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Showing posts from May, 2007

अशआर

सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहॉ
जिंदगी ग़र कुछ रही तो नौजवानी फिर कहॉ.
इस्माइल मेरठी

गीतों से

हम नए हैं
नए थे भी
नए आगे भी रहेंगे

यह हमारा गीत होना
सुनो समयातीत होना है
बन सदाशिव
जहर से अमृत बिलोना है
कल दहे थे
दह रहे हैं
कंठ आगे भी दहेंगे

हम नए हैं
नए थे भी
नए आगे भी रहेंगे
कुमार रवीन्द्र

अशआर

अब यकीनन ठोस है धरती हकीकत की तरह
ये हकीकत देख लेकिन खौफ के मारे न देख.

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है.
दुष्यंत कुमार

चुप रहिए

देख रहे हैं जो भी, किसी से मत कहिए,
मौसम ठीक नहीं है, आजकल चुप रहिए.

फुलवारी में फूलों से भी ज्यादा साँपों के पहरे हैं,
रंगों के शौक़ीन आजकल जलते जंगल में ठहरे हैं.
जिनके लिए समंदर छोड़ा वे बदल भी काम न आए,
नई सुबह का वादा करके लोग अंधेरों तक ले आए.

भूलो यह भी दर्द चलो कुछ और जिएँ,
जाने कब रूक जाएँ जिंदगी के पहिए.
रमानाथ अवस्थी

अशआर

अपना कशकोल छिपा लो तो सभी हातिम हैं
वरना हर शख्स भिखारी है, जिधर जाओगे.


मैदां की हार-जीत तो किस्मत की बात है
टूटी है किसके हाथ में तलवार देखना.
हरेक आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी
जिसको भी देखना, कई बार देखना.

बेचारे प्रधानमंत्री और मजबूर जनता

भारत के प्रधानमंत्री डॉ॰ मनमोहन सिंह ने उद्योगपतियों की बैठक में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर गहरी चिंताएँ जताई हैं. सबसे ज्यादा चिन्ता उन्होने इस समय की सबसे मौजू समस्या महंगाई पर जताई है. उद्योगपतियों से उन्होने अपेक्षा की है कि वे काकस बाना कर चीजों के दाम न बढ़ाएं. आर्थिक विकास का लाभ देश के आम आदमी को मिले, इसके लिए उन्होने भारतीय उद्योग जगत के सामने एक दस सूत्रीय एजेंडा भी रखा है. इस एजेंडे में वंचित वर्गों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को रोजगार के अधिक अवसर देना, प्रतिभाशाली युवाओं को स्काँलरशिप देना आदि बातें शामिल हैं. भारतीय उद्योग परिसंघ की बैठक में उन्होने उद्योगपतियों को यह उपदेश भी दिया है कि वे अपनी शान बघारने के लिए अपने वैभव का भोंडा प्रदर्शन न करें.
डॉ॰ सिंह ने यह जो बातें कही हैं, इनसे किसी को असहमति नहीं हो सकती है. रोजगार के अवसर वंचित वर्गों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को ही नहीं, समाज के सभी वर्गों को मिलने चाहिए. आख़िर रोजगार के अवसरों की जरूरत किसे नहीं है? बिना रोजगार के तो किसी का जीवन चल नहीं सकता है! प्रतिभाशाली युवाओं को स्कालरशिप दिए जाने की बात भी सही है. इस बात से …

कुनबे की महिमा का सच

यह तो आप जानते ही हैं कि परमपूज्या राजमाता और माननीय श्रीमंत राजकुमार के मुँह बहुत कम ही खुल पाते हैं. बमुश्किल कभी-कभी ही. सिर्फ तब जब बहुत जरूरी हो जाता है. तब वह इस गरीब देश की दरिद्र जनता पर यह महती कृपा करते हैं. इसीलिए वे जब भी बोलते हैं पूरे देश की हिंदी और अंग्रेजी प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया उनके बयान को लोकने के लिए ऐसे टूटती है जैसे सिद्ध संतों द्वारा फेंके गए प्रसाद को लोकने के लिए उनके भक्त टूटते हैं. ऐसा लगता है जैसे इस दुनिया में अब इसके अलावा कोई और परमसत्य बचा ही ना हो. हाल ही में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान राजकुमार का मुँह एक बार खुला था और तब जहाँ एक तरफ तमाम कांग्रेसी कृतकृत्य हो गए थे वहीं देश-दुनिया के इतिहास की थोड़ी सी भी समझ रखने वाला हर शख्स एक दुखद आश्चर्य से भर उठा था. सबने एक सिरे से यही सोचा कि राजकुमार ने यह क्या कह दिया. अपने को जानकर मानाने वाले कुछ लेखकों-पत्रकारों-राजनेताओं ने तो थोड़ी हाय-तौबा मचाने की रस्म अदायगी भी की. पर अब वह बयान केवल राजकुमार तक सीमित नहीं रह गया है. परमपूज्या राजमाता ने भी राजकुमार के सुर से सुर मिला दिया है. रा…

इनसे मिलें

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जब कभी
हो जाएँ
अनमन,
इनसे मिलें -

पेड-चिड़िया
हवा-बादल.
नदी-झरने
और
गंगाजल.
शिशु चपल की
किलक निर्मल.
रुनझुनाती हुई
पायल.

जब कभी
हो जाएँ
अनमन,
इनसे मिलें.

जब कभी
हो जाए
अनबन,
इनसे मिलें -

फूल-फलियाँ
दूब-जंगल
भौंरे और
तितलियाँ चंचल,
खेत-फसलें
कूप-नहरें
किवाड़-आंगन और
सांकल.

जब कभी
हो जाए
अनबन,
इनसे मिलें.

जब कभी
हो जाएँ
अनमन,
इनसे मिलें.

इष्ट देव सांकृत्यायन


इन आंखो में

पूरब से
आती है
या
आती है
पश्चिम से -
एक किरण
सूरज की
दिखती है
इन आंखों में.

मैं संकल्पित
जाह्नवी से
कन्धों पर है
कांवर.
आना चाहो
तो
आ जाना
तुम स्वयं
विवर्त से बाहर.

तुमको ढूढूं
मंजरिओं में
तो
पाऊँ शाखों में.
इन आंखों में.

सपने जैसा
शील तुम्हारा
और खयालों सा
रुप.
पानी जीने वाली
मछली ही
पी पाती है
धूप.

तुम तो
बस तुम ही हो
किंचित उपमेय नहीं-
कैसे गिन लूं
तुमको
मैं
लाखों में.
इन आंखों में।

इष्ट देव सांकृत्यायन

विश्वविजेता बन जाऊं

उस दिल का
परवान नहीं है.
जिसका
कुछ
उनवान नहीं है .

आंख नहीं तो
मन पर
बनता.
अक्स मेरा
छतरी बन तनता.

ग़ैर के गम से
जो न
भरे दिल
कुछ भी हो
इन्सान नहीं है.

सबके होंठों
पर
मुस्कानें.
देखें तो
खुद को
पहचानें.

विश्वविजेता
बन जाऊं
यह
मेरा ही
अरमान नहीं है.


इष्ट देव सांकृत्यायन

बचपन

न डरना शेर की दहाड़ से और बकरी
के मिमियाने से डर जाना. गिर पड़ना
आंगन में ठुमकते हुए, हौसला रखना
फिर भी एवरेस्ट के शिखरों पर फतह की.

न समझ पाना छोटी-छोटी बातें और
बेझिझक सुझाना बेहद मुश्किल मसलों
के हल. सूखे हुए पौधों वाले गमलों
में डालना पानी, नोच लेना नए बौर.

रूठ जाना बेबात और फिर न मानना
किसी के मनाने से. खुश हो जाना
ऐसे ही किसी भी बात से. डूब जाना
किसी भी सोच में, वैसे बिल्कुल न समझना

दादी किसकी चिन्ता करती हैं बेकार,
दादा क्या सोचते रहते हैं लगातार?

इष्ट देव सांकृत्यायन






बच्चे

इनकी दुनिया में अभी शेष है प्रेम और
घृणा भी, करुणा और पृहा भी, तृप्ति और तृषा
भी, क्रोध और क्षमा भी, विस्मय और जिज्ञासा
भी, अन्धकार और प्रभा भी, अति संवेद और

निर्वेद भी. इनके लघु गात में है एक
ऐसा दिल जो धड़कने की खानापूरी
नहीं करता. दरअसल धड़कता है पूरी
मुस्तैदी से और उसमें होता है अतिरेक

भावनाओं का. भावनाएँ ही करती
हैं इनके फैसले. बुद्धि के दास नहीं हुए
हैं अभी ये. समझौता शब्द इनके लिए
अबूझ है अभी. क्योंकि ये अनादि सत्यव्रती

जिनने नहीं संभाला अभी अपना होश,
ही हैं निर्गुण, निष्कलुष, निर्विकार और निर्दोष.

इष्ट देव सांकृत्यायन

जगाने मत आना

सोया हूँ
मुझे
जगाने मत आना.
बादल हूँ
मुझ पर
छाने मत आना.

उमड़-घुमड़ कर
और-और सघन
होता जाता हूँ.
किस-किस से
मिलकर
क्या-क्या
खोता-पाता हूँ!
फट जाऊं तो
बह जाएँगे
गिरि-शिखर
न जाने कितने,
इसीलिए उफन-उफन कर भी
मैं कभी नहीं
रोता-गाता हूँ.

अगणित पीड़ाएँ
छिपी हुई हैं
कोनों में,
गिरी यवनिका
आज
उठाने मत आना.

केंद्र वृत्त का
कालाहांडी
और
परिधि पर
चौपाटी है.
बंद-बंद रहने वाला
यह
मेरा मन
बुधना की
पाती है.
दबा-ढका है
जाने क्या-क्या
पर
कुछ भी
छिपा नहीं है,
मेरा खुलना मुश्किल है,
पर
खुलता हूँ
तो मुश्किल हो जाती है.

अपने मन की
अँधेरी बंद गुफा में -
खोया हूँ,
मुझको पाने मत आना.

इष्ट देव सांकृत्यायन

बहुत दिनों तक

बहुत दिनों तक
रहा
हमारे जीवन में,
घंटों फिरना बेमतलब
रूमानी होना
दुनिया भर के
मसलों का
बेमानी होना
रहा
हमारे जीवन में
बहुत दिनों तक.


बहुत दिनों तक
रहा
हमारे जीवन में,
साथ हवा के
पत्तों जैसे
हिलना-डुलना.
किस्सों वाली
परियों से
मिलना-जुलना.

हर मुश्किल की
छाती पर
आसानी बोना
रहा हमारे जीवन में
बहुत दिनों तक.

बहुत दिनों तक
रहा
हमारे जीवन में,
आखों में
घिरना बादल
तिरना मोती का.
रोटी के संग
आगे-पीछे
फिरना धोती का.

और अंत में
पाना
सब नादानी होना
रहा
हमारे जीवन में
बहुत दिनों तक.

बहुत दिनों तक
रहा
हमारे जीवन में.


इष्ट देव सांकृत्यायन

बाबा ऊंचे

वह तो
ऐसे ही
कुछ कहता है.
कभी नहीं
सच
लिखता है.

उनके केवल
बाबा ऊंचे
बाबा आदम भी
बौने हैं.
रिश्तों की तो
बात निरर्थक
जंगल के
मृगछौने हैं.

विध्वंस सृजन
और
सृजन विनाश
उनको झूठा ही
सच
दिखता है.

उनका काल
पखेरू बेघर-
उड़ता ऊपर
सिर
नीचे कर.
नई व्यवस्था
वे देंगे
मंगल से फिर
जंगल आकर.

उनकी पूरी दुनिया हाट
ख़ून-पसीना
सब कुछ
बिकता है.

इष्ट देव सांकृत्यायन

कौन गया

मेरे
आंगन के
तुलसीचौरे पर -
दीप जला कर
कौन गया?
शालिग्राम पर
श्रध्दा के
फूल
चढ़ा कर
कौन गया?

टिमटिम करता दिया
न जाने
क्या-क्या
कह जाता है.
सब कुछ
कह कर भी
वह
चुप ही
रह जाता है.

अनमनपन की
चादर ताने
सोया था
मधुमास-
जगा कर
कौन गया?

मैंने ले लिया
न जाने
कैसे
अश्वमेध का संकल्प.
अग्निहोत्र से
बचने का
अब
कोई नहीं
विकल्प.

इस थाली में
कुमकुम
अक्षत
दूब
सजा कर
कौन गया?

इष्ट देव सांकृत्यायन

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