फिर शाम हुई बाजार लगा

(मंथन जी ने इस गजल को लिखा है)

फिर शाम हुई बाजार लगा, दोशीजा कोई नीलाम हुई
चुभते फिकरे, खिचता आंचल, मुफलिस की गरीबी आम हुई।

सीने पे टिकीं भूखी नजरें, महफिल में सौदे इस्मत के
ये पत्थर दिल, पत्थर चेहरे, आंखों से हया गुमनाम हुई ।

अंधी गलियां, मसली कलियां, परदों के पीछे रंगरलियां
जो कल तक धार थी गंगा की, वो आज छलकता जाम हुई।

बोझल सांसे, बेबस आहें, पलकों में उजड़ते ख्वाब कई
करवट करवट सिसकी सिसकी, यूं ही रात तमाम हुई ।

इंसाफ के पहरेदारों से, इतना तो पूछे आज कोई
ये भी तो किसी की इज्जत थी, क्यों नाहक ही बदनाम हुई ।

Comments

  1. बहुत ही गहरे तक जाती आप की यह गजल,अति सुंदर
    धन्यवाद

    ReplyDelete
  2. बोझल सांसे, बेबस आहें, पलकों में उजड़ते ख्वाब कई
    करवट करवट सिसकी सिसकी, यूं ही रात तमाम हुई
    -ज़िंदगी-ऐ-आम की हकीकत बयानी के लिए शुक्रिया.

    ReplyDelete

Post a Comment

सुस्वागतम!!

Popular posts from this blog

रामेश्वरम में

...ये भी कोई तरीका है!

आइए, हम हिंदीजन तमिल सीखें

Most Read Posts

Bhairo Baba :Azamgarh ke

Maihar Yatra

रामेश्वरम में

Azamgarh : History, Culture and People

सीन बाई सीन देखिये फिल्म राब्स ..बिना पर्दे का

ये क्या क्रिकेट-क्रिकेट लगा रखा है?

गन्ने के खेत में रजाई लेकर जाती पारो

...ये भी कोई तरीका है!

आइए, हम हिंदीजन तमिल सीखें

गढ़ तो चित्तौडग़ढ़...