क्योंकि थोड़ा सा मैं भी जीना चाहती हूं
(माइक्रो-स्टोरी)
“तू है कौन?”
“जिंदगी”
“तो यहां क्या कर रही है।?“
“तुम्हारे साथ हूं?”
“क्यों?”
“क्योंकि थोड़ा सा मैं भी जीना चाहती हूं।”
“तू है कौन?”
“जिंदगी”
“तो यहां क्या कर रही है।?“
“तुम्हारे साथ हूं?”
“क्यों?”
“क्योंकि थोड़ा सा मैं भी जीना चाहती हूं।”
अच्छा लगा…।
ReplyDeleteकम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया…।
nayab!
ReplyDeletenayab!
nayab!
वाह....सुंदर
ReplyDelete"मुझे मार कर ?"
ReplyDelete"नहीं"
"तो"
"मरने न दूँगी तुम्हे मौत के बाद भी "
"वो कैसे "
"जिन्दा रहेगा तू मेरे संग "
यह जिन्दगी के साथ वाला कौन है?
ReplyDeleteबहुत ही गहन भाव.
ReplyDeleteबड़ा रहस्यवादी मामला लगता है भाई। कौन क्या कह रहा है?
ReplyDeleteवाह...वाह।
ReplyDeleteक्या बात है..
लोटे में समन्दर समाया है।
muthee se aaapne dunia nikaal dee. behtareen...
ReplyDeleteसार्थक लघुकथा।
ReplyDelete-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
एक बहुत ही ख़ूबसूरत लघु कथा है . मुझे याद आ रही है एक प्रसिद्ध साहित्यकार की एक लघु कथा -
ReplyDelete- 'पापा मम्मी की पींठ बहुत गोरी है .'
- 'ऐसा कौन कहता है बेटा ?', पिता का माथा ठनका .
- 'आप ही तो कहते हैं . '
waah !!
ReplyDelete3554E0F767
ReplyDeletekiralık hacker
hacker arıyorum
belek
kadriye
serik