह तय हो गया ख़बरों के हर चैनल पर यही खबरपट्टी चलते देख कर. यह अलग बात है कि शास्त्री जी के बारे में इससे ज्यादा खबर किसी चैनल पर नहीं थी, पर उस दिन में लगातार इसी सर्च के फेर में फिर 'सृजन' नहीं देख सका। इस प्रलय के बाद फिर सृजन भला क्या देखते! हिन्दी में आचार्य कोटि के वह अन्तिम कवि थे। एक ऐसे कवि जिसमें आचय्त्व कूट-कूट कर भरा था, पर उसका ...

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