मैं क्यों नहीं लेता चीनी सामान
इष्ट देव सांकृत्यायन चीनी सामान खरीदने से मेरा परहेज कोई नया नहीं , बहुत पुराना है. और यह किसी राष्ट्रवाद की नहीं , बल्कि चीनी माल की समझ के नाते है. इसकी भी अपनी एक कहानी है और इस कहानी में समय के साथ कई आयाम जुड़ते चले गए. मैं जिस क्षेत्र से हूँ , वह नेपाल की सीमा से बिलकुल सटे है. नेपाल का सबसे मशहूर सीमावर्ती बाज़ार मेरे गाँव से बमुश्किल 50 किलोमीटर की दूरी पर है. उन दिनों लड़के आम तौर पर साइकिल से चले जाते थे. यह केवल लड़कों की ही बात नहीं है , साइकिल से ही और भी बहुत कुछ होता था और उसकी खबरें तो अखबारों में कम छपती थीं , पर कस्टम में तैनात सिपाही तक साल भर में लखपति बन जाते थे. बॉर्डर के आसपास के पुलिस वालों पर भी लक्ष्मी जी की कृपा ऐसे ही अपरंपार होती थी. गोरखपुर से सोनौली वाले रोड पर कहीं भी पोस्टिंग पाने के लिए पुलिस और कस्टम विभाग में निरंतर एक से एक उद्यम चलते रहते थे. हालांकि तब मुझे इन उद्यमों का कुछ पता नहीं था. इसकी वजह थी. तब भारत उदारीकृत नहीं हुआ था. हमारी अपनी तकनीक ऐसी नहीं थी कि हम उस तरह की चीजें बना पाते. भारतीय जन और उद्योग दोनों का जोर अच्छी और टिकाऊ चीजों पर...