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भाजसं: कोरोना के विरुद्ध सतर्क रहने की शपथ

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अंकुर विजयवर्गीय नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कोरोना के खिलाफ सतर्क रहने के लिए शुरू किए गए जन आंदोलन के तहत सोमवार को भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के समस्त अधिकारियों और कर्मचारियों ने जागरुक रहने की शपथ ली। इस मौके पर आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने सभी लोगों के साथ मिलकर ये संकल्प लिया कि वह कोराना के प्रसार को रोकने के लिए सभी आवश्यक सावधानियां बरतेंगे। प्रो. द्विवेदी ने कहा कि हम एक साथ मिलकर ही कोविड- 19 के खिलाफ इस लड़ाई को जीत सकते हैं। कार्यक्रम में संस्थान के अपर महानिदेशक श्री सतीश नम्बूदिरीपाद , प्रो. आनंद प्रधान , प्रो. अनुभूति यादव , प्रो. सुनेत्रा सेन नारायण एवं श्रीमती नवनीत कौर भी मौजूद थे। प्रधानमंत्री द्वारा गुरुवार को कोरोना के प्रसार को रोकने के लिए इस जन आंदोलन की शुरुआत की गई थी। आगामी त्योहारों और सर्दियों के मौसम के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के पुनः खुलने के मद्देनजर यह अभियान शुरू किया गया है। इस जन आंदोलन के जरिए मास्क पहनने , दो गज की दूरी का पालन करने और लगातार हाथों की सफाई करने का संदेश दिया जाएगा।

आत्मबल और धैर्यः कोरोना से जंग जीतने के सबसे बड़े हथियार

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विजय विनीत भयानक सुनामी की तरह मेरी जिंदगी में घुसा कोरोनावायरस। महामारी से भीषण लड़ाई भी हुई। इस लड़ाई ने हमें मुझे बहुत कुछ सिखाया। ताकत का एक बड़ा मंत्र दिया। कोरोना से लड़ने का सबसे बड़ा हथियार-धैर्य और आत्मबल। हम कोरोना की भयावहता को जानते थे। ये भी जानते थे कि यह यह महामारी जान भी ले सकती है। चौदह दिनों तक इस बीमारी का भयंकर कष्ट सहा। रात कराहते बीतती थी। लेकिन मेरा आत्मबल जरा भी कम नहीं हुआ। मैं टूटा नहीं। अपनी जिंदगी का फैसला खुद करता रहा। संज्ञाहीन (कोमा) होने के पहले और बाद में भी। वाइप ऐप के बगैर आक्सीजन के सांस लेना मुश्किल था , पर चेहरे पर तनिक भी शिकन नहीं आने दी। परिजनों और शुभचिंतकों से जब भी बातें होती थी , तो अपनी सेहत के बारे में ढेरों झूठी बातें और कहानियां सुना देता था। अस्पताल में जिनके फोन आते थे , उनसे खूब बातें करता था। उत्साह से बोलता था। एहसास नहीं होने देता था कि कोरोना मेरा कुछ बिगाड़ पाएगा। 26 जुलाई को अस्पताल के डा. सारस्वत राठौर ने मेरी बातें सुन ली। यूं तो वो रोज ही मुझे अल्टीमेटम दिया करते कि आपकी स्थिति ठीक नहीं है...। वह अक्सर नसीहत देते थे। आप य...

कोरोना के बाद की दुनिया-3

इष्ट देव सांकृत्यायन  तो क्या अब केवल अपनी इस आर्थिक ताक़त के भरोसे चीन दुनिया का नंबर एक बन जाएगा। यह सिर्फ सोचने की बात होगी। जब अमेरिका इस रास्ते पर बढ़ रहा था तब और भी कई देशों के पास आर्थिक और सामरिक ताक़त उससे बेहतर थी। विचारधारा के तौर पर लगभग वे सभी कमोबेश पूँजीवाद के समर्थक थे , लेकिन वे बन नहीं सके। पूँजीवाद को बाजारवाद तक सीमित मान बैठे पालतू बुद्धिजीवियों ने इस बात पर विचार करने की कभी जरूरत भी नहीं समझी कि ऐसा क्यों हुआ। एक विचार के तौर पर देखें तो पूँजीवाद खामियों से भरा हुआ है। लेकिन जो लोग सोचते हैं कि साम्यवाद उससे भिन्न है , वे बहुत बड़े मुगालते में हैं। मार्क्स ने जो कल्पना दी थी और लेनिन या माओ ने उसे जिस रूप में धरती पर उतारा , उन दोनों के बीच उतना ही अंतर है जितना जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के शब्दों में इस्लाम और मुसलमान में। दोनों ही ने उसे अव्यावहारिक , अप्रासंगिक और यहाँ तक कि अमानवीय सिद्ध कर दिया। अपनी खामियों के बावजूद पूँजीवाद आमजन को एक सेफ्टी वॉल्व देता है। तथाकथित साम्यवाद वह भी बंद कर देता है। चीन के मामले में उसके साथ पूरी दुनिया में विश्वास और भरोसे की विहीनत...

बाजार और सभ्यताओं के युद्ध मे पिस रही है दुनिया

संजय तिवारी याद कीजिये। पिछली सदी का आखिरी दशक। विश्व मे कपड़ा उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र सूरत। सूरत के कपड़ो की मांग पूरी दुनिया मे बढ़ गयी थी। वे अन्य देश सूरत के इस प्रभुत्व से परेशान थे जो कपड़े का उत्पादन कर रहे थे। अचानक सूरत में प्लेग का संक्रमण हो गया। सूरत तबाह हो गया। उस समय भी सूरत से मजदूरों का वैसा ही पलायन हो रहा था जैसा आज आनंद विहार के जरिये दिखाया जा रहा है। उस समय सूचना तकनीक इतनी विकसित नही थी। न कोई सोशल मीडिया था और न ही कोई निजी चैनल। केवल दूरदर्शन था और अखबार थे। दूरदर्शन पर केवल रात 8 बज कर 20 मिनट पर एक बार समाचार आता था। रेडियो यानी आकाशवाणी था । तब मोबाइल का कही अतापता भी नही था। सूरत की तबाही की खबरें थी। उसी दौरान एक बड़े विशेषज्ञ की एक टिप्पणी एक अखबार में छपी। उसमें लिखा था कि सूरत में जो प्लेग फैला है इसमें चीन का हाथ है। चीन का यह जैविक युद्ध है । इसके पर्याप्त कारण भी गिनाए गए थे। लिखा था कि सूरत के कपड़ा उद्योगों के कारण चीन के कपड़ा उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुए। चीन में इसके कारण बाजार बिगड़ने लगे। इसी से घबरा कर चीन ने सूरत के कपड़ा उद्योग को अपने जैविक व...

सवाल 135 करोड़ की आबादी का

इष्ट देव सांकृत्यायन इस धरती पर ऐसा कोई निर्णय नहीं हो सकता जिसमें कोई चूक न हो. ऐसा कोई क्रियान्वयन भी नहीं. इसके बावजूद मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि भारत सरकार ने सही समय पर सही निर्णय लिया. यह सही समय पर लिए गए सही निर्णय का ही प्रभाव है जो हम अब तक कहर के उस दौर से बचे हुए हैं , जिससे बाक़ी दुनिया गुज़र रही है. जिस बाढ़ में आपसे बहुत बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं वाले अमेरिका , इंग्लैंड , इटली , फ्रांस... सब बह गए और ऐसे बहे कि अब उनके संभलने की भी गुंजाइश नहीं दिखती... ब्रिटेन की पूरी राजशाही , सऊदी अरब का पूरा शाही खानदान... इटली की सरकार तो हाथ खड़े कर चुकी है... लगभग यही हाल अमेरिका का भी होता दिख रहा है. इस दौर में भी भारत में संक्रमितों की संख्या नियंत्रित है और यह सिर्फ़ और सिर्फ़ समय से किए गए # लॉक _ डाउन के फ़ैसले का ही असर है. जिनकी कुल दौड़ केवल # सत्ता _ से _ सत्ता तक की ही है , उन्हें यह सफलता और सुरक्षा भारत की नहीं , अकेले मोदी की लगती है. चूँकि उन्होंने जब और जो किया , वह सब केवल सत्ता के लिए किया तो अभी भी वे उससे इतर भाषा में सोच नहीं पा रहे हैं. वे ये बर...

योगक्षेमम् वहाम्यहम्

इष्ट देव सांकृत्यायन विनम्र अनुरोध: परछिद्रान्वेषक कृपया सुरक्षित दूरी बनाए रखें. जिज्ञासाओं का समाधान करने की कोशिश तो हो सकती है , मूर्खतापूर्ण बकवासों का जवाब बिलकुल नहीं दिया जाएगा. अकेलापन आज के समाज की एक बड़ी और विकट समस्या है. महानगरों में तो यह बहुत पहले ही एक महामारी का रूप ले चुका है. गाँवों में भी इसकी व्याप्ति कम नहीं रह गई है. रोजगार की तलाश में गाँव के युवा शहरों का रुख कर रहे हैं और शहरों के युवा विदेशों का. जो युवा अपना घर-परिवार छोड़कर दूर जा रहे हैं , वे वहाँ अलग तरह से अकेलेपन के शिकार हो रहे हैं और जो जिनके बच्चे उनसे दूर जा रहे हैं , वे बुजुर्ग अलग ढंग के अकेलेपन के शिकार. मने हम यहाँ इधर तन्हा , तुम वहाँ उधर तन्हा ’ जैसा हाल है कुछ. इस बीच ये कोरोना इफेक्ट और आ गया. जो शिकार हुए वे तो वे , जो अभी तक बचे हैं वे भी आइसोलेट. कुछ आइसोलेट कर दिए तो कुछ हो गए. आइसोलेशन या क्वारेंटीन... सबकी मजबूरी हो गई है. ईश्वर करें कि जल्दी इस समस्या से मुक्ति मिले. लेकिन क्या होगा , कैसे कहें! फिलहाल मुझे ऐसी संभावना दिखती नहीं. हालांकि भगवान से मना यही रहा हूँ कि...

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