ख्वाहिश


सिर्फ चाहे से पूरी कोई भी ख्वाहिश नहीं होती.
जैसे तपते मरुस्थल के कहे बारिश नहीं होती..

हमारे हौसलों की जड़ें यूँ मज़बूत न होतीं -
मेरे ऊपर जो तूफानों की नवाज़िश नहीं होती..

हमे मालूम है फिर भी सँजोकर दिल मे रखते हैं-
जहाँ मे पूरी हर एक दिल की फरमाइश नहीं होती..

कामयाबी का सेहरा आज उनके सिर नहीं बंधता -
पास जिनके कोई ऊँची सी सिफारिश नहीं होती..

हज़ारों आंसुओं के वो समंदर लाँघ डाले हैं-
दूर तक तैरने की जिनमे गुंजाइश नहीं होती..

खुदा जब नापता है तो वो फीता दिल पे रखता है-
उससे इन्सान की जेबों से पैमाइश नहीं होती..
-विनय ओझा स्नेहिल

Comments

  1. अरे विनय भाई, हमारी टिप्पणी ही खो गई...खैर,

    बेहतरीन रचना की बधाई स्विकारें.

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  2. भाई बधाई स्वीकारें. गजल अच्छी कही. मजा आया.

    ReplyDelete
  3. सुन्दर ग़ज़ल, आपके ब्लॉग पर आज पहली बार आया हूँ (शायद), थोड़ा इसकी सजावट पर भी ध्यान दीजिये विनयजी. ;)

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