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           गज़ल                               - हरिशंकर  राढ़ी गाँव में मेरी माँ रहती है गंगा-सी निर्मल बहती है। बेटा बहुत संभलकर रहना आज तलक हरदिन कहती है। भूखे पेट न सो जाऊँ मैं उसके मन चिंता पलती है। मन तुलसी, वाणी कबीर सी सूरदास का रस भरती है। सुबह - दोपहर - शाम सरीखी मधुर चाँदनी-सी ढलती है। उन सिक्कों को देख रहा हूँ जिनसे सबकी माँ छिनती है। रोऊँ भी तो कैसे राढ़ी रोने कब माँ दे सकती है। (माँ की चौथी  पुण्यतिथि पर, 04 फरवरी , 2014 )                     

matri smriti

                                                             मातृ स्मृति और अब पहली पुण्यतिथि भी आ गई.....। जैसे विश्वास  करना मुश्किल  हो। पूरे वर्श में शायद  कोई ही दिन रहा हो जब उनकी याद दस्तक देकर, कुरेद कर और निर्बल महसूस कराकर न गई हो। सच तो यह है कि मैं उनकी यादों से भागना भी नहीं चाहता। मुझे भी एक सुकून सा मिलता है यादों में डूबकर। कभी- कभी तो लगता है कि उन यादों के अलावा कोई अन्य शरण  स्थल ही नहीं है। जैसे दर्द ही अब दवा हो। मैं नहीं जानता कि उम्र के पाँचवें दशक  में भी माँ के बिना अनाथ की स्थिति में आ जाना, बेहद अकेला महसूस करना मुझे अच्छा क्यों लगता है ? जैसे - जैसे फरवरी माह की ४/५   की वह रात नजदीक आती जा रही है, माँ का देहत्याग और तीव्रता से याद आने लगा है। सब कुछ किसी फिल्म की रील की तरह आँखों के सामने घूमता जा रहा है। मुझे यह भी नहीं लगता कि यह कोई सांसारिक मोहपाश  है क्योंकि...

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