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Showing posts from June, 2007

.... भात पसाइये

भाई चंद्रभूषण जी और अफलातून जी ने इमरजेंसी वाले पोस्ट पर ध्यान दिलाया है कि 'पढिये गीता' वाली कविता रघुवीर सहाय की है. दरअसल लिखने के फ्लो में मुझसे भूल हो गयी. असल में उस समय मैं बाबा की 'इंदु जी-इंदु जी क्या हुआ' कविता भी याद कर रहा था और उसी फ्लो में 'पढिये गीता' के साथ नागार्जुन का नाम जुड़ गया. हालांकि कविता मुझे पूरी याद नहीं थी पर अब मैंने इसे तलाश लिया है और पूरी कविता पोस्ट भी कर रहा हूँ. तो आप भी अब पूरी पढिये रघुवीर सहाय की यह कालजयी रचना :
पढिये गीता
बनिए सीता
फिर इन सबमें लगा पलीता
किसी मूर्ख की हो परिणीता
निज घरबार बसाइये.

होंय कंटीली
आँखें गीली
लकडी सीली, तबियत ढीली
घर की सबसे बड़ी पतीली
भरकर भात पसाइये.

('इमरजेंसी चालू आहे' के संदर्भ में मैं फिर जोड़ दूं : अपने या देश की जनता के लिए नहीं, आलाकमान के कुटुंब के लिए. वैसे भी कांग्रेसी इंदिरा इज इंडिया का नारा तो लगा ही चुके हैं. )
और हाँ, गलती की ओर ध्यान दिलाने के लिए भाई चंद्रभूषण और अफलातून जी धन्यवाद स्वीकारें. और समसामयिक संदर्भों के हिसाब से शीर्षक बदल रहा हूँ, इसके लिए क्षमा भी चाहता हूँ. यह बदला…

इमरजेंसी चालू आहे

आज २५ जून है. आज ही के दिन १९७५ में आपातकाल की घोषणा की गयी थी. यह घोषणा तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने की थी. यह क्यों की गई थी और इसकी क्या प्रासंगिकता थी, इस पर बहुत बहस-मुबाहिसे हो चुके हैं. इसलिए मैं अब कुछ कहने की जरूरत नहीं समझता. लेकिन एक बात जरूर कहूँगा. वह यह कि अगर आपको थोडा भी याद हो या आपने अपने बुजुर्गों से कुछ सुना हो तो जरा इतिहास पर गौर करिएगा. गौर करिए कि तब क्या हो रहा था और अब क्या हो रहा है. गौर करिए कि उस निहायत तानाशाही फैसले के पक्ष में और कोई नहीं केवल कम्युनिस्ट थे. यही थे जो उस वक़्त इंदिरा गांधी के साथ खडे थे. इसी बात पर पंजाबी के तेजस्वी कवि अवतार सिंह पाश ने एक कविता लिखी थी. पूरी रचना तो याद नहीं, पर उसकी कुछ पंक्तियां जो मुझे चुभती हैं और मुझसे ज्यादा उन तथाकथित कम्युनिस्टों को जो चौकी पर कुछ और चौके पर कुछ हैं, आज भी याद हैं मुझे.
' मार्क्स का
शेर जैसा सिर
दिल्ली की सड़कों पर
करना था
म्याऊँ-म्याऊँ
यह सब
हमारे ही समय में होना था.'
अपने समय के समाज के प्रति असंतोष, ऐसा विक्षोभ अन्यत्र दुर्लभ है. यह पीड़ा केवल उस महान कवि की नहीं, पूरे भा…

असली फुरसतिया शिरी लालू जी

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अभी दो दिन पहले ही एक पोस्ट पढा था. मसिजीवी भाई का. मन बना था कि पहले उसी पर लिखूंगा. उन्होने बात गांवों को शहरों में बदले जाने के समर्थन में की है. जिस लेख से प्रभावित होकर उन्होने इसका समर्थन किया है अतानु का वह लेख भी पढ़ लिया. तर्क तो मेरे पास ख़ूब हैं, लेकिन इस पर बाद में लिखूंगा. पहले ग़ुस्सा निकल जाए तब, ताकि अगले के साथ कम से कम अन्याय तो न हो! अहा ग्राम्य जीवन भी ख़ूब है, की जमीनी हकीकत मैं बहुत करीब से जानता हूँ. जिस गाँव में मैं पला बढ़ा हूँ वह बाढ और सूखे से ग्रस्त तो नहीं है, लेकिन सरकारी और राजनीतिक लूट-खसोट का जो तांडव वहां मचा है और उसके चलते गाँव के भीतर की सुख शांति जिस तरह छिन्न-भिन्न हो रही है, उसे जानते हुए भी ग्राम्य जीवन के प्रति किसी का आकर्षण बचा रह जाए, यह लगभग नामुमकिन है. इससे भी ज्यादा भयावह स्थिति उस गाँव की है जहाँ से हमारे पूर्वज आए और आकर महराजगंज (तब गोरखपुर) जिले के बैकुंठपुर गाँव में बसे थे. वह गाँव मलांव है. यही वह गाँव है जहाँ से राहुल जी के पूर्वज आजमगढ़ चले गए थे और वहां कनैला गाँव में बस गए थे. मलांव अभी भी गोरखपुर जिले में ही है और हर साल बाढ …

दोहे

शेख ज़हीरा देखती कठिन न्याय का खेल ।
सच पर जोखिम जान की झूठ कहे तो जेल ॥

खलनायक सब खड़े हैं राजनीति में आज।
जननायक किसको चुनें दुविधा भरा समाज।।

क्या हिंदू क्या मुसलमाँ ली दंगो ने जान।
गिद्ध कहे है स्वाद में दोनो माँस समान॥

-विनय ओझा स्नेहिल

अशआर

झूठे सिक्कों में भी उठा देते हैं अक्सर सच्चा माल
शक्लें देख के सौदा करना काम है इन बाजारों का.

******** ******** ********
एक जरा सी बात थी जिसका चर्चा पहुँचा गली-गली
हम गुमनामों ने फिर भी एहसान न माना यारों का.
******** ******** ********
दर्द का कहना चीख उठो दिल का तकाजा वजा निभाओ
सब कुछ सहना चुप-चुप रहना काम है इज्ज़तदारों का.
इब्न-ए-इंशा

अशआर

कुदरत को नामंज़ूर थी सख्ती ज़बान में.
इसीलिये हड्डी न अता की ज़बान में.
-अज्ञात
चमक शीशे के टुकड़े भी चुरा लाते हैं हीरे की ,
मुहब्बत की नज़र जल्दी में पहचानी नहीं जाती.
जिधर वो मुस्कराकर के निगाहें फेर लेते हैं -
क़यामत तक फिर उस दिल की परेशानी नहीं जाती.
-अज्ञात
यूं ज़िन्दगी में मेरे कोई कमी नहीं-
फिर भी ये शामें कुछ माँग रही हैं तुमसे.
-फिराक गोरखपुरी
ये जल्वागहे खास है कुछ आम नहीं है.
कमजोर निगाहों का यहाँ काम नहीं है.
तुम सामने खुद आए ये इनायत है तुम्हारी,
अब मेरी नज़र पर कोई इलज़ाम नहीं है.
-अज्ञातबारिश हुई तो फूलों के दिल चाक़ हो गए.मौसम के हाथों भीग कर शफ्फाक हो गए. बस्ती के जो भे आबगज़ीदा थे सब के सब-दरिया ने रुख़ बदला तो तैराक हो गए.- परवीन शाकिर

चतुष्पदी

हम मुश्किलों से लड़के मुकद्दर बनाएँगे.
गिरती हैं जहाँ बिजलियाँ वहाँ घर बनाएँगे.
पत्थर हमारी राह के बदलेंगे रेत में -
हम पाँव से इतनी उन्हें ठोकर लगाएंगे..
विनय स्नेहिल

समझती नहीं

एक दिन मेरे एक बहुत पुराने दोस्त मेरे घर आए. बचपन के साथी थे तो बड़ी देर तक बातें होती रहीं. कई यार-दोस्तो के चर्चे हुए. अब बातें तो बातें हैं, उनका क्या? जहाँ चार अच्छी बातें होती हैं, दो डरावनी बातें भी हो ही जाती हैं. तो बातें चली और यार-दोस्तो से होते हुए बीवियों तक भी आ गईं. दोस्त ने बताया कि मेरी बीवी तो यार अपने आप से ही बातें करती है.
' अपने आप से बातें तो मेरी बीवी भी करती है, पर वह इस बात को समझती नहीं है. उसे लगता है कि मैं सुन रहा हूँ.' मैंने उन्हें बताया.

मौसम का सुरूर मेरा कुसूर

मैंने अब तक यह सुना था कि आज मौसम बड़ा बेईमान है. हकीकत का आज पता चल गया. लंबे इंतज़ार के बाद जब आज बारिश हुई तो लगा सिर मुड़ते ही ओले बरसने लगे. हुआ यूं कि जल्दी उठकर दफ्तर पहुंचने की तैयारी की और रिमझिम फुहारों का सिलसिला बंद होने के आसार नजर नहीं तो अपने तीन मंजिले ऊपर के मकान से नीचे उतरे. ज्यों ही गाडी स्टार्ट की, उसका स्टार्टिंग बटन चलने को राजी ही नहीं हो रह था. करते-करते मैं आधे से अधिक भीग गई, जितना कि ऑफिस पहुचने पर भी न भीगती. साथ ही सोसाइटी के कम से कम 8 लोगों ने आजमाइश भी की लेकिन अपनी धन्नो टस से मस न हुई. बाद मे पता चला कि पड़ोस मे रखी दूसरी उसी प्रजाति की गाडी बगल मे मुह बाए खडी मौसम का मजा ले रही थी. ऐसे में धन्नो मेरे साथ जाने को तैयार न थी. मौसम का सुरूर देखिए. लेकिन भला बताइए इसमे मेरा कुसूर क्या था? आख़िर वो मुझसे बेईमानी कर ही गया. जय बाबा भोलेनाथ. जय राम जी की.
इला श्रीवास्तव

निराश क्यों होता है मन

अपने हाथों से
जब होगा
अपनी स्थिति में परिवर्तन,
फिर निराश
क्यों होता है मन?

हमने ही
तारों की
सारी क्रिया बनाई,
हमने ही
नापी
जब सागर की गहराई;

हमने ही
जब तोड़े
अपनी सारी सीमाओं
के बन्धन -

फिर निराश
क्यों होता है मन?

मेरी
पैनी नज़रों ने ही
खोज निकाले
खनिज
अंधेरी घाटी से भी;
हमने
अपने मन की गंगा
सदा बहाई
चीर के
चट्टानों की छाती से भी;

कदम बढ़ाओ
लक्ष्य है आतुर
करने को तेरा आलिंगन.
फिर निराश
क्यों होता है मन?

मत सहलाओ
पैर के छालों को
रह- रह कर.
ये तो
सच्चे राही के
पैरों के जेवर.
मत घबराओ
तूफानों से या बिजली से
नहीं ये शाश्वत
क्षण भर के
मौसम के तेवर.

धीरे-धीरे
सब बाधाएँ
थक जाएँगी,
तब राहों के
अंगारे भी
बन जाएँगे शीतल चंदन.
फिर निराश
क्यों होता है मन?
विनय स्नेहिल

अधिकार तुम्हारा

तन तो मेरा है
लेकिन
मन पर अधिकार
तुम्हारा है.

मेरी साँसों में सुरभित,
तेरी चाहत का चंदन है.
कहने को तो
ह्रदय हमारा,
पर
इसमें तेरी धड़कन है.
तेरी आंखों से
जो छलके है
वो प्यार हमारा है.

मेरे शब्द गीत के
रखते
तेरी पीड़ा के स्पंदन,
कलिकाएं ही
अनुभव करतीं
भ्रमरों के
वो कातर क्रन्दन.
मैं वो मुरली की धुन हूँ
जिसमें गुंजार तुम्हारा है.

चाह बहुत है मिलने की
अवकाश नहीं मिलता है
दोष नियति का भी कुछ है
जो साथ नहीं मिलता है.
सोम से शनि
तक मेरा है
लेकिन इतवार तुम्हारा है.
विनय स्नेहिल

चलना हुआ दुशवार हमारी दिल्ली में

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ऐसे समय में जबकि सारी चीजें तेजी से महंगी होती चली जा रही हों, तब आने-जाने के खर्च का भी बढ जाना कोढ़ में खाज ही तो कहा जाएगा! फिलहाल दिल्ली में यही हुआ है. अभी हफ्ता भी नहीं बीता बसों और आटो के किराये में बढोतरी हुए कि अब पैट्रोल और डीजल के दाम भी बढ़ा दिए गए हैं. किराया बढ़ा देने के बाद आटो या बसों की सेवाओ में कोई सुधार आया हो ऐसा कुछ भी भारतीय जनता तो सपने में भी नहीं सोच सकती है. राजनेताओं ने भी इस सिलसिले में कोई बयान जारी करने और यहाँ तक कि सोचने की भी जहमत नहीं उठाई. न तो आटो या टैक्सी वालों का तौर-तरीका बदला है, न बस वालों का और न ही चौराहों-नाकों पर तैनात पुलिस वालों का. बदला अगर कुछ है तो वह सिर्फ किराया है और आम आदमी की जेब पर बढ़ा बोझ है. हालांकि बसों-आटो के किराये के बढ़ने की बात तो लोगों को पहले से ही पता थी. इसके लिए पहले से ही हौले-हौले माहौल भी बनाया जा रहा था. लेकिन पैट्रोल-डीजल के दाम तो एक झटके से ही बढ़ा दिए गए. बिना कोई सूचना दिए, बिना कोई बात किए, चुपके से. इसे क्या कहिएगा?
अधिसूचना के मुताबिक पैट्रोल ६७ पैसे और डीजल २२ पैसे महंगा हो गया है. दिल्ली सरकार का तर्…

ग़ज़ल

सिवा अपने इस जगत का आचरण मत देखिए.
काम अपना है तो औरों की शरण मत देखिए.
होती हैं हर पुस्तक में ज्ञान की बातें भरी,
खोलकर पढ़िए भी इसको आवरण मत देखिए.
कंटकों के बीच खिल सकता है कोई फूल भी,
समझाने में व्यक्ति को वातावरण मत देखिए.
लक्ष्य पाना है तो सुख की कल्पनाएं छोड़ दो,
लक्ष्य ही बस देखिए आहत चरण मत देखिए.
यदि समझना चाहते हो जगत के ध्रुवसत्य को
आत्मा को देखिए जीवन मरण मत देखिए.
विनय स्नेहिल

किया क्या जाए

जिंदगी का यदि यही सत्य है तो किया क्या जाए.
यहाँ पेय ही पथ्य है तो पिया क्या जाए.
रात का सिलसिला दिन और फिर रात से -
काल का यदि यही व्रत्य है तो किया क्या जाए.
इष्ट देव सांकृत्यायन

सदा मत दे

भूल जाऊं मुझे सदा मत दे.
आतिश ए इश्क को हवा मत दे..
हमने किश्तों में खुदकशी की है,
और जीने कि बद्दुआ मत दे.
मैं अकेला दिया हूँ बस्ती का,
कोई जालिम हवा बुझा मत दे.
एक यही हमसफ़र हमारा है,
दर्दे दिल कि हमें दवा मत दे.
वो कातिलों के साथ रहता है,
अपने घर का उसे पता मत दे.
घुटके दम ही ना तोड़ दे स्नेहिल,
उसको इतनी कड़ी सज़ा मत दे..
विनय स्नेहिल


यह जमाना

यह ज़माना इस क़दर दुश्मन हमारा हो गया.
ख्वाब जो देखा था वो दिनका सितारा हो गया.
मेरे सीने में पला फिर भी ना मेरा हो सका -
एक नज़र देखा नहीं कि दिल तुम्हारा हो गया.
चाहतें कितनों की फूलों की अधूरी ही रहीं -
उम्र भर कांटो पे चलकर ही गुज़ारा हो गया.
एक शै को देख कर सबने अलग बातें कहीँ -
नज़रिया जैसा रहा वैसा नज़ारा हो गया.
वकफियत तक नहीं महदूद मेरी दोस्ती -
मुस्करा कर जो मिला वो ही हमारा हो गया.
विनय स्नेहिल


चतुष्पदी

सोचो क्या यह दुनिया में हैरत की बात नहीं!
कितने सीने में दिल हैं लेकिन जज्बात नहीं.
रहे कहॉ भगवान, ना मंदिर मस्जिद में जाये तो?
काशी या काबा जैसा, कोई दिल पाक नहीं..
विनय स्नेहिल

आरक्षण की पलायनवादी राजनीति

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गूजरों को जनजाति में शामिल किए जाने की मांग को लेकर उठा तूफ़ान अब शांत हो गया है. गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति और राजस्थान सरकार के बीच समझौता हो गया है. समझौते का मतलब यह नहीं है कि कोई फैसला हो गया है. बस इतना हुआ है कि एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति के गठन का आश्वासन आंदोलनकारियों को दे दिया गया है. अब यह समिति पहले तो तीन महीने तक स्थितियों का अध्ययन करेगी और फिर राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप देगी. इसके बाद सरकार उस पर विचार करेगी, बहस-मुबाहिसे होंगे, विधानसभा और संसद से एक-दो बार वाकआउट आदि का नाटक होगा. इतने में चुनाव आ जाएँगे और यह सरकार चली जाएगी. जैसी कि भारत में परम्परा सी बन गयी है, सभी सरकारें जानती हैं कि जैसी उनकी करतूतें रही हैं उस हिसाब से जनता उन्हें तुरंत दुबारा सत्ता सौपने की बेवकूफी तो कर नहीं सकती है.
अब यह मुश्किल अगली सरकार की होगी. खुदा ना खास्ता अगर कहीँ दुबारा सत्ता में तुरंत वापसी हो भी गयी तो भी इतनी चिन्ता की कोई बात इसमें नहीं है. आखिर समस्या हल तो होनी नहीं है, लिहाजा फिर किसी तरह टाल दीं जाएगी. कोई न कोई नया बहाना तब तक जरूर तलाश लिया जाएगा. चाहे तो कोई नया…

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