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Showing posts from September, 2010

दुनियादारी का चलचित्र

“तभी विचित्र हुआ. प्राय: सभी युवक एक साथ खड़े हो गए. बात की बात में सबों ने अपनी कमर के नीचे के कपड़े उतार दिए – धोती, पैंट, पाजामा, नीकर तक और एक स्वर में बोल पड़े “वोट? उत ना मिली तोहरा. इहे मिली.....”
चौंकिए नहीं, यह किसी ख़बर की पंक्ति नहीं है. अभी यह एक उपन्यास से लिया गया उद्धरण है. ग्यारह साल पहले यानी सन 1999 में आए भगवती शरण मिश्र के उपन्यास ‘अथ मुख्यमंत्री कथा’ की पृष्ठ संख्या 305 से. बेशक़ अभी कहीं ऐसा हुआ नहीं है, लेकिन अगर भारतीय राजनीति की यही दशा रही, तो जिस दिशा में वह जा रही है, उसका गंतव्य यही है. क्षुद्र स्वार्थों के दलदल से जो शख़्स ज़रा सा भी ऊपर उठ सका है, जो थोड़ा सा भी नीति-अनीति को समझने-मानने वाला है और जिसमें लेशमात्र भी आत्मसम्मान-स्वाभिमान जैसा कुछ शेष है; हर वह भारतीय नागरिक देश के हर नेता के साथ यही व्यवहार करना चाहता है. वैसे भी पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान भारतीय लोकतंत्र में नए-पुराने और सिले-फटे हर प्रकार के जूतों ने जो अभूतपूर्व भूमिका निभाई है, उसका संकेत यही है. हमारी राजनीति अगर तरक़्क़ी की प्रक्रिया में बैलट से चलकर बुलट और फिर ईवीएम में गड़बड़ी तक आ पहुंच…

सच यही है...

सय्याद के पंजों में चमन देख रहे हैं, बन्दर के करों में भी अगन देख रहे हैं.... (प्रो.सारस्वत मोहन मनीषी)

सच-सच बताना किस किस ने मनाई आज हिंदी की बरसी...?

बरसी नहीं तो और क्या....जो भाषा मेरी मां की भाषा है, जिस भाषा में मैंने पहला बोल बोला, जिसमें मैंने मां कहना सीखा, जिसमें मैंने पिता जी कहना सीखा, जिसकी गोद में बड़ा हुआ, जिस बोल से मैंने अपने भाई बहनों से लड़ना-झगड़ना-प्यार करना सीखा, जिस भाषा में मेरी मां ने मुझे डांटा, दुलार किया, जिस भाषा में मैंने जीना सीखा आज अगर उसके लिए उसका दिवस मानना पड़े तो उसे बरसी नहीं तो और क्या कहूं........

तीसरा आदमी

इष्ट देव सांकृत्यायन

आज ही ख़बर देखी ‘हर तीसरा भारतीय भ्रष्ट’. केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त, भगवान जाने यह क्या होता है. इस खबर के पहले तक तो मुझे पता भी नहीं था. क्योंकि देश में न तो मैंने कोई सतर्कता होते देखी और न सतर्कता के चलते कोई दुर्घटना या भ्रष्टाचार रुकते देखा. जहां जो होना होता है, वह हो ही जाता है. अगर कुछ नहीं होता तो यह या करना चाहने वाली की हुनर या फिर उसकी इच्छाशक्ति में कमी की वजह से होता है. हम शुरू से मानते आ रहे हैं कि जो हो जाता है वह ईश्वर की इच्छा से होता है और जो नहीं होता है, वह इसीलिए नहीं होता क्योंकि ईश्वर की इच्छा नहीं होती. हम शुरू से मानते हैं कि ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता. इसीलिए हम यह भी मानते आए हैं कि सरकारी दफ्तर में बाबू या साहब अगर आपसे रिश्वत ले लें तो वह भगवान मर्जी है. लेकर काम कर दें तो वह भी भगवान की मर्जी और लेकर भी न करें तो वह भी भगवान की मर्जी. भगवान ने किसी सरकारी दफ्तर में बाबू, साहब या चपरासी बनाया हो और घूस न ले, ऐसी कोताही तो वह किसी क़ीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकते. इसीलिए ऐसे लोगों को सरकारी दफ्तरों से जल्दी ही एग्ज़िट का गे…

मैंने भगवा ओढ़ लिया है और मैं आतंकी हूँ…!!!

भगवा वो जो मेरे रोम रोम में बसा है… भगवा वो जो वीरता का प्रतीक है… भगवा वो जो अग्नि का प्रतीक है… भगवा वो जो तेज का प्रतीक है… भगवा वो जो साधू संतों का प्रतीक है …भगवा वो जो शौर्य का प्रतीक है…भगवा वो जो ओज का प्रतीक है… भगवा वो जो सूर्य का प्रतीक है …भगवा वो जो त्याग का प्रतीक है… भगवा वो जो उगते सूरज का प्रतीक है…भगवा वो जो शान का प्रतीक है…भगवा जो मेरा बसंती चोला है…भगवा वो जिसके लिए शहीदों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर किया…भगवा वो जो मेरे तिरंगे में समाया है…भगवा कुछ खास लोगों की ना तो बपौती है और ना ही चिदम्बरम सरीखे लोगों की बेवकूफी …मेरा भगवा राम वाला है …मेरा भगवा कृष्ण वाला है…मेरा भगवा राणा प्रताप वाला है…मेरा भगवा शिवा वाला है…मेरा भगवा दयानंदी है…मेरा भगवा विवेकानान्दी है …मेरा भगवा किसी का विरोधी नहीं है…मेरा भगवा तो जग का भगवा है…जो हर कण में समाया है…मेरा भगवा तो मीरा वाला भगवा है…मेरा भगवा तो आन-बान-शान का रखवाला है…मेरा भगवा मेरी अस्मिता का रक्षक है…मेरा भगवा मेरा स्वाभिमान है…मेरा भगवा मेरी मां बहन की लाज है…मेरा भगवा संस्कृति है, परंपरा है, धरोहर है…मेरा भगवा मेरा हवन ह…

कलियां भी आने दो

रतनकांटे हैं दामन में मेरे
कुछ कलियां भी आने दो
मुझसे ऐसी रंजिश क्यों है
रंगरलियां भी आने दोसूखे पेड़ मुझे क्यों देते
जिनसे कोई आस नहीं
कम दो पर हरियाला पत्ता
और डलियां भी आने दोतेरी खातिर भटका हूं मैं
अब तक संगी राहों पर
जीवन के कुछ ही पल तुम
अपनी गलियां भी आने दो

तस्वीर मेरी देखना

रतनएक दिन होगा बुलंद
तकदीर मेरी देखना
सारे जग में फैलेगी
तासीर मेरी देखनाकिस तरह मैंने किया है
दम निकलते वक्त याद
थी जो हाथों में पड़ी
जंजीर मेरी देखनातुम न मानो मेरा तन-मन
धन तुम्हारे नाम है
छोड़ कर हूं जा रहा
जागीर मेरी देखनाइस जहां में तो नहीं
पर उस जगह मिल जाएंगे
जो बुना है ख्वाब की
ताबीर मेरी देखना आज मुझसे दूर हो
इक वक्त आएगा रतन
जब गुजर जाएंगे हम
तस्वीर मेरी देखना

बिछाए बैठे हैं

रतन
आएंगे वो जिस रस्ते से
पलक बिछाए बैठे हैं
मैं क्या तकता राह, शजर भी
फूल खिलाए बैठे हैं

मुद्दत हो गई मिलकर बिछड़े
माजी को करता हूं याद
दिल के ख़ाली पन्नों पर
तस्वीर लगाए बैठे हैं

मौला मेरे भगवन मेरे
दिलबर तुम दिलदार भी तुम
इक दिन मिलना होगा यह
उम्मीद लगाए बैठे हैं

बारिश आई बूंदें लाई
आया यादों का मौसम
देखो फिर बरसा सावन
हम झूला लगाए बैठे हैं

जब वो सपनों में आते हैं
आकर बहुत सताते हैं
है यह भी मंजूर हमें
क्यों दर्द चुराए बैठे हैं

मिल नहीं सकता उनसे मैं अब
पर क्यों ऐसा लगता है
कल ही अपनी बात हुई है
दिल उलझाए बैठे हैं

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