राजा गुरु: हड़बड़ी में गड़बड़ी से बचें
हालाँकि वर्षफल का समग्र आकलन सौरमंडल में वार्षिक मंत्रिमंडल में सभी ग्रहों और उनके दायित्वों तथा गोचर में एक-दूसरे के साथ बन रहे युति-दृष्टि संबंधों के साथ-साथ किसी देश की अपनी कुंडली में चल रही महादशा-अंतर्दशा का भी ध्यान रखकर किया जाता है। फिर भी, अपने-अपने दायित्व के अनुसार प्रत्येक ग्रह क्या फल देगा, यह भी देखा जाना चाहिए। इसमें भी मुख्यतः राजा और मंत्री का प्रभाव सबसे अधिक होता है। इस वर्ष के राजा हैं देवगुरु बृहस्पति और मंत्री मंगल। बृहस्पति स्वभावतः शांत होने के साथ-साथ ज्ञान और उसके प्रचार-प्रसार के आग्रही हैं। जबकि मंगल स्वभावतः उग्र, त्वरित प्रतिक्रिया करने वाले तथा सामान्य विरोधी को शत्रु मानकर दंडित करने के पक्षधर हैं। सौरमंडल में मंगल का स्थायी दायित्व सेनापति का है, जबकि बृहस्पति का स्थायी दायित्व विधिनिर्माता, विधिप्रवर्तक और प्रधानमंत्री का है। किसी भी ग्रह को वर्ष के लिए जो दायित्व मिलता है उसे निभाते हुए भी अपने मूल दायित्व के स्वभाव को वह नहीं छोड़ता।
आज इस वर्ष के राजा यानी बृहस्पति की भूमिका पर वैश्विक संदर्भ में बात करते हैं। गुरु इस वर्ष केवल राजा ही नहीं हैं। वे धनेश और नीरसेश का दायित्व भी निभा रहे हैं। यानी राजा होने के साथ-साथ वे वित्त मंत्रालय तथा सभी गैर-रासायनिक पदार्थों के मंत्रालय का कार्यभार भी देखेंगे। अतिचारी तो वे पिछले वर्ष से ही हैं और बीच में केवल एक वर्ष (2033-34) की ढील देकर 2042 तक अतिचारी ही बने रहेंगे। यद्यपि वाराहमिहिर ने सूर्य सिद्धांत में ग्रहों की आठ प्रकार की गतियाँ बताई हैं —
वक्रातिवक्रा कुटिला मंदा मंदतरा समा।
तथा शीघ्रतरा शीघ्रा ग्रहाणामष्टधागतिः॥12॥
इसी में आगे यह भी कहा है —
तत्रातिशीघ्रा शीघ्राख्या मंदा मंदतरा समा।
ऋज्वीति पंचधा ज्ञेया वा वक्रा सातिवक्रगा॥13॥
[पाण्डेय, प्रो. रामचंद्र (सं.-व्या.); सूर्यसिद्धांत, (1999), अध्याय 2, स्पष्टाधिकारः, श्लोक 12, चौखंबा सुभारती प्रकाशन, वाराणसी, पृ. 55]
अर्थात इन आठ प्रकार की गतियों में अतिशीघ्र, शीघ्र, मंद,
मंदतर और सम ये पाँच प्रकार की ऋजुमार्गी यानी सीधी चलने वाली
गतियाँ हैं। इसके अलावा वक्र, अनुवक्र और कुटिल ये तीनों
गतियाँ वक्र (यानी उलटी चाल) संज्ञक होती हैं।
सूक्ष्म स्तर पर इन सभी गतियों का अलग-अलग प्रभाव होता है। अब सामान्यतः इनमें
से केवल तीन पर अधिकांशतः विचार किया जाता है। वह है मार्गी, वक्री और
अतिचारी। ध्यान रखना होगा कि देवगुरु
बृहस्पति जैसा मंथर गति और अति विशाल आकार वाला कोई ग्रह जब अतिचारी होता है तो
उसे बीच-बीच में कई बार वक्री और मार्गी भी होना पड़ता है। इन सभी गतियों के अपने
अलग-अलग प्रभाव होते हैं। इन प्रभावों पर कई और बातों का भी प्रभाव पड़ता है। मेदिनी
ज्योतिष में जब किसी ग्रह के फल और वैश्विक संदर्भों में उसकी समग्र भूमिका पर बात
करते हैं तो इस सबका ध्यान रखना होता है।
देवगुरु को इस बार गतवर्ष के सूर्य जैसा अधिकार तो नहीं मिला है, लेकिन राजा होने
के साथ-साथ कई विभाग बृहस्पति को भी मिले हैं। जिनमें धनेश और नीरसेश का दायित्व मुख्य
है। गत वर्ष मंत्री का दायित्व भी सूर्य के पास ही था, जिसके
नाते दुनिया भर के सारे राष्ट्र प्रमुखों ने Autocratic और Totalitarianistic
व्यवहार दर्शाया। वह तानाशाही तो इस बार नहीं होगी, लेकिन दूसरे देशों के प्रति शत्रुता का भाव वैसा ही बना रहेगा। इसलिए
शांति की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। लड़ाइयाँ बीच-बीच में रुक तो जाएंगी, लेकिन बंद होने वाली नहीं हैं। आम जनता के बीच भी यही स्थिति रहेगी। लोगों
का अहंकार थोड़ी-थोड़ी बात पर उबलेगा और लड़ाई-झगड़े होंगे। इसका कारण इस संवत्सर के
नाम में ही निहित है। नारद संहिता के अनुसार,
अन्योन्यं नृपसंक्षोभं चौरव्याघ्रादिभिर्भयं।
मध्यवृष्टिरनर्घत्वं रौद्राब्दे नैव गुर्ज्जरे॥
[शर्मा, बसतिराम (भाषाटीका), नारद संहिता, (संवत् 1963) श्लोक 70, खेमराज श्रीकृष्णदास श्रेष्ठिना, मुंबई, पृ. 51]
अर्थात रौद्र नामक संवत्सर में राजा अर्थात राष्ट्र प्रमुख लोग आपस में बैरभाव
रखेंगे। आम जनता के बीच चोरों और जंगली जानवरों का भय रहेगा। वर्षा मध्यम होगी और
खाद्यान्न महंगे होंगे। परंतु गुर्जर अर्थात गुजरात और आसपास खाद्यान्नों की
महंगाई वाला प्रभाव नहीं दिखेगा। राजा बैरभाव रखेंगे, यानी लड़ाइयाँ तो
जारी रहेंगी। चोरों और जंगली जानवरों का भय रहेगा, यानी जनता
का धन और प्राण दोनों ही बहुत सुरक्षित स्थिति में नहीं हैं। कष्टप्रद बात यह है
कि आगे अभी जो आने वाले वर्ष हैं, उनके नाम भी कुछ अच्छे
नहीं हैं। रौद्र के बाद दुर्मति, दुंदुभि, रुधिरोद्गारी, रक्ताक्ष, क्रोधन
और क्षय जैसे संवत्सर आने वाले हैं। ऐसा नहीं है कि इनमें सब बुरा ही होगा,
लेकिन युद्ध की स्थिति बनी रहेगी। निश्चित है कि बृहस्पति के अतिचार
वाले इन वर्षों में शांति की अपेक्षा अति आशावाद से अधिक कुछ नहीं है। इन नामों के
प्रभाव की पुष्टि ग्रहों की गति भी करती है। इसइस वर्ष चूँकि गुरु ही राजा हैं और राजा
स्वयं अतिचारी यानी हड़बड़ी में है, ओवरस्पीडिंग के थ्रिल में फँसा
हुआ है, अब एक तरह से अब खुद को बचाने की जिम्मेदारी खुद आम जनता
पर आ पड़ी है। सारांश में यह एक बिंदु सबसे पहले दर्ज कर लीजिए कि कोई भी निर्णय हड़बड़ी
में न लें।
इस वर्ष का उदय मीन लग्न में हुआ है। मीन देवगुरु की अपनी राशि है। शुक्र यहाँ
27 अंश तक उच्च के होते हैं। वर्ष उदय के समय वे 21 अंश के थे, यानी उच्चावस्था
में ही हैं। लेकिन यहीं शनि, चंद्र और सूर्य भी बैठे हैं। इन सबके साथ नेप्चून भी यहीं बैठे हैं। जल
तत्त्व की राशि में नेप्चून का शनि के साथ बैठना पहले तो समुद्र में संघर्ष बढ़ाएगा,
जल से संबंधित कोई ऐसा रोग उत्पन्न करेगा जो महामारी का रूप ले सकता
है और समुद्री मार्गों से होने वाले व्यापार को दुष्प्रभावित करेगा। इससे आवश्यक
वस्तुओं की कमी हो सकती है और यह दुनिया भर में जनता की परेशानी का कारण बनेगा।
वर्ष के अंतिम तीन माह में इसी के चलते कई देशों में बड़े जनांदोलन हो सकते हैं।
शनि और नेप्चून की युति का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह होगा कि मतांधता पूरी दुनिया
में बढ़ेगी। वे समुदाय भी, जो परिवेश में शांति बनाए रखने की
अपनी प्रतिबद्धता के नाते प्रायः अपने खिलाफ बे सिर-पैर की उलटी बातें सुनकर और
अत्याचार सहकर चुप रहते थे, अब झूठ और सांप्रदायिकता की
महामशीनों को पलटकर जवाब देंगे। पंथनिरपेक्षता के झूठ की असलियत और खुलकर सामने
आएगी। यही नहीं, धर्म-मजहब के नाम पर जो कुछ पाखंड चल रहा है,
वह भी खुलेगा। जून में जब बृहस्पति कर्क में आएंगे तो उनकी दृष्टि
अपनी ही राशि मीन पर पड़ेगी। वहाँ उस समय शनि और नेप्चून होंगे।
लग्न से बारहवें भाव में राहु बैठे हैं। वहाँ राशि कुंभ है, जो कि वायु तत्त्व
होने के साथ-साथ तकनीक की कारक भी है। इंटरनेट के चलते बहुत सारी प्रभावित होंगी।
इस वर्ष ऐसा समय भी आ सकता है जब इंटरनेट की किसी खास और अभूतपूर्व गड़बड़ी के चलते
पूरी दुनिया में बैंकिंग, कारोबार, संचार
की प्रक्रिया, तकनीकी क्षेत्र दुष्प्रभावित हो। नेट और फोन
बैंकिंग करते हुए आमजन को बहुत सचेत रहने की आवश्यकता। अपने बैंकिंग संबंधी
पासवर्ड-ओटीपी आदि किसी से भी शेयर करने से बचें। डिजिटल अरेस्ट आदि के जरिये जो
ऑनलाइन डकैतियाँ होती हैं, उनके कुछ बिलकुल नए तरीके सामने आ
सकते हैं, ऐसे जो पहले कभी देखे-सुने नहीं गए। वर्ष लग्न में
राहु के साथ मंगल के अलावा बुध का भी वक्री और वर्गोत्तम अवस्था में होना यह
स्पष्ट करता है कि चोर-डकैत और रिश्वतखोर लोग इस वर्ष अपने कारोबार को बढ़ाने के
लिए अभिनव नवाचारी प्रयोग करेंगे।
वर्ष का राजा यानी शासक होने के बावजूद अपने मूल कार्य यानी विवेक को जागृत
करने में जून तक बहुत सक्षम नहीं हो सकेंगे। क्योंकि एक तो वे मिथुन राशि में बैठे
हैं, जो कालपुरुष की
कुंडली में तीसरा भाव होने के कारण पराक्रम का घर है। जब तक पराक्रम प्रभावी होता
है, विवेक की सुनी नहीं जाती। दूसरे उन पर राहु की पाँचवीं
दृष्टि है और राहु पर स्वयं गुरु की नौवीं दृष्टि है। राहु पर बृहस्पति की दृष्टि
जालसाजों को पूरी तरह सफल होने और विधि-प्रवर्तन एजेंसियों की नजर से बचने से
रोकेगी, लेकिन बृहस्पति पर राहु की दृष्टि चांडाल दोष
उत्पन्न करेगी। शांति वार्ताएँ सफल नहीं होने पाएंगी।
अभी 21 मार्च को बुध के मार्गी होने के बाद कुछ शांति प्रयास शुरू हो सकते
हैं। वार्ताएँ अवश्य होंगी। लेकिन परिणाम क्या होंगे, इसे लेकर बहुत
आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता। 20 अप्रैल को गुरु जब पुनर्वसु के दूसरे पद में प्रवेश
करेंगे तो कुछ ऐसे क्षेत्रों में युद्ध और अशांति हो सकती है, जो अभी शांत दिख रहे हैं। मंगोलिया, यूक्रेन और
ग्रीस में अकस्मात कुछ आश्चर्यजनक हो सकता है। पश्चिम एशिया में अशांति बनी रहेगी।
अमेरिका में बड़े जनांदोलन उभर सकते हैं। पाकिस्तान और बंगलादेश में भी कुछ बड़े
परिवर्तन हो सकते हैं।
2 जून को जब गुरु कर्क राशि में आकर उच्चस्थ होंगे तब भी अतिचारी होंगे। इसके
बाद पाँच माह बीतने से पहले ही वे 31 अक्टूबर को सिंह राशि में चले जाएंगे। गुरु
अपने उच्च होने का फल केवल 5 अंशों तक ही देते हैं। अतिचारी अवस्था में वे 5 अंश
की दूरी कब पार गए यह पता ही नहीं चलने पाएगा। यह पुष्य के पहले चरण में ही बीत
जाएगा। उस पहले चरण के स्वामी भी युद्ध के देवता मंगल हैं। इतिहास साक्षी है, सेना के बंकर में
बैठकर किए गए शांति के समझौते कभी दीर्घकालिक नहीं हुए हैं।
भारत इस वर्ष अपनी प्रचलित शांतिप्रियता वाली छवि से बाहर निकलकर आक्रामक तेवर
अपना सकता है। यह स्थिति तब आ सकती है जब गुरु पुष्य से निकलकर अश्लेषा और फिर
उसके दूसरे तीसरे चरण में जाएँ। यानी 3 सितंबर से 8 अक्टूबर के बीच का समय भारत के
लिए आक्रामक तेवर का समय है। जरूरी नहीं कि इस आक्रामक तेवर के लिए कोई बाहरी
उकसावा मिले ही। देश के भीतर भी आपसी सौहार्द बिगड़ने की आशंका निरंतर बनी रहेगी।
फिर भी गुरु के राजा होने के नाते इन विषम स्थितियों में भी शांति व्यवस्था बनी
रहेगी। सामान्यतः किसी बड़ी समस्या या संकट की आशंका नहीं है।
गुरौ नृपे वर्षति कामदं जलं महीतले कामदुधाश्च धेनवः।
यजंति विप्रा वहवोSग्निहोत्रिणो महोत्सवं सर्व जनेषु वर्तते॥
यानी जिस वर्ष गुरु राजा होते हैं, उस वर्ष वर्षा उत्तम होती है, लोगों के घरों में मंगल कार्य होते हैं, वातावरण प्रायः धार्मिक बना रहता है। बाकी दृष्टि से कठिन होने के बावजूद जनसाधारण में कुल मिलाकर सामान्यतः सुख-संतोष बना रहेगा।
धनेश गुरु के लिए वैसे तो कहा गया है —
सुमनसां च गुरुर्द्रविणाधिपो, वणिजवृत्तिपराः सुखभाजना:।
फलित पुष्पित भूमिरुहा: सदा विविधद्रव्ययुता भुवि मानवाः॥
अर्थात गुरु के धनेश होने से व्यापारी तथा पुष्प व्यवसायियों को लाभ होता है।
वृक्ष फल-पुष्प से सुशोभित तथा मनुष्य विविध द्रव्यों से युक्त रहेंगे।
ध्यान रहे, यह गुरु की केवल एक भूमिका का फल है। समग्रता में देखें तो गुरु अतिचारी हैं। धनेश के अतिचारी होने के नाते बाजार बहुत अस्थिर रहेगा। खासकर बड़े लाभ और पैसिव इनकम जेनरेट करने के जो माध्यम हैं, वहाँ बहुत सोच-समझकर कदम बढ़ाएँ। अगर केवल अनुमान के आधार पर या मनमर्जी तरीके से शेयर बाजार आदि में हैं, तो उसमें कोई नया निवेश न करें। अभी-अभी बुलिश दिख रहा मार्केट कब अचानक बियरिश रुख ले ले, कहा नहीं जा सकता। कुछ बड़ी कंपनियों पर न्यायिक निर्णयों की गाज गिर सकती है और वहाँ लगा हुआ पैसा लंबे समय तक फँस सकता है। वायुमार्ग का स्वामी होने के नाते बृहस्पति के अतिचारी होने का प्रभाव फ्लाइट्स और एयरलाइंस पर भी पड़ेगा। हड़बड़ी से गड़बड़ी की घटनाएँ कई बार होंगी। सोने-चाँदी जैसी बहुमूल्य धातुओं का बाजार भी इस वर्ष बहुत उठापटक वाला रहेगा। सामान्यतः नीरसेश की भूमिका निभाने के नाते गुरु सोने-चाँदी में सबकी रुचि तो बनाए रहेंगे, लेकिन उनके ही अतिचारी होने के नाते मूल्यों के ऊपर-नीचे होने से झटका ये धातुएँ भी देंगी। इसलिए कहीं भी निवेश करने से पहले उसके फंडामेंटल्स पर ढंग से विचार कर लें। केवल भावुकता में बहकर कोई निवेश न करें और न ही कोई आर्थिक निर्णय लें।
[यह मुख्यतः केवल वर्षेश गुरु का फल है। इसे वर्ष का समग्र फल न मानें। समय
मिलने पर आगे अन्य ग्रहों का विश्लेषण करेंगे। फिर समग्र फल निकालेंगे।]


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