माननीय गिरगिट जी
इष्ट देव सांकृत्यायन
माननीय कोई परिचय के मोहताज तो हैं नहीं! भला इन्हें कौन नहीं जानता!
आज सुबह ही मिल गए। मॉर्निंग वॉक के दौरान।
मैंने नमस्ते किया तो बड़े गर्व से मुंडी नीचे-ऊपर और दाएँ-बाएँ घुमाते हुए
बोले - आजकल हर काम पंडीजी से पूछके कर रहा हूँ।
मैंने कहा - अच्छा। क्या हुआ, मौलाना साहब से सब ठीक तो है?
माननीय बोले - हाँ हाँ, बिलकुल ठीक है। असल में मैं पंडीजी का कहा करने के बाद फिर
मौलाना साहब से भी पूछ लेता हूँ।
मैंने कहा - अच्छा। इससे कोई नाराज़ तो नहीं होता?
माननीय बोले - नहीं, नाराज क्यों होंगे? असल में पंडीजी जो
बताए होते हैं, मौलाना साहब उसका उल्टा बता देते हैं।
मैंने कहा - फिर?
माननीय बोले - फिर मैं वो भी कर देता हूँ।
मैंने कहा - फिर ठीक है।
माननीय बोले - हाँ, आप तो जानते ही हैं।
मैंने कहा - जी जी। अच्छा चलते हैं। नमस्ते।
माननीय बोले - नमस्ते नमस्ते, लेकिन एक बात याद रखिएगा।
मैंने हाथ जोड़कर कहा - जी, हुकुम करें।
माननीय भी हाथ जोड़कर बोले - अरे, आप भी क्या मज़ाक करते हैं। हुकुम कहाँ,
मैं तो बस गुजारिश कर सकता हूँ।
मैंने थोड़ा झुककर कहा - हुजूर, ये तो आपका बड़प्पन है। हें हें हें.. बहरहाल,
फरमाएँ।
माननीय खीस निपोरते हुए बोले - हें हें हें... अगले साल चुनाव है।
मैं आश्चर्यचकित - अच्छा!
बोले - हाँ, तो याद रखिएगा।
मैं - जी जी, बिलकुल, ये कोई भूलने वाली बात है।
माननीय ने भी झुकने की लीला करते हुए एक बार और बात पक्की की - हाँ, मल्लब वोट तो….
हे हें हें हे...
मैंने आगे बढ़कर उनके हाथ बीच में पकड़ लिए - अरे हुजूर, कैसी बात करते
हैं। वोट और दे किसे सकते हैं।
हुजूर थोड़े असमंजस में - मल्लब?
मैंने बात साफ की - मल्लब, राजनीति के तो आप परब्रह्म हैं।
हुजूर ज्यादा असमंजस में - आँय! वो कैसे?
मैंने बात और साफ की, ढाबे के प्लेट की तरह -
तेरी सी खुशबू, न तेरी सी बू है
जिधर देखता हूँ, तू ही तू है
हुजूर, आप ही तो हैं जो सर्वव्याप्त, सर्वज्ञ और
सर्वशक्तिमान हैं। आपसे बचकर कोई वोट जाएगा कहाँ? रूप चाहे
जो हों, आत्माएँ तो सब आपके ही प्रकाश से प्रकाशित हैं।
नमस्ते।
उन्होंने भी दाँत निपोरते और दोनों हाथ जोड़ते हुए नमस्ते कहा और बड़े भक्तिभाव
से मुझे वॉक पथ पर आगे बढ़ने की अनुमति प्रदान करने की महती कृपा की।
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सुस्वागतम!!