बाबा की सराय में बबुए
इष्ट देव सांकृत्यायन इससे पहले - वर्चुअल दुनिया के रीअल दोस्त आयाम से विधा की ओर ब्लॉग बनाम माइक्रोब्लॉग अपना सामान J कमरे में टिका कर और फ्रेश होकर नीचे उतरा तो संतोष त्रिवेदी , हर्षवर्धन , शकुंतला जी और कुछ और लोग लॉन में टहलते मिले. एक सज्जन और दिखे, जाने-पहचाने से. शुबहा हुआ कि दूधनाथ जी (जो कि थे भी) हैं. अनिल अंकित जी से कुछ बतिया रहे थे, लिहाजा बीच में टोकना अच्छा नहीं लगा. मैंने कहा बतिया लेने देते हैं, अपन बाद में तय करते हैं, वही हैं या कोई और. इस बीच अरविन्द जी के साथ बैठ गए. दुनिया-जहान की बातें होती रहीं. ख़ासकर भारतीय वांग़्मय में ही मौजूद विज्ञान कथाओं की तमाम संभावनाओं की. बीच-बीच में कुछ इधर-उधर जीव-जंतुओं को लेकर व्याप्त लोकभ्रांतियों की. इस बीच सिद्धार्थ आए, उन्होंने बताया कि उन्हें सपत्नीक किसी पुराने मित्र के यहां जाना है. थोड़ी देर में आते हैं. अरवंद जी भी फ्रेश होने अपने कक्ष में चले गए. तब तक दूधनाथ जी ख़ाली हो गए थे. अकेले टहल रहे थे. मैंने सोचा पूछ ही लेते हैं. ‘क्या आप दूधनाथ जी हैं...’ मैंने हाथ बढ़ाते हुए पूछा. ‘जी हां, ...