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ओपिनियन पोल

- काका , ए काका!   - हाँ बोल बेटा!   - ई ओपिनियन पोल का होता है काका ? - ओपिनियन पोल बस इस समझ ले बेटा कि जैसै गाँव एक-दुइ ठो टोनहा नइंं होत हैं... - हाँ हाँ काका , बूझि रहे हैं... - बूझि रह्यो ह्यो न ?  - हाँ बूझि रहे हैं..   - हाँ त बस ई समझि ल्यो कि जैसै ऊ टोनहा होत हैं... दिन भर बरबर बरबर करत रहत हैं.. मने न करै क कौनो मल्लब... न कुछ जानै के न कुछ बूझै के... बस ऐसै आपन हाँके जात हैं.. जैसै सबसे बड़ा बिदमान इहै हैं..   - मल्लब बुझाया नै काका... तनि और फरियाऔ ...   - का फरियाएं.. अब हम का फरियाएं हो...   - मल्लब ई बताओ कि एक ठू पिरी पोल होत है..   - हाँ होत है.   - ऊ का होत है ?  - ऊ बस ई समझौ कि फिरी पोल होत है. फिरी पोल मल्लब ई कि तब होत है जब चुनाव कि बस सुगबुगाहट हो. मन्ने जे कि कुच्छ नईं.. मने कि जैसै बस हवा में लट्ठ भांज रह्ये ह्यों... न सूत न कपास जुलाहों में लठमलठ... त जिसका जिसकौ मन करता है ऊ उसी को हरानै लगता है... और जिसको मन किया जितान लगा... अब ई समझ ल्यो कि टोनहा को जिधर से चाय पकौड़ी , पान बीड़...

बात का मर्म

इष्ट देव सांकृत्यायन लोकतंत्र न हुआ, मुसीबत हो गई। किसी महामानव ने कुछ कहा नहीं कि बवाल शुरू। गोया बड़े लोगों को बेवजह छोटा बनाने और उन्हें भी अपनी ही औकात में लाने का सबको पूरा ह$क मिल गया हो। पांच साल में एक बार बड़े लोग मंच से हाथ क्या जोड़ लेते हैं, लोगों का मन इतना बढ़ जाता है कि वे उन्हें हमेशा हाथ जोड़े ही देखते रहना चाहते हैं। भूल ही जाते हैं कि सरकार और सरकारी अफसरों के शासक के बजाय सेवक होने की बात किताब में केवल लिखे जाने के लिए लिख दी गई है। असलियत से उसका संबंध उतना ही है, जितना राजनीति का नीति और डिग्री का योग्यता से। मुझे ठीक-ठीक याद है गर्मी नहीं, जाड़े के दिन थे वे। वह भी ऐसा जाड़ा कि लोगबाग परेशान। दिन में धूप भले निकल आए, पर रात एकदम सर्द। ऊपर से हर तीसरे दिन बारिश और उसमें ओलापात भी। इधर बजट आया, उसने सर्दी से भी ज्य़ादा लोगों के हाथ-पांव टैक्सों के ज़रिये सुन्न कर दिए। भिन्न-भिन्न प्रकार के नेतृत्वविलीन और नेतृत्वविहीन आंदोलनकारियों की पिछले तीन-चार वर्षों में जो दशा हुई, उसने जोशे-जवानी को ठंडई में पहले ही बदल दिया था। माहौल में ऐसा कुछ भी नहीं था, जि...

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