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ये क्या मामला है?

कल राढ़ी जी (श्री हरिशंकर राढ़ी) ने बताया कि अपना ब्लॉग ही नहीं मिल रहा है. शायद ग़ायब हो गया. उस वक़्त मैं मेंहदीपुर से आ रहा था, रास्ते में था. कुछ नहीं किया जा सकता था. अभी पहुंचा तो सबसे पहले वही तलाश की. मालूम हुआ वास्तव में नहीं है. तुरंत मैंने गूगल में डाला अब यह मिल तो गया. देखें कहीं यह भी ग़ायब न हो जाए!

kaisa chandan

कैसा चन्दन होता है    ( यह गज़ल १९९४ में लिखी गई थी और आज अचानक ही कागजों में मिल गई . बिना किसी परिवर्तन, संशोधन के आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ.बीते दिनों का स्वाद लें .) सूनेपन में कभी- कभी जब यह मन आँगन होता है। स्मृतियों के सुर-लय पर पीड़ा का नर्तन होता है। क्या स्पर्श पुष्प  का जानूँ, क्या आलिंगन क्या मधुयौवन जी  करता  भौंरे  से  पूछूँ  -  कैसा  चुम्बन होता है। लोग  पूछते  इतनी  मीठी  बंशी  कौन  बजाता है ध्वस्त  हो  रहे खंडहरों  में  जब  भी  क्रंदन होता है। हिमकर  के आतप से जलकर शारदीय  नीरवता में राढ़ी  ने ज्वाला  से  पूछा  - कैसा  चंदन  होता है। प्यार मर गया सदियों पहले, जिस दिन मानव सभ्य हुआ अब तो  उसके  पुण्य दिवस  पर   केवल  तर्पण होता है।

नाम है भ्रष्टाचार !!!!!! [होली है !]

होली के दिन जनमा एक नेता का बेटा, मुसीबत बन गया चैन से नहीं लेता ? पैदा होते ही कमाल कर गया, उठा, बैठा और नेता की कुर्सी पर चढ़ गया ! यह देख डॉक्टर घबराई, बोली - ये तो अजूबा है ! इसके सामने तो साइंस भी झूठा है !! इसे पकड़ो और लिटाओ दुधमुंहा शिशु है, माँ का दूध पिलाओ । दूध की बात सुनकर शिशु ने फुर्ती दिखाई, पास खड़ी नर्स की पकड़ी कलाई बोला - आज तो होली है, ये कब काम आएगी, काजू-बादाम की भंग अपने हाथों से पिलाएगी । नेता और डॉक्टर के समझाने पर भी वह नहीं माना, चींख-चींखकर अस्पताल सिर पर उठाया, और गाने लगा 'शीला' का गाना ! उसके बचपने में 'शीला की ज़वानी' छा गई, 'मुन्नी बदनाम न हो इसलिए नर्स भंग की रिश्वत लेकर आ गई ! शिशु को भंग पीता देख नेताजी घबराये और बोले - 'तुम कौन हो और क्यों कर रहे हो अत्याचार ?' शिशु बोला - तुम्हारी ही औलाद हूँ और नाम है भ्रष्टाचार [] आप सबका हुरियारा - राकेश 'सोहम'

Gazel

         गज़ल                    -हरिशंकर   राढ़ी बन जाए सारी  उम्र गुनहगार इस तरह । करना न मेरी जान कोई प्यार इस तरह। सुनता  हूँ सकीने  पे भी लहरें मचल उठीं दरिया के दिल पे हो गया था वार इस तरह। महफिल में गम की आ गए यादों के परिंदे सूना सा मेरा दिल हुआ गुलजार इस तरह। उल्फत की जंग में न रहा जीत का जज़्बा  हम   एक  दूसरे से  गए  हार इस तरह । सपने  खरीदते रहे जीवन  के मोल हम चलता रहा इस देश में व्यापार इस तरह। तनहा गुजारनी थी मुझे रात वो ‘राढ़ी’ मुझमें समा गया था मेरा यार इस तरह।

मेरी पहली सरस्वती वंदना .....

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मेरी पहली सरस्वती वंदना --------------------- वर दे, वीणावादिनि वर दे। प्रिय घोटालेबाजी नव, झूठ फरेब मंत्र हर मन में भर दे। काट अंध सच के बंधन स्तर बहा धन के नित नव निर्झर ईमानदारी हर बस घोटाले भर घोटाले ही घोटाले कर दे। चहुँदिश होंवें कलमाडी सर, कंठ कंठ हों घोटाले स्वर राजा हों या प्रजा जी हों सबको घोटालेबाज कर दे।

आओ बदलें शहरों की आत्मा...

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गांवों का शहरीकरण हुआ इसमें बुराई भी क्या है..सुख-सुविधा संपन्न हों हमारे गाँव अच्छा ही तो है, लेकिन क्यूँ न हम गाँव वाले जो गाँवबदर हो शहर आ बसे,कुछ ऐसा करें कि शहरों की काया तो शहरी ही हो पर आत्मा का जरुर ग्रामीनिकरण हो जाये....सुख-सुविधा तो शहर की हों पर अपनापन,संबंधों की मिठास, छोटे-बड़े का सम्मान, रिश्तों की गरिमा, खानपान,मस्ती,आबोहवा और अनेकता में एकता से जीने का अहसास गाँव का हो..आप क्या कहते हैं.. ..?

matri smriti

                                                             मातृ स्मृति और अब पहली पुण्यतिथि भी आ गई.....। जैसे विश्वास  करना मुश्किल  हो। पूरे वर्श में शायद  कोई ही दिन रहा हो जब उनकी याद दस्तक देकर, कुरेद कर और निर्बल महसूस कराकर न गई हो। सच तो यह है कि मैं उनकी यादों से भागना भी नहीं चाहता। मुझे भी एक सुकून सा मिलता है यादों में डूबकर। कभी- कभी तो लगता है कि उन यादों के अलावा कोई अन्य शरण  स्थल ही नहीं है। जैसे दर्द ही अब दवा हो। मैं नहीं जानता कि उम्र के पाँचवें दशक  में भी माँ के बिना अनाथ की स्थिति में आ जाना, बेहद अकेला महसूस करना मुझे अच्छा क्यों लगता है ? जैसे - जैसे फरवरी माह की ४/५   की वह रात नजदीक आती जा रही है, माँ का देहत्याग और तीव्रता से याद आने लगा है। सब कुछ किसी फिल्म की रील की तरह आँखों के सामने घूमता जा रहा है। मुझे यह भी नहीं लगता कि यह कोई सांसारिक मोहपाश  है क्योंकि...

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