रू-ब-रू पाया


तुमको अपने है चारसू पाया
पल में इन्सान और जादू पाया
मौत तुमको भी है पसंद नहीं
जींद की तुझमें आरजू पाया
सबकी खातिर है तेरे दिल में जगह
न जुबां पर है दू-ब-दू पाया
सीधे कहते हैं सब तुम्हें लेकिन
मैंने तुझमें वो जन्गजू पाया
बताएं किसको तेरे बारे में
हर मुसीबत में चाह्जू पाया
बदल चुकी है ये सारी दुनिया
पर तुम्हें मैंने हू-ब-हू पाया
मैं जानता हूँ कि हो योजन दूर
यार तुमको है कू-ब-कू पाया
सभी कहते हैं तुम जहाँ में नहीं
याद जब आई रू-ब-रू पाया
रतन

Comments

  1. बहुत बढिया रचना है।बधाई।

    ReplyDelete
  2. अरे महाराज आप तो भन्न भन्न कविता लिख देते हैं अभी तो मैं पुराणी वाली कविता बुझने कि कोशिश कर रहा था , अच्छा रहा।

    ReplyDelete
  3. आप भी तो महराज दन्न-दन्न पढ़ डालते हैं कवितवा. ऐसन पाठको कहॉ मिलते हैं आजकल कबी लोग को! इहे बदे धन्न-धन्न बाद.

    ReplyDelete

Post a Comment

सुस्वागतम!!

Popular posts from this blog

रामेश्वरम में

...ये भी कोई तरीका है!

आइए, हम हिंदीजन तमिल सीखें

Most Read Posts

Bhairo Baba :Azamgarh ke

Maihar Yatra

रामेश्वरम में

Azamgarh : History, Culture and People

सीन बाई सीन देखिये फिल्म राब्स ..बिना पर्दे का

आइए, हम हिंदीजन तमिल सीखें

...ये भी कोई तरीका है!

ये क्या क्रिकेट-क्रिकेट लगा रखा है?

गन्ने के खेत में रजाई लेकर जाती पारो

विदेशी विद्वानों का संस्कृत प्रेम ( समीक्षा)