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Showing posts from 2020

समर्पित कार्यशैली की गवाह है निकट

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दीप्ति गुप्ताकुछ दिन पहले निकट पत्रिकाका अप्रैल-सितंंबर, 2020 का संयुक्तांक मिला। कोरोना से उपजी पंगु स्थितियों और तमाम छोटी-बड़ी अकल्पनीय बाधाओं एवं समस्याओं के बाद भी पत्रिका का छपकर पाठकों तक पहुँचना, जंग जीतने से कम नहीं।  लेखकों की रचनाओं को पढ़ना,फिर उत्तम साहित्यिक रचनाओं का चयन करना,उन्हें तरतीब देना, प्रूफ़ रीडिंग औरसंपादन के तहत, सामग्री मैं थोड़ी-बहुत कतर-ब्योंत के बाद, अंतिम रूप देकर, पत्रिका का कलेवर तैयार करना, कोईसरल कार्य नहीं है। दिल, दिमाग औरदेह कीखासी मशक्कत होती है। जब ये तीन "दकार" जुगलबंदी में ढल जाते हैं, तब पत्रिका सज-सॅवरकर पाठकों और लेखकों तक पहुँचने के लिए तैयार हो पाती है। यह पत्रिका संपादक की इस समर्पित कार्यशैली की गवाह है।इस अंककी शुरूआत भरत प्रसादके उपन्यास अंशसे होती है।उसेपढ़कर मुझे आगे पढ़ने की जिज्ञासाहुई,तो नन्दकिशोर महावीर का अमृतलाल वेगड़की स्मृति में लिखा भावभीना आलेखमेरे मन को अंत तकबाँधेरहा। गद्य विधाओं के तहत इस अंक में आगे दो 'संस्मरणों' को संजोया गया है। संस्मरण मुझे बहुत लुभाते हैं। बीते दिनों व उनसे जुड़े खास व्यक्तियों औ…

अक्क महादेवी की भक्ति और स्त्री स्वातंत्र्य

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सोनाली मिश्रायह कहानी शिव और उनकी एक भक्त के प्रेम की कहानी के साथ ही स्त्री की स्वतंत्रता की कहानी है, जिसकी आज कल्पना ही नहीं की जा सकती है.  भारतीय पुरुष स्त्री की विराटता के सम्मुख आदर से नतमस्तक हुए हैं, यदि स्त्री ने अपने अस्तित्व को विराट स्वरुप में दिखाया है, जैसे इन दिनों नौ दिनों में नौ रूपों का आदर करते हैं. यह कथा आज के खोखले स्त्री विमर्श पर प्रश्न उठाती है. आइये महादेव और अक्क महादेवी की भक्ति कथा और स्त्री स्वतंत्रता की कथा को पढ़ें: “यदि मैं तुम्हारा पति नहीं, और तुम मुझे छोड़कर अपने चेन्नमल्लिकार्जुन के पास जाना चाहती हो तो जाओ! आज से यह महल तुम्हारा घर नहीं! जब से विवाह हुआ है, तब से तुम उस चेन्नमल्लिकार्जुन के कारण पति के निकट नहीं आ रही हो! जाओ, इस महल इसे इसी क्षण निकल जाओ!”और महल में सन्नाटा छा गया! कर्नाटक के शिवमोग्गा जिले के शिकारीपुर तालुक में जन्मी अट्ठारह वर्ष की महादेवी आज अपने पति की सभा के मध्य खड़ी थीं. अपने इस लोक के पति राजा कौशिक के संग हुए अन्याय पर उसे दुःख था, परन्तु वह क्या करती! वह तो अपना ह्रदय शिव को दे चुकी थी!  और यह आज की बात न थी, न जाने कितने…

संबंध क्या है और दुःख से कैसे जुड़ा है?

कमलेश कमल"संबंध भी छोटे बच्चे की ही भाँति होते हैं- हरदम ध्यान रखना पड़ता है, सँवारना पड़ता है।"वस्तुतः, मानव जीवन व्यक्ति एवं वस्तु (सजीव अथवा निर्जीव) से संबंधों का समुच्चय होता है। ये संबंध भावनात्मक, मानसिक, शारीरिक, सामाजिक आदि हो सकते हैं।जी हाँ, ग़ौर से देखें, तो रिश्ते हमारे जीवन की धुरी होते हैं। जो रिश्तों में नहीं बँधा है, वह संन्यासी है अथवा पशु। कोई जिस हद तक मानवीय मूल्यों, सरोकारों को निभाता है, उस हद तक रिश्तों की डोर से उद्दित या अनुबद्ध भी रहता है।रिश्ते या संबंध सदा प्रीतिकर ही हों, यह अननिवार्य है, आवश्यक नहीं है। व्यावहारिक तौर पर देखा गया है कि व्यक्ति जानते हुए भी कि उसकी किसी पर निर्भरता है, किसी से अति-प्रीति है, वह उससे मनमुटाव भी करता है, तर्क भी करता है और लड़ता भी है। यह उसके संबंध निबाहने का संस्कार होता है। दो दिन के लिए उसे उससे अलग करके देखिए, किसी बीमारी की झूठी सूचना देकर देखिए, प्रेम सभी वैमनस्य को दबाकर ऊपर आ जाएगा।संबंधों की चर्चा करते समय कुछ आम धारणाएँ मिलती हैं, जैसे- 'संबंध दुःख देते हैं' या 'संबंध से दुःख मिलता है'। इन ब…

भारतीय भाषाओं को बचाने का समय : प्रो. द्विवेदी

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अंकुर विजयवर्गीय नई दिल्ली। ''पूरे विश्व में लगभग 6000 भाषाओं के होने का अनुमान है। भाषाशास्त्रियों की भविष्यवाणी है कि 21वीं सदी के अंत तक इनमें से केवल 200 भाषाएं जीवित बचेंगी और खत्म हो जाने वाली भाषाओं में भारत की सैकड़ों भाषाएं होंगी।'' यह विचार भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने मंगलवार को हिंदी पखवाड़े के दौरान आयोजित की गई प्रतियोगिताओं के पुरस्कार वितरण समारोह में व्यक्त किए। कार्यक्रम में संस्थान के अपर महानिदेशक श्री सतीश नम्बूदिरीपाद, प्रोफेसर आनंद प्रधान एवं भारतीय सूचना सेवा की पाठ्यक्रम निदेशक श्रीमती नवनीत कौर भी मौजूद थीं। समारोह में प्रो. द्विवेदी ने सभी विजेताओं को प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया। कोविड-19 महामारी के संबंध में सरकार की ओर से जारी दिशानिर्देशों का अनुपालन करते हुए इस कार्यक्रम में केवल पुरस्कार विजेताओं को ही आमंत्रित किया गया।इस अवसर पर प्रो. द्विवेदी ने कहा कि अगर आप भाषा विज्ञान के नजरिए से देखें, तो हिंदी एक पूर्ण भाषा है। हिंदी की देवनागरी लिपि पूर्णत: वैज्ञानिक है। हिंदी भाषा में जो बोला जाता है…

सवाल

मुमताज़ अज़ीज़ नाज़ाँएक बेटी ने ये रो कर कोख से दी है सदामैं भी इक इंसान हूँ, मेरा भी हामी है ख़ुदाकब तलक निस्वानियत का कोख में होगा क़ितालबिन्त ए हव्वा पूछती है आज तुम से इक सवालजब भी माँ की कोख में होता है दूजी माँ का क़त्लआदमीयत काँप उठती है, लरज़ जाता है अद्लदेखती हूँ रोज़ क़ुदरत के ये घर उजड़े हुएये अजन्मे जिस्म, ख़ाक ओ ख़ून में लिथड़े हुएदेख कर ये सिलसिला बेचैन हूँ, रंजूर हूँऔर फिर ये सोचने के वास्ते मजबूर हूँकाँप उठता है जिगर इंसान के अंजाम परआदमीयत की हैं लाशें बेटियों के नाम परकौन वो बदबख़्त हैं, इन्साँ हैं या हैवान हैंमारते हैं माओं को, बदकार हैं, शैतान हैंकोख में ही क़त्ल का ये हुक्म किसने दे दिया

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