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क्योंकि थोड़ा सा मैं भी जीना चाहती हूं

(माइक्रो-स्टोरी) “तू है कौन?” “जिंदगी” “तो यहां क्या कर रही है।?“ “तुम्हारे साथ हूं?” “क्यों?” “क्योंकि थोड़ा सा मैं भी जीना चाहती हूं।”

तुम खुद मिटती हो और खुद बनती हो

समुद्र के छोर पर खड़े होकर लहरों के उफानों को देखता हूं हर लहर तुझे एक आकार देते हुये मचलती है, तू ढलती है कई रंगों में दूर छोर पर वर्षा से भरे काले बादलों की तरह तू लहराती है, और बादलों का उमड़ता घुमड़ता आकार समुंद्र में दौड़ने लगता है और उसकी छाया मेरी आंखों में आकार लेती है, उल्टे रूप से विज्ञान के किसी सिद्दांत को सच करते हुये, तू मेरी आंखों में उतरती है फिर समुंदर और आकाश में अपना शक्ल देखकर कहीं गुम हो जाती है। ट्राय की हेलना में मैं तुम्हें टटोलता हूं, तू छिटक जाती है जमीन पर दौड़ते, नाचते लट्टू की तरह, फिर लुढ़क जाती है निढाल होकर तेरे चेहरे पर झलक आये पसीने की बूंदों को मैं देखता हूं इन छोटी-छोटी बूंदों में तू चमकती है, छलकती है इन बूंदों के सूखने के साथ, तुम्हारी दौड़ती हुई सांसे थमती है ढक देती हैं समुंदर की लहरें तेरे चेहरे को, तू खुद मिटती है और खुद बनती है। मैं तो बस देखता हूं तुझे मिटते और बनते हुये। गहरी नींद तुझे अपनी आगोश में भर लेती है और तू सपना बनकर मेरी जागती आंखों में उतरती है ऊब-डूब करती, सुलझती-उलझती, आकृतियों में ढलती पूरे कैनवास को तू ढक लेती है, व्यर्थ कविता...

---क्योंकि मुझे अमरत्व में यकीन है

सिगरेट की धुयें की तरह तेरे दिल को टटोल कर तेरे होठों से मैं बाहर निकलता हूं, हवायें अपने इशारों से मुझे उड़ा ले जाती है। तुम देखती हो नीले आसमान की ओर मैं देखता हूं तुम्हे आवारा ख्यालों में गुम होते हुये। तुम सिगरेट की टूटी को जमीन पर फेंककर रौंदती हो, और मैं बादलों में लिपटकर मु्स्कराता हूं। मुझे यकीन है, तमाम आवारगी के बाद इन बादलों में बूंद बनकर फिर आऊँगा और भींगने की चाहत तुझे भी खींच लाएगी डेहरी के बाहर। हर बूंद तेरे रोम-रोम को छूते हुये निकल जाएगी, धरती पर पहुंचने के पहले ही तेरी खुश्बू मेरी सांसों में ढल जाएगी मैं बार-बार आऊंगा, रूप बदलकर -------क्योंकि मुझे अमरत्व में यकीन है।

एनिमेशन की बारिकियों को बताया जा रहा है

मुंबई के पवई स्थित रेसीडेंस कन्वेनशन सेंटर में कल सुबह से ही लोग जुटे हुये हैं। एनिमेशन की दुनिया को नजदीक से समझने और जानने की ललक उन्हें यहां खींच लाई है। इसमें एनिमेशन जगत से जुड़ी कंपनियों के साथ-साथ कई शैक्षणिक संस्थाओं ने शिरकत किया है। विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से एनिमेशन, जगत की बारीक जानकारी दी जा रही है। एक एनिमेशन फिल्म कैसे बनता है, उसको बनाने की प्रक्रिया क्या है, चरित्रों को कैसे आकार दिया जाता है, और कैसे उनमें रंग भरे जाते हैं, उनकी लोच और गति कैसे निर्धारित की जाती है आदि को बहुत ही सरल तरीके से समझाया जा रहा है। मेले में युवा छात्र-छात्राओं की भीड़ हैं। एनिमेशन की दुनिया को समझने के लिये युवाओं का झूंड लगभग सभी स्टालों पर नजर आ रहा है। हंसते-चहलकते हुये लोग एनिमेशन की बारिकियों को सीख रहे हैं। एनिमेशन से संबंधित कई विषयों पर सेमिनार का भी आयोजन चल रहा है।विभिन्न तरह के शैक्षणिक संस्थायें युवाओं को एनिमेशन तकनीक के प्रति आकर्षित करने के लिए अपना-अपना स्टाल लगाये हुये हैं, जैसे डिजिटल एशिया स्कूल आफ एनिमेशन, एफ एक्स स्कूल, जी इंस्टीट्यूट आफ क्रिएटिव आर्ट, सीआरईए स्क...

भाजपा का सत्यानाश तो होना ही था

लाख टके की सवाल है कि भाजपा हारी क्यों। अगले पांच साल तक भाजपा को लगातार इस प्रश्न को मथना होगा। त्वरित प्रतिक्रिया में टीवी वाले भाजपा की हार बजाय कांग्रेस की जीत को महत्व देते हुये राहुल गांधी को हीरो बनाने पर तुले हुये हैं, और यह स्वाभाविक भी है। टीवी वालों को परोसने के लिए खुराक चाहिये। भाजपा के नीति निर्धारण में शामिल लोगों को अपनी खोपड़ी को ठंडा करके इस हार के कारणों की पड़ताल करनी होगी। भाजपा की हार का प्रमुख कारण है भाजपा की पहचान का गुम होना। पूरे चुनाव में भाजपा शब्द कहीं सुनाई ही नहीं दिया। भाजपा की एक पृथक पहचान हुआ करती थी, जो गठबंधन में पूरी तरह से गुम हो गई थी। अब जब पार्टी की पहचान ही गुम हो जाये तो जीतने का सवाल ही कहां पैदा होता है। एक तरफ देश में जहां भाजपा की पहचान गुम हुई वहीं दूसरी तरफ देश के मुसलमान भाजपा को नहीं भूले थे। प्रत्येक मतदान क्षेत्र में वे लोग भाजपा के खिलाफ सक्रिय नकारात्मक मतदाता की भूमिका में नजर आये। भाजपा के खिलाफ तो उन्हें वोट करना ही था। साथ ही उन्होंने यह भी देखा कि किसी एसे व्यक्ति को उनका वोट न मिले जो जीतने के बाद भाजपा के खेमे में चला जाये...

पुरुख के भाग

‘हे दू नम्मर! अब का ताकते हो? जाओ. तुमको तो मालुमे है कि तुम्हरा नाम किलियर नईं हुआ. भेटिंगे में रह गया है.’ दो नंबर ने कहा कुछ नहीं. बस उस दफ्तर के चपरासी को पूरे ग़ुस्से से भरकर ताका. इस बात का पूरा प्रयास करते हुए कि कहीं उसे ऐसा न लग जाए कि वो उसे हड़काने की कोशिश कर रहे हैं, पर साथ ही इस बात का पूरा ख़याल भी रखा कि वह हड़क भी जाए. आंखों ही आंखों के इशारे से उन्होंने समझाना चाहा कि अबे घोंचू, बड़ा स्मार्ट बन रहा है अब. इसी दफ्तर में एक दिन मुझे देख कर तेरी घिग्घी बंध जाती थी. अब तू मुझे वेटिंग लिस्ट समझा रहा है और अगर कहीं उसमें मेरा नाम क्लियर हो गया होता तो आज तू दो हज़ार बार मेरे कमरे के कोने-अंतरे में पोंछा मारने आता कि कहीं से मेरी नज़र तेरे ऊपर पड़ जाए. ऐसा उन्होंने सोचा, लेकिन कहा नहीं. वैसे सच तो ये है कि यही उनकी ख़ासियत भी है. वो जो सोचते हैं कभी कहते नहीं और जो कहते हैं वो तो क्या उसके आसपास की बातें भी कभी सोचते नहीं हैं. वो वही दिखने की कोशिश करते हैं जो हैं नहीं और जो हैं उसे छिपाने में ही पूरी ऊर्जा गंवा देते हैं. ये बात बहुत दिनों तक उस दफ्तर में रहे होने के नाते उस चपरासी क...

नेता और चेतना

हमारे देश में चीज़ों के साथ मौसमों और मौसमों के साथ जुड़े कुछ धंधों का बड़ा घालमेल है. इससे भी ज़्यादा घालमेल कुछ ख़ास मौसमों के साथ जुड़ी कुछ ख़ास रस्मों का है. मसलन अब देखिए न! बसंत और ग्रीष्म के बीच आने वाला जो ये कुछ-कुछ नामालूम सा मौसम है, ये ऐसा मौसम होता है जब दिन में बेहिसाब तपिश होती है, शाम को चिपचिपाहट, रात में उमस और भोर में ठंड भी लगने लगती है. आंधी तो क़रीब-क़रीब अकसर ही आ जाती है और जब-तब बरसात भी हो जाती है. मौसम इतने रंग बदलता है इन दिनों में कि भारतीय राजनीति भी शर्मसार हो जाए. अब समझ में आया कि चुनाव कराने के लिए यही दिन अकसर क्यों चुने जाते हैं. मौसम भी अनुकूल, हालात भी अनुकूल और चरित्र भी अनुकूल. तीनों अनुकूलताएं मिल कर जैसी यूनिफॉर्मिटी का निर्माण करती हैं, नेताजी लोगों के लिए यह बहुत प्रेरक होता है. मुश्किल ये है कि ग्लोबीकरण के इस दौर में चीज़ों का पब्लिकीकरण भी बड़ी तेज़ी से हो रहा है. इतनी तेज़ी से कि लोग ख़ुद भी निजी यानी अपने नहीं रह गए हैं. और भारतीय राजनेताओं का तो आप जानते ही हैं, स्विस बैंकों में पड़े धन को छोड़कर बाक़ी इनका कुछ भी निजी नहीं है. सों कलाएं भी इनकी निजी नह...

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