दोहे
शेख ज़हीरा देखती कठिन न्याय का खेल ।
सच पर जोखिम जान की झूठ कहे तो जेल ॥
खलनायक सब खड़े हैं राजनीति में आज।
जननायक किसको चुनें दुविधा भरा समाज।।
क्या हिंदू क्या मुसलमाँ ली दंगो ने जान।
गिद्ध कहे है स्वाद में दोनो माँस समान॥
-विनय ओझा स्नेहिल
सच पर जोखिम जान की झूठ कहे तो जेल ॥
खलनायक सब खड़े हैं राजनीति में आज।
जननायक किसको चुनें दुविधा भरा समाज।।
क्या हिंदू क्या मुसलमाँ ली दंगो ने जान।
गिद्ध कहे है स्वाद में दोनो माँस समान॥
-विनय ओझा स्नेहिल
वाह विनय भाई, बहुत करारे दोहे हैं. बधाई.
ReplyDeleteबहुत अच्छे दोहे। आखिरी वाला खासकर!
ReplyDeleteबहुत खूब!
ReplyDeleteछ: पंक्तियों में इतना सन्देश! गजब! ईश्वर करे आपकी कलम से काव्य की अनंत धारा बहती रहे.
ReplyDelete6AF9AE3C6F
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