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कश्मीर की कोकिला हब्बा खातून

  लल्लेश्वरी और शेख नूरुद्दीन के बाद कश्मीरी साहित्य में नाम आता है हब्बा खातून का। लल्लेश्वरी का जन्म १४वीं शताब्दी के दूसरे दशक में हुआ , नूरुद्दीन का सातवें दशक में और हब्बा खातून का जन्म हुआ १६वीं शताब्दी के छठे दशक में , एक मामूली किसान के घर। हब्बा खातून का मूल नाम है जून। ज़ून शब्द का अर्थ कश्मीरी भाषा में है चांद। यह नाम उन्हें मिला उनके अप्रतिम सौंदर्य के कारण। कश्मीरी लडकियां वैसे भी बेहद खूबसूरत होती हैं। हब्बा को सौंदर्य के अलावा दो और गुण मिले थे ; एक तो मोहक सुरीला कंठ और दूसरा कवि हृदय। गांव के मौलवी से उन्होंने पढ़ना-लिखना भी सीख लिया था। श्रीनगर के निकटवर्ती सोंबुरा जिले के किसी गांव में जन्मी थीं वे। प्रकृति ने सौंदर्य तो इस पूरे क्षेत्र को दोनों हाथ खोलकर लुटाया है। यह पूरा इलाका है ही इतना सुंदर कि गणितज्ञ और तर्कशास्त्री भी यहां आकर कवि हो जाएं। भला जून इससे कैसे बच सकती थीं! वह अपने खेतों-बागों में आते-जाते काम करते गाती रहती। सौंदर्य में रची-बसी कविताएं और उस पर सुरीला कंठ कौन न रीझ जाए इस पर। यहीं खेतों में रमते-खटते जून ने एक नई विधा क...

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