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Showing posts from June, 2019

अंडरवर्ल्ड से तिब्बती योग तक

कल बात गंगा की चली थी और वह भी उल्टी बहने वाली गंगा. सिनेमा की दुनिया में गंगा उल्टी ही बहती है. 80-90 के दशक में जो फिल्में बन रही थीं, एंग्री यंग मैन वाले जो रोल बहुत पसंद किए जा रहे थे और उसी नाते कुछ अभिनेताओं में लोग देवी-देवता देखने लगे थे, उनकी हकीकत शताब्दी के अंत तक आते-आते खुलने लगी थी. मजाक तो समझदार लोग तब भी उड़ाते थे और बोलते थे कि एक टिटहरी जैसा आदमी डॉन के अड्डे में घुसकर हथियारों से लैस उसके पचास मुश्टंडों को निबटा देता है, यह सिर्फ़ हिंदी सिनेमा में ही हो सकता है. और कहीं नहीं.
तो उल्टी गंगा के क्रम में ही मुझे फिल्मी दुनिया की एक और गंगा याद आई. वही गंगा जो मैली हो गई थी. वह गई तो सीधी ही थी. जहाँ तक मुझे याद आता है वह निकली पहाड़ के किसी छोटे से गाँव से थी और अपने शेखचिल्ली टाइप प्रेमी के चक्कर में शादी-वादी करके एक बच्चे की माँ भी बन गई. पर उसका वह प्रेमी फिर गायब हो गया. लौट नहीं पाया समय से.
पहली बात तो यह कि ऐसा भारत में कहीं होता नहीं. कुछ बेहद मजबूर या आपराधिक मनोवृत्ति वाले माता-पिता की बात छोड़ दें तो इस टाइप वाले माँ-बाप भारत में कहीं पाए नहीं जाते जो अपनी बेटी …

उल्टी गंगा बहाती फिल्में

गंगा गंगोत्री से निकलकर ऋषिकेश, हरिद्वार, गढ़मुक्तेश्वर, कानपुर, प्रयागराज, काशी, अजगैबीनाथ आदि होते हुए हावड़ा से आगे जाकर गंगा सागर में मिलती है क्या? नहीं न। असल में इसका उलटा है। असल में है क्या कि गंगा गंगासागर से निकलती है और भुवनेश्वर, हैदराबाद, चेन्नई, बंगलुरू, मुंबई, लाहौर, काबुल, मॉस्को आदि होते हुए आल्प्स की पहाड़ियों में कहीं मिल जाती है। अगर आप इस सच को स्वीकार कर सकते हैं तो जरूर देखें। फिल्में आपके लिए ही बनती हैं। अगर आप इस सच से आहत नहीं होते हैं, अगर आपके मन में इस सच पर कोई सवाल नहीं उठता, अगर आपके मन में सच और स्थापित तथ्यों को क्रिएटिविटी के नाम पर इस तरह विकृत किए जाने पर कोई पीड़ा नहीं होती, अगर आप गटर को बिस्लरी और बिसलरी को गटर मान सकते हैं तो साथी फिल्में जरूर, जरूर, जरूर देखें। फिल्में आपके लिए ही बनती हैं। आप ही हैं वो होनहार जिसके दम पर कई लाख करोड़ का धंधा चल रहा है। आप ही हैं वो महान आत्मा जिसके दम जिनके साथ बैठने में भी सभ्य व्यक्ति को शर्म आनी चाहिए उनके एक आटोग्राफ के लिए कुछ लोग कुत्ते से भी बदतर बनने को तैयार हैं। आप ही हैं वो विद्वाज्जन जिनके लिए …

हिंदी सिनेमा और सब आपका

हर हफ्ते 10-20 ठो फिल्में रिलीज होती हैं. उनमें एकाध बड़े बजट की होती हैं. महीने-दो महीने में एक-दो बहुतै बड़े बजट वाली फिल्में भी आती हैं.
अब ये इतना बड़ा वाला बजट आता कहाँ से है और इससे जो वसूली होती है, उसका रिटर्न जाता कहाँ तक और कैसे है, ये जानने वाले बहुत अच्छी तरह जानते हैं और जो नहीं जानते वो तो यह भी नहीं जानते कि परदे का हीरो वास्तव में कितना साहसी और दिलदार होता है, यह भी कि हो सकता है कि परदे का विलेन वाकई कोई नेक इंसान हो पर हीरो से ये उम्मीद बेमानी है. करीब-करीब उतनी ही बेमानी जितनी हिंदी के किसी नामी साहित्यकार के साहित्य में सच की अपेक्षा.
तो बात बड़े बजट वाली फिल्मों की हो रही थी. ये जो बड़े बजट वाली फिल्में होती हैं, उनके सामने बहुत बड़ी समस्या उस बड़े बजट की वसूली होती है. दर्शक आमतौर पर सिनेमाहाल तक जाना नहीं चाहता. वैसे भारत में सिनेमाहाल तक जाने वाले आम तौर पर तीन ही तरह के लोग होते रहे हैं. या तो वे जो परम फालतू किस्म के लोग हैं. जिनमें थोड़े-बहुत मामूली अंतर के साथ वही कहानी बार-बार झेलने की हिम्मत है. या फिर वे जिनका पृथ्वी नामक ग्रह पर अवतार ही पंखा बनने के लिए हुआ ह…

Yudhishthir ka kutta by Hari Shanker Rarhi

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युधिष्ठिर का कुत्ता   व्यंग्य संग्रह  (लेखक हरिशंकर राढ़ी )
हरिशंकर राढ़ी  का प्रथम व्यंग्य संग्रह " युधिष्ठिर का  कुत्ता " अयन प्रकाशन मेहरौली नई दिल्ली से प्रकाशित होकर आ गया है. यह कुल सोलह व्यंग्यों का संग्रह है जो लगभग बीस साल की अवधि में लिखे गए हैं।  संग्रह की पृष्ठ संख्या 132 है और मूल्य 260 /- है. यह संग्रह अब हिंदी बुक सेंटर पर उपलब्ध है जो की  साइट   पर ऑन लाइन मंगाया  जा सकता है. साथ ही स्नैपडील पर भी उपलब्ध है। इस संग्रह पर वरिष्ठ व्यंग्यकार सुरेश कांत कहते है :
कल शाम व्यंग्यकार हरिशंकर राढ़ी (Hari Shanker Rarhi) द्वारा भिजवाया गया उनका प्रथम व्यंग्य-संकलन 'युधिष्ठिर का कुत्ता' मिला। 132 पृष्ठों का 260रुपये मूल्य वाला यह संकलन अयन प्रकाशन, महरौली, नई दिल्ली-110030 ने छापा है, जिसमें भूमिका के अतिरिक्त उनके पिछले 20 वर्षों में लिखे गए 16 व्यंग्य शामिल हैं। छोटी-सी भूमिका में उन्होंने कई बड़ी बातें कही हैं। एक तो यह कि यथार्थ-दर्शन का 'पुण्य' हर आँख को नहीं मिलता और जब मिल जाता है तो 'व्यंग्य' का जन्म होता है। दूसरे, उनके इस संकलन के प्रकाशन का…

Ek Baarat Yatra : Andar Baahar (Samsmaran - A Marriage Procession)

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संस्मरण एक बारात यात्रा : अंदर और बाहर -हरिशंकर राढ़ी
अभी बिहार से एक बारात करके होकर लौटा हूँ। बहुत दिनों से बिहार में किसी विवाह में सम्मिलित होने की इच्छा थी। वैसे भी बिहार घूमने और देखने का कभी नजदीकी अवसर नहीं मिला था। एक-दो बार ट्रेन से आना-जाना हुआ, लेकिन उसे बिहार भ्रमण तो नहीं माना जा सकता। सुना था कि बिहार कि संस्कृति बहुत धनी है। मिथिला की ओर विवाह एक बहुत भव्य आयोजन होता है और व्यंजनों की भरमार लग जाती है। पिछले कुछ दशकों में बिहार कई अर्थों में बदनाम हुआ। उसकी प्रतिष्ठा में जातिवाद, बेरोजगारी, लचर कानून व्यवस्था और कुछ हद तक निम्न जीवन स्तर ने बहुत बट्टा लगाया। बिहार की साख गिराने में पलायनवाद ने महती भूमिका निभाई। कारण कुछ भी रहा हो, बिहार बदनाम हुआ। फिर भी, बिहार की संस्कृति और व्यवस्था को देखने के लिए मेरा मन कसमसाता रहा। संयोग बन गया। एक मित्र के भतीजे की षादी भागलपुर में तय हुई तो उनका आग्रहपूर्ण आदेश आया कि बारात चलना है। उसमें भी अच्छाई यह कि दिल्ली से एक बड़ा दल चलेगा जिसमें अधिकांश लोग मेरे नजदीकी परिचय के दायरे में। बाकी बारात कानपुर से। अब मैं मना ही क्यों करता ? तो…

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