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अशआर

सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहॉ जिंदगी ग़र कुछ रही तो नौजवानी फिर कहॉ. इस्माइल मेरठी

गीतों से

हम नए हैं नए थे भी नए आगे भी रहेंगे यह हमारा गीत होना सुनो समयातीत होना है बन सदाशिव जहर से अमृत बिलोना है कल दहे थे दह रहे हैं कंठ आगे भी दहेंगे हम नए हैं नए थे भी नए आगे भी रहेंगे कुमार रवीन्द्र

अशआर

अब यकीनन ठोस है धरती हकीकत की तरह ये हकीकत देख लेकिन खौफ के मारे न देख. रक्त वर्षों से नसों में खौलता है, आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है. दुष्यंत कुमार

चुप रहिए

देख रहे हैं जो भी, किसी से मत कहिए, मौसम ठीक नहीं है, आजकल चुप रहिए. फुलवारी में फूलों से भी ज्यादा साँपों के पहरे हैं, रंगों के शौक़ीन आजकल जलते जंगल में ठहरे हैं. जिनके लिए समंदर छोड़ा वे बदल भी काम न आए, नई सुबह का वादा करके लोग अंधेरों तक ले आए. भूलो यह भी दर्द चलो कुछ और जिएँ, जाने कब रूक जाएँ जिंदगी के पहिए. रमानाथ अवस्थी

अशआर

अपना कशकोल छिपा लो तो सभी हातिम हैं वरना हर शख्स भिखारी है, जिधर जाओगे. मैदां की हार-जीत तो किस्मत की बात है टूटी है किसके हाथ में तलवार देखना. हरेक आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी जिसको भी देखना, कई बार देखना.

बेचारे प्रधानमंत्री और मजबूर जनता

भारत के प्रधानमंत्री डॉ॰ मनमोहन सिंह ने उद्योगपतियों की बैठक में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर गहरी चिंताएँ जताई हैं. सबसे ज्यादा चिन्ता उन्होने इस समय की सबसे मौजू समस्या महंगाई पर जताई है. उद्योगपतियों से उन्होने अपेक्षा की है कि वे काकस बाना कर चीजों के दाम न बढ़ाएं. आर्थिक विकास का लाभ देश के आम आदमी को मिले, इसके लिए उन्होने भारतीय उद्योग जगत के सामने एक दस सूत्रीय एजेंडा भी रखा है. इस एजेंडे में वंचित वर्गों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को रोजगार के अधिक अवसर देना, प्रतिभाशाली युवाओं को स्काँलरशिप देना आदि बातें शामिल हैं. भारतीय उद्योग परिसंघ की बैठक में उन्होने उद्योगपतियों को यह उपदेश भी दिया है कि वे अपनी शान बघारने के लिए अपने वैभव का भोंडा प्रदर्शन न करें. डॉ॰ सिंह ने यह जो बातें कही हैं, इनसे किसी को असहमति नहीं हो सकती है. रोजगार के अवसर वंचित वर्गों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को ही नहीं, समाज के सभी वर्गों को मिलने चाहिए. आख़िर रोजगार के अवसरों की जरूरत किसे नहीं है? बिना रोजगार के तो किसी का जीवन चल नहीं सकता है! प्रतिभाशाली युवाओं को स्कालरशिप दिए जाने की बात भी सही है. इस बात से ...

कुनबे की महिमा का सच

यह तो आप जानते ही हैं कि परमपूज्या राजमाता और माननीय श्रीमंत राजकुमार के मुँह बहुत कम ही खुल पाते हैं. बमुश्किल कभी-कभी ही. सिर्फ तब जब बहुत जरूरी हो जाता है. तब वह इस गरीब देश की दरिद्र जनता पर यह महती कृपा करते हैं. इसीलिए वे जब भी बोलते हैं पूरे देश की हिंदी और अंग्रेजी प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया उनके बयान को लोकने के लिए ऐसे टूटती है जैसे सिद्ध संतों द्वारा फेंके गए प्रसाद को लोकने के लिए उनके भक्त टूटते हैं. ऐसा लगता है जैसे इस दुनिया में अब इसके अलावा कोई और परमसत्य बचा ही ना हो. हाल ही में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान राजकुमार का मुँह एक बार खुला था और तब जहाँ एक तरफ तमाम कांग्रेसी कृतकृत्य हो गए थे वहीं देश-दुनिया के इतिहास की थोड़ी सी भी समझ रखने वाला हर शख्स एक दुखद आश्चर्य से भर उठा था. सबने एक सिरे से यही सोचा कि राजकुमार ने यह क्या कह दिया. अपने को जानकर मानाने वाले कुछ लेखकों-पत्रकारों-राजनेताओं ने तो थोड़ी हाय-तौबा मचाने की रस्म अदायगी भी की. पर अब वह बयान केवल राजकुमार तक सीमित नहीं रह गया है. परमपूज्या राजमाता ने भी राजकुमार के सुर से सुर मिला दिया है. राज...

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