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विद्रूप सच्चाई का सुंदर ‘स्वाँग’

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हरिशंकर राढ़ी समीक्षा                         - हिंदी साहित्य में विडंबनाओं की बात की जाए तो संभवतः सबसे ऊपर के क्रम में व्यंग्य विधा या व्यंग्य प्राचुर्य की रचनाओं का उत्थान-पतन आएगा। पतन के मामले में कविता एवं लघुकथा का स्थान व्यंग्य के आसपास ही ठहरता है। वैसे , कविताओं की स्थिति पर बात न ही की जाए तो अच्छा , क्योंकि छंदमुक्त कविताओं ने सामान्य पाठक तक अपनी पहुँच कभी बनाई ही नहीं थी। किंतु व्यंग्य के मामले में स्थिति सुखद थी। लगभग आधी सदी की यात्रा में व्यंग्य ने अपना एक विशाल पाठकवर्ग बनाया , प्रशंसक बनाये , अखबारों-पत्रिकाओं में स्थायी स्तंभ बनाये तथा आलोचकों-समीक्षकों के चाहने न चाहने के बावजूद एक विधा के रूप में स्थापित हो गया। उसकी इसी लोकप्रियता को देखते हुए तमाम तरह के लेखक अपना हाथ व्यंग्य के क्षेत्र में आजमाने लगे। परिणाम यह हुआ कि सुव्यंग्य कम , कुव्यंग्य ज्यादा पैदा होने लगा। अब तो स्थिति यह आ गई है कि विमर्श इस बात पर होने लगा है कि बुरे व्यंग्य या अव्यंग्य से व्यंग्य साहित्य को कैसे बचाया जाए ? ‘ राग दरबार...

हिंदी का प्रथम पशु चरित्र केंद्रित उपन्यास 'रीफ'

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भारती पाठक   [ इस कालम के अंतर्गत मैं एक पाठक की हैसियत से किताब को आपके साथ पढ़ने और पढ़े हुए को शेयर करने का प्रयास करती हूं । हम सभी जानते हैं कि आज हिंदी जगत में इतनी खेमेबंदी हो चुकी है कि किताब का पठन-पाठन छूट गया है, बस उन पर अपने वैचारिक फ्रेम से फतवेबाजी अधिक की जाती है । इससे पाठक दिग्भ्रमित हो जाते हैं और स्वतंत्र रूप से पुस्तक में लिखे का न तो अध्ययन कर पाते हैं, न आनंद ले पाते हैं । इसलिए मेरी तो कोशिश है कि पुस्तक में क्या है, यही सार संक्षेप में आपके सामने रखूं, अच्छा-बुरा तो आप जानें।] कुछ दिन पहले ही मिले इस छोटे से उपन्यास को पढना शुरू किया तो ख़त्म किये बिना रोक नहीं पाई खुद को और उसके बाद पूरी रात स्मृतियों को टटोलते अजीब सी बेचैनी में कटी । सच है कभी-कभी जीव-जंतु भी परिवार के सदस्यों की भाँति हृदय में अपने प्रेम और स्नेह की जड़ें इतनी गहरी जमा लेते हैं कि जीवन उनके ही इर्द-गिर्द मंडराता रहता है और अपने जाने पर वे ऐसा खालीपन दे जाते हैं जिसे भरने की कोई युक्ति नहीं सूझती क्योंकि उनका स्थान कोई नहीं ले सकता। यह कहना जरूरी है कि हमारा समय कुल मिलाकर मनुष्य और मान...

दुनियादारी का चलचित्र

“तभी विचित्र हुआ. प्राय: सभी युवक एक साथ खड़े हो गए. बात की बात में सबों ने अपनी कमर के नीचे के कपड़े उतार दिए – धोती, पैंट, पाजामा, नीकर तक और एक स्वर में बोल पड़े “वोट? उत ना मिली तोहरा. इहे मिली.....” चौंकिए नहीं, यह किसी ख़बर की पंक्ति नहीं है. अभी यह एक उपन्यास से लिया गया उद्धरण है. ग्यारह साल पहले यानी सन 1999 में आए भगवती शरण मिश्र के उपन्यास ‘अथ मुख्यमंत्री कथा’ की पृष्ठ संख्या 305 से. बेशक़ अभी कहीं ऐसा हुआ नहीं है, लेकिन अगर भारतीय राजनीति की यही दशा रही, तो जिस दिशा में वह जा रही है, उसका गंतव्य यही है. क्षुद्र स्वार्थों के दलदल से जो शख़्स ज़रा सा भी ऊपर उठ सका है, जो थोड़ा सा भी नीति-अनीति को समझने-मानने वाला है और जिसमें लेशमात्र भी आत्मसम्मान-स्वाभिमान जैसा कुछ शेष है; हर वह भारतीय नागरिक देश के हर नेता के साथ यही व्यवहार करना चाहता है. वैसे भी पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान भारतीय लोकतंत्र में नए-पुराने और सिले-फटे हर प्रकार के जूतों ने जो अभूतपूर्व भूमिका निभाई है, उसका संकेत यही है. हमारी राजनीति अगर तरक़्क़ी की प्रक्रिया में बैलट से चलकर बुलट और फिर ईवीएम में गड़बड़ी तक आ पहुंच...

अँधेरा मिटेगा एक न एक दिन

विज्ञान भूषण कहते हैं कि अँधेरा कितना भी गहरा और भयावह क्यों न हो उसे भी एक न एक दिन मिटना ही होता है। रोशनी की एक किरण चारो ओर बिखरे असीमित तमस को चीरकर जीवन ऊर्जा का संचार कर देती है। प्रकृति का यह नियम हम सबके जीवन पर भी अक्षरश: लागू होता है। इसे हमारे समाज की विडंबना ही कहना चाहिए कि वैज्ञानिक और आर्थिक स्तर पर विकास के उच्चतम सोपानों पर पहँुचने के बाद भी हमारी सोच, आज भी पुरुषवादी मानसिकता से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई है। सार्वजनिक स्थलों और मीडिया में हम भले ही नारी स”ाक्तिकरण  के बड़े-बड़े दावे क्यों न कर लें लेकिन इस बात से इनकार नही किया जा सकता है कि घर के भीतर और बाहर  स्त्री नाम के जीव को अपना अस्तित्व और अपनी पहचान बनाए रखने के लिए हर क्षण जूझना पड़ता है। शारीरिक और उससे बहुत ज्यादा मानसिक स्तर पर होने वाले इस संघर्ष की पीड़ा को कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है। कथाक्रम जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका से जुड़ी रचनाकार रजनी गुप्त का तीसरा उपन्यास ‘एक न एक दिन’ हाल में ही किताबघर प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। इस उपन्यास के माध्यम से लेखिका ने नारी मन में घटित होने वाली उस टूटन-फूटन ...

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