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Showing posts from June, 2009

nijikaran

.......गतांक से आगे दूसरा महत्त्वपूर्ण निजीकरण शिक्षा का हुआ। सरकारी स्कूलों में कथित रूप से घोर भ्रष्टाचार फैला हुआ था। यद्यपि परिणाम प्रतिशत फेल विद्यार्थियों का ही अधिक होता ,फिर भी कुछ तो उत्तीर्ण हो ही जाते।यही उत्तीर्ण छात्र आगे चलकर बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि करते और देश की प्रतिष्ठा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर गिरती। न ढंग के कपड़े,न कापी न किताब,न तरीका। आखिर कब तक ढोए सरकार! सारे स्कूल ’पब्लिक स्कूल ’ हो गए।शिक्षा का स्तरोन्नयन हो गया।हाँ,अपवाद स्वरूप् कुछ राजकीय विद्यालय बचे रह गए थे। वस्तुतः इन स्कूलों का परीक्षा परिणाम अन्य विद्यालयों की तुलना में बहुत ऊँचा रह गया था। फलतः शिक्षकों एवं अभिभावकों ने आंदोलन कर दिया। बापू की समाधि पर धरना दे दिया। सरकार को झुकना पड़ा। समझदारी से काम लेना पड़ेगा। उन विद्यालयों के निजीकरण का मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया। उन दिनों सरकार के पास ठंडा बस्ता नामक एक अज्ञात एवं अतिगोपनीय उपकरण हुआ करता था। यह ठंडा बस्ता अलादीन के जादुई चिराग से भी चमत्कारी था। जब भी कोई राष्ट्रीय महत्त्व का मामला होता और सरकार उसे लटकाना चाहती तो उसे ठंडे

vyangya

निजीकरण (यह व्यंग्य उस समय लिखा गया था जब अपने देष में निजीकरण जोरों पर था । यह रचना समकालीन अभिव्यक्ति के अक्तूबर- दिसम्बर 2002 अंक में प्रकाषित हुआ था।) अन्ततः चिरप्रतीक्षित और अनुमानित दिन आ ही गया।देष के समस्त समाचार पत्रों एवं पत्रकों के वर्गीकृत में सरकार के निजीकरण की निविदा आमंत्रण सूचना छप ही गई। क्रमांक टी.टी./पी.पी./सी.सी./0000004321/पत्रांक सी.टी./एस. टी./00/जी.डी./प्राइ./99/निजी./010101/यूनि./86/ दिनांक............ के शुद्ध prshasnic shabdavali में निविदा का मजमून- एक प्रतिष्ठित , अनिष्चित,विकृत एवं वैष्वीकृत सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र से वैयक्तिक क्षेत्र में हस्तांतरित करने के लिए प्रतिष्ठित एवं अनुभवी प्रतिष्ठानों/समूहों /संगठनों से मुहरबंद निविदाएं आमंत्रित की जाती है।निविदा प्रपत्र सरकार के मुख्यालय से किसी भी कार्यदिवस पर एक मिलियन यू.एस. डाॅलर का पटल भुगतान करके खरीदा जा सकता है। सामग्री एवं कर्मचारियों का निरीक्षण नहीं किया जा सकता है। निविदा की अन्य षर्तें निम्नवत हैं- 1-प्रत्येक बोलीदाता का प्रतिष्ठित ठेकेदार के रूप में पंजीकृत hona आवष्यक है। 2-बोलीदाता के पास

देवियों और सज्जनों

पता है मुझे कौन है देवी और कौन है सज्‍जन सच तो ये है न कोई देवी है न कोई सज्‍जन सच तो ये भी है कि मैं भी सज्‍जन नहीं न देवी, न देवता यह तो लबादा है जिसे ओढ़कर हम सब सज्‍जन होने का करते हैं नाटक दरअसल,हकीकत तो नाटक ही है ये दुनिया एक रंगमंच है कुछ समझे बाबू मोशाय अरे जम के करो नौटंकी अपनी भूमिका सलीके से निभाओ साफ-साफ और सलीके से बोलो ऐसा बोलो कि मजा आ जाय लोग कहें वाह-वाह नाटक कम्‍पनी दे पुरस्‍कार कुछ समझे देवियों और सज्‍जनों।।।। संजय राय 21 जून,2009

kavita

तुम तुम तुलसी का एक बिरवा हो जिसे मेरी माँ ने दूर से लाकर आँगन में लगाया था और चिकनी मिट्टी से लीपकर सुन्दर सा थाला बनाया था । पहले मैं तुम्हें यों ही नोचकर फेंक देता था तब मैंअबोध था, बाद में तुम्हारा प्रयोग ओषधीय हो गया तुम्हारी पत्तियों को चाय में डालने लगा और कभी कभी काढ़ा भी बनाने लगा छौंक लगाकर । तुम चुप रही तो मैं सूर्य को अर्घ्य देने लगा तुम्हारे थाले में मां की देखा- देखी और अब धूप जलाकर पूजा भी कर लेता हूँ। लगता है तुम अभी भी तुलसी का एक बिरवा हो सूखती हुई मेरे आँगन में ।

क्यों नहीं समझते इतनी सी बात?

लालगढ़ में माओवादियों को घेरने का क़रीब-क़रीब पूरा इंतज़ाम कर लिया गया है. मुमकिन है कि जल्दी ही उनसे निपट लिया जाए और फिलहाल वहां यह समस्या हल कर लिए गए होने की ख़बर भी आ जाए. लेकिन क्या केवल इतने से ही यह समस्या हल हो जाएगी? लालगढ़ में माओवादियों ने प्रशासन और सुरक्षाबलों को छकाने का जो तरीक़ा चुना है, वह ख़ास तौर से ग़ौर किए जाने लायक है. यह मसला मुझे इस दृष्टि से बिलकुल महत्वपूर्ण नहीं लगता कि माओवादी क्या चाहते हैं या उनकी क्या रणनीति है. लेकिन यह इस दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है कि माओवादी जो कुछ भी कर रहे हैं, उसके लिए उन्होंने यह जो रणनीति बनाई है वह सफल कैसे हो जा रही है. क्या उसका सफल होना केवल एक घटना है या फिर हमारी कमज़ोरी या फिर हमारी सामाजिक विसंगतियों का नतीजा या कि हमारी पूरी की पूरी संसदीय व्यवस्था की विफलता? या फिर इन सबका मिला-जुला परिणाम? यह ग़ौर करने की ज़रूरत है कि माओवादी विद्रोहियों ने अपने लिए लालगढ़ में जो सुरक्षा घेरा बना रखा था उसमें सबसे आगे महिलाएं थीं और बच्चे थे. महिलाओं और बच्चों के मामले में केवल पश्चिम बंगाल ही नहीं, पूरे भारत का नज़रिया एक सा है. उत्तर से लेकर दक्

kavita

अन्धकार अन्धकार एक शक्तिमान सत्य है जो चढ़ बैठता है तपते सूरज के ज्वलंत सीने पर आहिस्ता आहिस्ता । अंधकार बहुत कुछ आत्मसात कर लेता है स्वयं में और सबको जरूरत होती है अंधकार की कुछ देर के लिए । हम ख़ुद भी रक्षा करना चाहते हैं अंधकार की उस पार देखना भी नहीं चाहते हैं और जिनकी दृष्टि अंधकार के उस पार जाती है उन्हें हम उल्लू कहते हैं ।

श्रीभगवान सिंह और कृष्ण मोहन को आलोचना सम्मान

प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा स्थापित प्रथम आलोचना सम्मान भागलपुर के डॉ श्री भगवान सिंह को दिया जायेगा. इसी तरह युवा आलोचना सम्मान बनारस के युवा आलोचक श्री कृष्ण मोहन को दिया जायेगा. श्री सिंह हमारे समय के उन सुप्रतिष्ठित और चर्चित आलोचकों में से है जिन्होंने अपने आलोचनात्मक लेखन से समकालीन साहित्यिक आलोचना और परिदृश्य पर एक अलग लक़ीर खींची है. लगभग सांप्रदायिक और विचाररूढ़ हो उठी आलोचना के बरक्स श्री भगवान सिंह एक स्वतंत्र वैचारिक आधार और जातीय दृष्टि लेकर आये हैं. ख़ास तौर से गतिशील राष्ट्रीय जीवन-प्रवाह और गांधी युग के मूल्यों को केंद्र में रखकर उन्होंने जो एक स्वाधीन आलोचनात्मक तेवर प्रदर्शित और रेखांकित किया है. डॉ. कृष्ण मोहन की आलोचना में पिछली आलोचना की मध्यमवर्गीय चेतना की तुलना में एक उदग्र लोकतांत्रिकता और वैचारिक ऊष्मा है. वे हमारे समय के एक संभावनाशील आलोचक हैं. वर्तमान में श्री भगवान सिंह तिलका माँझी, भागलपुर, बिहार में हिन्दी विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं एवं श्री मोहन विश्वविद्यालय बीएचयू, वाराणसी में रीडर, हिन्दी के पद पर कार्यरत हैं. ज्ञातव्य हो कि इस चय

तो क्या कहेंगे?

सलाहू आज बोल ही नहीं रहा है. हमेशा बिन बुलाए बोलने वाला आदमी और बिना मांगे ही बार-बार सलाह देने वाला शख्स अगर अचानक चुप हो जाए तो शुबहा तो होगा ही. यूं तो वह बिना किसी बात के बहस पर अकसर उतारू रहा करता है. कोई मामला-फ़साद हुए बग़ैर ही आईपीसी-सीआरपीसी से लेकर भारतीय संविधान के तमाम अनुच्छेदों तक का बात-बात में हवाला देने वाला आदमी आज कुछ भी कह देने पर भी कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं हो रहा है. मुझे लगा कि आख़िर मामला क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि माया मेमसाहब द्वारा बापू को नाटकबाज कह देने से उसे सदमा लग गया हो! पर नहीं, इस बारे में पूछे जाने पर उसने मुझे सिर्फ़ देखा भर. ऐसे जैसे कभी-कभी कोई बड़ी शरारत कर के आने पर मेरे पिताजी देखा करते थे. चुपचाप. पर मैंने ऐसी कोई शरारत तो की नहीं थी. ज़ाहिर है, इसका मतलब साफ़ तौर पर सिर्फ़ यही था कि ऐसी कोई बात नहीं थी. फिर क्या वजह है? बार-बार पूछने पर भी सलाहू चुप रहा तो बस चुप ही रहा. जब भी मैंने उससे जो भी आशंका जताई हर बात पर वह सिर्फ़ चुप ही रहा. आंखों से या चेहरे से, अपनी विभिन्न भाव-भंगिमाओं के ज़रिये उसने हर बात पर यही जताया कि ऐसी कोई बात नहीं है. अ

...तुम दौड़ पड़ती हो मेरे संग इंद्रधनुष की ओर

वोदका के घूंट के साथ तेरी सांसों में घुलते हुये तेरे गले के नीचे उतरता हूं, और फैल जाता हूं तेरी धमनियो में। धीरे-धीरे तेरी आंखो में शुरुर बनके छलकता हूं, और तेरे उड़ते हुये ख्यालों के संग उड़ता हूं। कुछ दूरी के बाद हर ख्याल गुम सा हो जाता है, और मैं बार-बार लौटता हूं, नवीणता के लिए। ख्यालों के धुंधला पड़ते ही, तुम कोई सुर छेड़ती हो, और मैं इस सुर में मौन साधे देर तक भीगता हूं। सप्तरंगी चक्रो में घूमते और उन्हें घुमाते हुये लय के साथ मैं ऊपर की ओर उठता हूं, और तुम तरंगों में ऊबडूब करती हो। तुम्हारी बेकाबू सासों में सात सूरों को तलाशते तेरे दोनों आंखों के बीच अपनी बंद आंखे टिकाता हूं ......फिर तुम दौड़ पड़ती हो मेरे संग इंद्रधनुष की ओर।

vyangya

व्यंग्य माइ डैड मैं उसका नाम नहीं जानता ।जरूरत ही नहीं पड़ी ।उम्र बीस के आसपास होगी। एक दो साल कम या ज्यादा । पता नहीं कहाँ रहता है ।कहीं भी रहता होगा । ऐसे लोग हर जगह हैं ।उसके पिता का नाम ए.टी.एम. है । मैंने उससे पिता का नाम पूछा नहीं था । यह उसकी बनियान पर लिखा था । बनियान किसी कुर्ते कमीज़ या टीषर्ट के नीचे नहीं थी । उसके नीचे जाने की मेरी जुर्रत नहीं!उसने बस पहना ही यही था ।रंग बिलकुल काला! एकदम गहगह! मैं बनियान की बात कर रहा हूँ ,उसकी नहीं। वह तो गोरा चिट्टा था।बिलकुल देषी अंगरेज! धनाढ्य , क्योंकि अजूबे करने का लाइसेंस धनाढ्य के पास ही होता ही है !गोरे गदराए बदन पर काली धप्प बनियान।अच्छा कन्ट्रास्ट था । काले रंग का बोलबाला है।बस षरीर का रंग काला न हो।कृष्णवर्ण अमान्य है, कृष्णकर्म स्तुत्य है।कृष्णकर्म से द्वापर युगीन कृष्णवत कर्म का तात्पर्य यहाँ नही है।कालाधन एवं काला मन आर्थिक एवं बौद्धिक विकास का अकाट्य लक्षण है।कालिमा का यह तालमेल नया है।पहले कालावस्त्र विराध एवं ष्षोक प्रदर्षनार्थ ही मान्य था।जल्लाद वर्ग का युनीफार्म कुछ ऐसा ही था।धर्मग्रस्त म

और तुम मुस्कराती हो कंटीली टहनियों में....

आधी रात को चुपके से तुम मेरे कान के पास गुनगुनाती हो, मौत के बाद जीवन के रहस्यों की ओर ले जाती हो । हौले से अपनी आंखों को बंद करके मैं मौत के सरहद को पार करता हूं, गुरुत्वाकर्षण के नियमों को धत्ता बताते हुये मैं ऊपर उठता हूं, और ऊपर- और ऊपर शरीर के भार से मुक्त होने पर आर्बिट के नियम बेमानी हो जाते हैं, दूर से देखता हूं पृथ्वी को घूर्णन और परिक्रमण करते हुये, और रोमांचित होता हूं कुदरत के कानून से मुक्त होकर । मौत के बाद की जीवन की तलाश ग्रहों और नक्षत्रों के सतह तक ले जाती है, और उन्हें एक अटल नियम के साथ बंधा पाता हूं जिसके अनदेखे डोर सूरज से लिपटे हुये है। रहस्यों के ब्रह्मांड में तुम भी गुम हो जाती हो और तुम्हारा न होना मुझे बेचैन करता है, फिर जीवन की तलाश में जलते हुये सूरज में मैं डूबकी लगाता हूं, चमकती हुई किरणे मुस्करा के फेंक देती है मुझे फिर से पृथ्वी के सतह पर। और ओस की चादर में लिपटी हुई धरातल पर मैं तुम्हे दूर तक तलाशता हूं, और तुम मुस्कराती हो कंटीली टहनियों में....

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