मायानगरी के सच का सच


बिली ग्राहम अमेरिकी इवैंजेलिस्ट थे. उनकी कुछ बातें ऐसी हैं जो सार्वकालिक और सार्वदेशिक महत्व की हैं. कहावत का रूप ले चुकी हैंं और दुनिया भर में कहावतों के रूप में ही जानी जाती हैं. ऐसी ही बातों में एक है:

When wealth is lost, nothing is lost; when health is lost, something is lost; when character is lost, all is lost.

बीते पाँच दशकों में बहुत कुछ उलट गया है. जैसे यह दुनिया को यह समझाया जाने लगा है कि सत्य और ईमानदारी जैसा कुछ होता ही नहीं है. आज वही ईमानदार है, जिसे बेईमानी का मौका नहीं मिला या जिसके पास बेईमानी करने का साहस या अक्ल नहीं है.

हद्द है. बेईमानी को साहस और बेशर्मी - नंगई को बहादुरी से जोड़ा जाने लगा है. जाहिर है, ऐसे में चरित्र की स्थिति भी बदल चुकी है. झूठ बोलने वाले इतने करीने से बोलते हैं और वह भी पूरे जोर से शोर मचाकर कि सच उनके शोर के भार के तले तड़फड़ाकर मर ही जाता है. वसीम बरेलवी का शे'र याद आता है:

वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीके से
मैं ए'तिबार न करता तो और क्या करता.

सिनेमा बहुत हद तक ऐसा ही करता है. वह कहता हमेशा अच्छे को बुरा और बुरे को अच्छा नहीं है. कई बार वह अच्छे को अच्छा और बुरे को बुरा भी कहता है. पर नहीं, बात को पूरी तरह उलट कर. वैसे ही जैसे आजकल कुछ लोग ऐतिहासिक तथ्यों को लात मारते हुए बता रहे हैं कि पाकिस्तान के आइडियोलॉग सावरकर थे. वे भूल जाते हैं सय्यद अहमद खान और सय्यद अमीर अली को. भूल जाते हैं मोहम्मडन एजूकेशनल कॉनफ्रेंस को. जो 1886 में ही बन चुका था और 1905 में इसी ने मुस्लिम लीग की शक्ल ले ली थी. या शायद सय्यद अहमद खान और सय्यद अमीर अली का नाम बदल कर वीर सावरकर कर देते हैं. पाप धोने का इससे अच्छा तरीका और कुछ नहीं हो सकता.

ये तरीका उन्होंने हिंदी सिनेमा से ही सीखा या हिंदी सिनेमा ने उनसे, ये कहना जरा मुश्किल है. क्योंकि हिंदी सिनेमा ने ये तरीका बड़ी शिद्दत से तबसे अपनाया जबसे वह अंडरवर्ल्ड के कब्जे में आया. और ये तरीका है नाम बदल का.

मसलन अगर कोई अच्छा काम राजेश करे तो सिनेमा में उसका नाम बदल कर नईम कर दो. यानी हीरो अगर बनाना हो तो राजेश को बना दो नईम. लेकिन अगर बुरा काम नईम खान करे तो उसका नाम बदलकर कर दो राजेश. बिलकुल वैसे ही जैसे मीडिया अपने आप रेप के माइनर आरोपियों के नाम बदलकर कुछ से कुछ कर देता है.

ना, इसके लिए किसी कोर्ट की कोई गाइडलाइन नहीं है. लेकिन ये इन्हें करना हि. क्यों करना है भाई?

क्योंकि ये सच के ठेकेदार हैं, क्रिएटिविटी के ठेकेदार हैं. समाज में उदारता के ठेकेदार हैं. और इनका सारा सच, सारी क्रिएटिविटी और सारी उदारता की स्रोतभूमि कहाँ है? तो हुजूर, वो है पाताललोक. पाताल आप जानते ही हैं, कहाँ है! धरती के नीचे.

यहाँ एक और बात का ख्याल रखें. पाताल से सच निकालना एक बात है, लेकिन पातालवासियों के इशारे पर सच निकालना, बिलकुल अलग. वह सच जो निकालता है, उसके पीछे पातालप्रभुओं की बंदूकें लगी होती हैं. ठीक निशाने पर. पातालप्रभुओं के यहाँ मायानगरी के महानायकों के नाम चिकना, चुपड़ा, पौना टाइप होते हैं. (टेप आपने भी सुने ही होंगे) और वहाँ अपने इस अर्थपूर्ण नाम से ही ये बुलाए जाते हैं. इसके खिलाफ इनकी जबान कभी हिलने की सोच भी नहीं पाती.

सोचे भी कैसे! मायानगरी के ज्यादातर तमाशे उनके दम पर चलते हैं. अनअकाउंटेड मनी वहाँ से मिलती है. दो-चार फिल्में फ्लॉप हो जाएं तो घर चलाना दुश्वार. फिर वो खर्चे भी वहीं से चलते हैं. बस ये है कि इसके लिए इन्हें उनके अंतःपुर में कुछ न कुछ बनना पड़ता है. अब इस कुछ न कुछ की परिभाषा आप समझते ही हैं.

तो यह है इनके सच का सच. वह सच जो बेचे जाने के लिए गढ़ा गया है. अब जिसका अंतिम उद्देश्य बिकना ही हो, ज्यादा से ज्यादा बिकना, उस सच का सच इससे ज्यादा क्या बताया जाए! जब सच ऐसा शर्मनाक हो तो उसके लिए सिद्धांतों के रूप में बहाने बहुत गढ़ने होते हैं. गढ़े जा रहे हैं, गढ़े जाते रहे हैं और गढ़े जाते रहेंगे.

पर खयाल रहे, पाताल है धरती के नीचे ही. वह कितना भी ताकतवर हो और कचहरी कितनी ही बिकी हो, जिस दिन धरती का लोक जुट जाता है, कोई नहीं टिकता. फिर तुम्हारे पास और कोई चारा नहीं बचेगा, सिवा असहिष्णुता असहिष्णुता चिल्लाने के.


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