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Showing posts from May, 2009

क्योंकि थोड़ा सा मैं भी जीना चाहती हूं

(माइक्रो-स्टोरी)
“तू है कौन?”
“जिंदगी”
“तो यहां क्या कर रही है।?“
“तुम्हारे साथ हूं?”
“क्यों?”
“क्योंकि थोड़ा सा मैं भी जीना चाहती हूं।”

तुम खुद मिटती हो और खुद बनती हो

समुद्र के छोर पर खड़े होकर लहरों के उफानों को देखता हूं
हर लहर तुझे एक आकार देते हुये मचलती है, तू ढलती है कई रंगों में
दूर छोर पर वर्षा से भरे काले बादलों की तरह तू लहराती है,
और बादलों का उमड़ता घुमड़ता आकार समुंद्र में दौड़ने लगता है
और उसकी छाया मेरी आंखों में आकार लेती है, उल्टे रूप से
विज्ञान के किसी सिद्दांत को सच करते हुये, तू मेरी आंखों में उतरती है
फिर समुंदर और आकाश में अपना शक्ल देखकर कहीं गुम हो जाती है।


ट्राय की हेलना में मैं तुम्हें टटोलता हूं, तू छिटक जाती है
जमीन पर दौड़ते, नाचते लट्टू की तरह, फिर लुढ़क जाती है निढाल होकर
तेरे चेहरे पर झलक आये पसीने की बूंदों को मैं देखता हूं
इन छोटी-छोटी बूंदों में तू चमकती है, छलकती है
इन बूंदों के सूखने के साथ, तुम्हारी दौड़ती हुई सांसे थमती है
ढक देती हैं समुंदर की लहरें तेरे चेहरे को, तू खुद मिटती है और खुद बनती है।
मैं तो बस देखता हूं तुझे मिटते और बनते हुये।

गहरी नींद तुझे अपनी आगोश में भर लेती है
और तू सपना बनकर मेरी जागती आंखों में उतरती है
ऊब-डूब करती, सुलझती-उलझती, आकृतियों में ढलती
पूरे कैनवास को तू ढक लेती है, व्यर्थ कविता की तरह
और अपने द…

---क्योंकि मुझे अमरत्व में यकीन है

सिगरेट की धुयें की तरह
तेरे दिल को टटोल कर
तेरे होठों से मैं बाहर निकलता हूं,
हवायें अपने इशारों से मुझे उड़ा ले जाती है।

तुम देखती हो नीले आसमान की ओर
मैं देखता हूं तुम्हे आवारा ख्यालों में गुम होते हुये।

तुम सिगरेट की टूटी को
जमीन पर फेंककर रौंदती हो,
और मैं बादलों में लिपटकर मु्स्कराता हूं।

मुझे यकीन है, तमाम आवारगी के बाद
इन बादलों में बूंद बनकर फिर आऊँगा
और भींगने की चाहत
तुझे भी खींच लाएगी डेहरी के बाहर।

हर बूंद तेरे रोम-रोम को छूते
हुये निकल जाएगी,
धरती पर पहुंचने के पहले ही
तेरी खुश्बू मेरी सांसों में ढल जाएगी

मैं बार-बार आऊंगा, रूप बदलकर
-------क्योंकि मुझे अमरत्व में यकीन है।

एनिमेशन की बारिकियों को बताया जा रहा है

मुंबई के पवई स्थित रेसीडेंस कन्वेनशन सेंटर में कल सुबह से ही लोग जुटे हुये हैं। एनिमेशन की दुनिया को नजदीक से समझने और जानने की ललक उन्हें यहां खींच लाई है। इसमें एनिमेशन जगत से जुड़ी कंपनियों के साथ-साथ कई शैक्षणिक संस्थाओं ने शिरकत किया है। विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से एनिमेशन, जगत की बारीक जानकारी दी जा रही है। एक एनिमेशन फिल्म कैसे बनता है, उसको बनाने की प्रक्रिया क्या है, चरित्रों को कैसे आकार दिया जाता है, और कैसे उनमें रंग भरे जाते हैं, उनकी लोच और गति कैसे निर्धारित की जाती है आदि को बहुत ही सरल तरीके से समझाया जा रहा है।
मेले में युवा छात्र-छात्राओं की भीड़ हैं। एनिमेशन की दुनिया को समझने के लिये युवाओं का झूंड लगभग सभी स्टालों पर नजर आ रहा है। हंसते-चहलकते हुये लोग एनिमेशन की बारिकियों को सीख रहे हैं। एनिमेशन से संबंधित कई विषयों पर सेमिनार का भी आयोजन चल रहा है।विभिन्न तरह के शैक्षणिक संस्थायें युवाओं को एनिमेशन तकनीक के प्रति आकर्षित करने के लिए अपना-अपना स्टाल लगाये हुये हैं, जैसे डिजिटल एशिया स्कूल आफ एनिमेशन, एफ एक्स स्कूल, जी इंस्टीट्यूट आफ क्रिएटिव आर्ट, सीआरईए स्…

भाजपा का सत्यानाश तो होना ही था

लाख टके की सवाल है कि भाजपा हारी क्यों। अगले पांच साल तक भाजपा को लगातार इस प्रश्न को मथना होगा। त्वरित प्रतिक्रिया में टीवी वाले भाजपा की हार बजाय कांग्रेस की जीत को महत्व देते हुये राहुल गांधी को हीरो बनाने पर तुले हुये हैं, और यह स्वाभाविक भी है। टीवी वालों को परोसने के लिए खुराक चाहिये। भाजपा के नीति निर्धारण में शामिल लोगों को अपनी खोपड़ी को ठंडा करके इस हार के कारणों की पड़ताल करनी होगी।
भाजपा की हार का प्रमुख कारण है भाजपा की पहचान का गुम होना। पूरे चुनाव में भाजपा शब्द कहीं सुनाई ही नहीं दिया। भाजपा की एक पृथक पहचान हुआ करती थी, जो गठबंधन में पूरी तरह से गुम हो गई थी। अब जब पार्टी की पहचान ही गुम हो जाये तो जीतने का सवाल ही कहां पैदा होता है।
एक तरफ देश में जहां भाजपा की पहचान गुम हुई वहीं दूसरी तरफ देश के मुसलमान भाजपा को नहीं भूले थे। प्रत्येक मतदान क्षेत्र में वे लोग भाजपा के खिलाफ सक्रिय नकारात्मक मतदाता की भूमिका में नजर आये। भाजपा के खिलाफ तो उन्हें वोट करना ही था। साथ ही उन्होंने यह भी देखा कि किसी एसे व्यक्ति को उनका वोट न मिले जो जीतने के बाद भाजपा के खेमे में चला जाये।…

पुरुख के भाग

‘हे दू नम्मर! अब का ताकते हो? जाओ. तुमको तो मालुमे है कि तुम्हरा नाम किलियर नईं हुआ. भेटिंगे में रह गया है.’
दो नंबर ने कहा कुछ नहीं. बस उस दफ्तर के चपरासी को पूरे ग़ुस्से से भरकर ताका. इस बात का पूरा प्रयास करते हुए कि कहीं उसे ऐसा न लग जाए कि वो उसे हड़काने की कोशिश कर रहे हैं, पर साथ ही इस बात का पूरा ख़याल भी रखा कि वह हड़क भी जाए. आंखों ही आंखों के इशारे से उन्होंने समझाना चाहा कि अबे घोंचू, बड़ा स्मार्ट बन रहा है अब. इसी दफ्तर में एक दिन मुझे देख कर तेरी घिग्घी बंध जाती थी. अब तू मुझे वेटिंग लिस्ट समझा रहा है और अगर कहीं उसमें मेरा नाम क्लियर हो गया होता तो आज तू दो हज़ार बार मेरे कमरे के कोने-अंतरे में पोंछा मारने आता कि कहीं से मेरी नज़र तेरे ऊपर पड़ जाए. ऐसा उन्होंने सोचा, लेकिन कहा नहीं. वैसे सच तो ये है कि यही उनकी ख़ासियत भी है. वो जो सोचते हैं कभी कहते नहीं और जो कहते हैं वो तो क्या उसके आसपास की बातें भी कभी सोचते नहीं हैं. वो वही दिखने की कोशिश करते हैं जो हैं नहीं और जो हैं उसे छिपाने में ही पूरी ऊर्जा गंवा देते हैं. ये बात बहुत दिनों तक उस दफ्तर में रहे होने के नाते उस चपरासी क…

नेता और चेतना

हमारे देश में चीज़ों के साथ मौसमों और मौसमों के साथ जुड़े कुछ धंधों का बड़ा घालमेल है. इससे भी ज़्यादा घालमेल कुछ ख़ास मौसमों के साथ जुड़ी कुछ ख़ास रस्मों का है. मसलन अब देखिए न! बसंत और ग्रीष्म के बीच आने वाला जो ये कुछ-कुछ नामालूम सा मौसम है, ये ऐसा मौसम होता है जब दिन में बेहिसाब तपिश होती है, शाम को चिपचिपाहट, रात में उमस और भोर में ठंड भी लगने लगती है. आंधी तो क़रीब-क़रीब अकसर ही आ जाती है और जब-तब बरसात भी हो जाती है. मौसम इतने रंग बदलता है इन दिनों में कि भारतीय राजनीति भी शर्मसार हो जाए. अब समझ में आया कि चुनाव कराने के लिए यही दिन अकसर क्यों चुने जाते हैं. मौसम भी अनुकूल, हालात भी अनुकूल और चरित्र भी अनुकूल. तीनों अनुकूलताएं मिल कर जैसी यूनिफॉर्मिटी का निर्माण करती हैं, नेताजी लोगों के लिए यह बहुत प्रेरक होता है.

मुश्किल ये है कि ग्लोबीकरण के इस दौर में चीज़ों का पब्लिकीकरण भी बड़ी तेज़ी से हो रहा है. इतनी तेज़ी से कि लोग ख़ुद भी निजी यानी अपने नहीं रह गए हैं. और भारतीय राजनेताओं का तो आप जानते ही हैं, स्विस बैंकों में पड़े धन को छोड़कर बाक़ी इनका कुछ भी निजी नहीं है. सों कलाएं भी इनकी निजी न…

मुंबई में एनीमेशन पर महामेला अगले हफ़्ते

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29 और 30 मई को इसका आयोजन दिल्ली में रामदा प्लाजा होटल में किया जाएगा एनिमेशन, वीएफएक्स (विजुअल इफेक्ट्स) और गेमिंग पर भारत का सबसे बड़ा मेला सीजीटीईएक्पो (कंप्युटर ग्राफिक्स टेक्नोलाजी) 09 का आयोजन मुंबई के पोवई स्थित रेसिडेंस होटल और कन्वेंशन सेंटर में 23 और 24 मई को होने जा रहा है। इस आयोजन के साथ ही सीजीटीईएक्पो अपने दूसरे वर्ष में प्रवेश कर रहा है। इस मेले में कंप्युटर ग्राफिक्स से संबंधित तकनीक और व्यवसाय के विभिन्न पहलुओं का प्रदर्शन किया जाएगा। साथ ही एनिमेशन उद्योग में कैरियर की तलाश करने वाले छात्रों को भी यहां उचित मार्गदर्शन प्रदान किया जाएगा।
सीजीटीईएक्पो 09 का आयोजन एनिमेशन, वीएफएक्स और गेमिंग पर भारत के सबसे बड़े कम्युनिटी पोर्टल सीजीटी तंत्रा द्वारा नाइन इंटरएक्टिव के तहत प्रबंधित विजुअल इफेक्ट्स एंड डिजिटल एशिया स्कूल आफ एनिमेशन के साथ मिलकर किया जा रहा है। इस मेले में एनिमेशन उद्योग को समग्र रूप से प्रस्तुत करने के लिए जाब फेयर,आर्ट गैलेरीज, मार्केट प्लेस, मास्टर क्लासेस, एडुकेशन फेयर, इंटरटेनमेंट और गेमिंग जोन, छात्र प्रतियोगिता, एक्सपो स्टेज प्रदर्शनी आदि का आयोजन…

जॉर्ज़ ओरवेल, संसद और वाराह पुराण

एक ब्लॉगर बंधु हैं अशोक पांडे जी. उन्हें सुअरों से बेइंतहां प्यार हो गया है. इधर कुछ दिनों से वह लगातार सुअरों के पीछे ही पड़े हुए हैं. हुआ यह कि पहले तो उन्होंने अफगानिस्तान में मौजूद इकलौते सुअर की व्यथा कथा कही. यह बताया कि वहां सुअर नहीं पाए जाते और इसकी एक बड़ी वजह वहां तालिबानी शासन का होना रहा है. इसके बावजूद किसी ज़माने सोवियत संघ से बतौर उपहार एक सुअर वहां आ गया था. उस बेचारे को जगह मिली चिड़ियाघर में. पर इधर जबसे अमेरिका में स्वाइन फ्लू नामक बीमारी फैली है, उसे चिड़ियाघर के उस बाड़े से भी हटा दिया गया है, जहां वह कुछ अन्य जंतुओं के साथ रहता आया था. अब उस बेचारे को बिलकुल एक किनारे कर दिया गया है, एकदम अकेले. जैसे हमारे देश में रिटायर होने के बाद ईमानदार टाइप के सरकारी अफसरों को कर दिया जाता है.
कायदे से देखा जाए तो दोनों के अलग किए जाने का कारण भी समान ही है. संक्रमण का. अगर उसके फ्लू का संक्रमण साथ वाले दूसरे जानवरों को हो गया तो इससे चिड़ियाघर की व्यवस्था में कितनी गड़बड़ी फैलेगी इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं. ठीक इसी तरह सरकारी अफसरी के दौरान भी ईमानदारी के रोग से ग्रस्त रहे व्यक्ति…

युवराज का संस्कार

महाराज का तो जो भी कुछ होना-जाना था, सो सब बीत-बिता गया. वह ज़माना और था. अब की तरह तब न तो नमकहराम जनता थी और न यह लोकतंत्र का टोटका ही आया था. अरे बाप राजगद्दी पर बैठा था, मां राजगद्दी पर बैठी थी, पुश्त दर पुश्त लोग राजगद्दी पर ही बैठते चले आए थे, तो वह कहां बैठते! यह भी कोई सोचने-समझने या करने लायक बात हुई? जिसका पूरा ख़ानदान राजगद्दी पर ही बैठता चला आया हो तो वह अब चटाई पर थोड़े बैठेगा! ज़ाहिर है, उसको भी बैठने के लिए राजगद्दी ही चाहिए. दूसरी किसी जगह उसकी तशरीफ़ भला टिकेगी भी कैसे? लेकिन इस नसूढ़े लोकतंत्र का क्या करें? और उससे भी ज़्यादा बड़ी मुसीबत तो है जनता. आख़िर उस जनता का क्या करें? कई बार तो महारानी का मन ये हुआ कि इस पूरी जनता को सड़क पर बिछवा के उसके सीने पर बुल्डोजर चलवा दें. जबसे लोकतंत्र नाम की चिड़िया ने इस इलाके में अपने पंख फड़फड़ाए हैं, जीना हराम हो गया. और तो और, जनता नाम की जो ये नामुराद शै है, इसका कोई ईमान-धरम भी नहीं है. आज इसके साथ तो कल उसके साथ. ज़रा सा शासन में किसी तरह की कोताही क्या हुई, इनकी भृकुटी तन जाती है. इसकी नज़र भी इतनी कोताह है कि क्या कहें! जो कुछ भी हो र…

अक़्ल और पगड़ी

हाज़िरजवाबी का तो मुल्ला नसरुद्दीन से बिलकुल वैसा ही रिश्ता समझा जाता है जैसा मिठाई का शक्कर से. आप कुछ कहें और मुल्ला उसके बदले कुछ भी करें, मुल्ला के पास अपने हर एक्शन के लिए मजबूत तर्क होता था. एक दिन एक अनपढ़ आदमी उनके पास पहुंचा. उसके हाथ में एक चिट्ठी थी, जो उसे थोड़ी ही देर पहले मिली थी. उसने ग़ुजारिश की, ‘मुल्ला जी, मेहरबानी करके ये चिट्ठी मेरे लिए पढ़ दें.’
मुल्ला ने चिट्ठी पढऩे की कोशिश की, पर लिखावट कुछ ऐसी थी कि उसमें से एक शब्द भी मुल्ला पढ़ नहीं सके. लिहाज़ा पत्र वापस लौटाते हुए उन्होंने कहा, 'भाई माफ़ करना, पर मैं इसे पढ़ नहीं सकता.’
उस आदमी ने चिट्ठी मुल्ला से वापस ले ली और बहुत ग़ुस्से में घूरते हुए बोला, 'तुम्हें शर्म आनी चाहिए मुल्ला, ख़ास तौर से ये पगड़ी बांधने के लिए.’ दरअसल पगड़ी उन दिनों सुशिक्षित होने का सबूत मानी जाती थी.
'ऐसी बात है! तो ये लो, अब इसे तुम्हीं पहनो और पढ़ लो अपनी चिट्ठी.’ मुल्ला ने अपनी पगड़ी उस आदमी के सिर पर रखते हुए कहा, 'अगर पगड़ी बांधने से विद्वत्ता आ जाती हो, फिर तो अब तुम पढ़ ही सकते हो अपनी चिटठी.’

ओडिपस की वाट लगा दी है फ्रायड ने

अपने सिद्धांतों को रखने के लिए फ्रायड ने एक मिथिकल चरित्र ओडिपस की वाट लगा दी है। साइको एनालिसिस के तहत उसने एक नया शब्द दिया है-ओडिपस कंप्लेक्स। ओडिपस कंप्लेक्स का सार यह है कि एक बच्चा विपरित लिंगी होने के कारण अपनी मां के प्रति सेक्सुअली एट्रेक्ट होता है। फ्रायड की इस खोज में कितना दम है इसको लेकर भले ही बहस किया जाये, लेकिन बच्चे की इस मनोवृति के लिए ओडिपस कांप्लेक्स शब्द का इस्तेमाल ओडिपस की व्यथा कथा को गलत तरीके से दुनिया के सामने प्रस्तुत करना है। जिस बच्चे ने अपनी मां को देखा तक नहीं उसके मन में किसी भी तरह की भावना कैसे जागृत होगी ?
ओडिपस के जन्म के समय ही यह भविष्यवाणी की गई कि बड़ा होकर यह बच्चा अपनी पिता की हत्या करेगा और मां से शादी करेगा। इस घटना को रोकने के लिए उसके पिता ने उसे तत्काल मार डालने का इंतजाम किया, लेकिन जिस व्यक्ति को मारने का काम सौंपा गया उसने उसे जिंदा छोड़ दिया और ओडिपस दूसरे के घर में पला-बड़ा,किसी और को अपना माता-पिता समझते हुये। अब बड़ा होने तक जिस बच्चे ने अपने मां की शक्ल तक नहीं देखी उसके मन में मां के प्रति आकर्षण,वह भी सेक्सुअली, कैसे आ सकता है…

यात्रा बनाम परिक्रमा

पों......... की ध्वनि के साथ जैसे ही ट्रेन ने एंट्री मारी प्लैटफॉर्म पर मौजूद अनारक्षित श्रेणी से लेकर वातानुकूलित शयनयान प्रथम श्रेणी तक के सभी यात्री अपने-अपने सरो-सामान समेटते हुए एक साथ लपके. ऐसे जैसे राहत सामग्री से भरे ट्रक की ओर किसी आपदापीड़ित इलाके के ग्रामीण दौड़ते हैं. जो लोग बार-बार एलीट क्लास की आभिजात्यता पर ऐसे-तैसे कमेंट करते रहते हैं, उन्हें अगर यह मंज़र दिखा दिया जाता तो निश्चित रूप से उनकी बोलती हमेशा के लिए वैसे ही बन्द हो जाती जैसे कभी-कभी टीवी चैनलों वाले रियलिटी शो के काबिल जजों की डांट से बाल प्रतिभागियों की हो जाती है. सोच और स्पिरिट की ऐसी सामूहिक समानता और धक्का-मुक्की सहने की ऐसी भयावह क्षमता चुनाव के दिनों में मलिन बस्तियों के दौरे करने वाले राजनेताओं में भी नहीं देखी जाती.

इसी धक्का-मुक्की में जैसे-तैसे मैंने भी एएस-3 नामक कोच को लक्षित कर लिया और दोनों कन्धों पर दो एयरबैग तथा बाएं हाथ में भारी-भरकम सूटकेस उठाए अपनी ताक़त भर तेज़ रफ्तार से दौड़ा. वैसे मेरी बेहतरार्ध भी कुछ कम नहीं हैं. सौंदर्य प्रसाधनों से ठुंसे अपने निजी बैग के अलावा एक स्ट्रॉली भी वह खींचती हु…

डर के बिना कुछ न करेंगे जी...!

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इलाहाबाद में आजकल पब्लिक स्कूलों में बढ़ी हुई फीस के ख़िलाफ अभिभावक सड़कों पर उतर आए हैं। वकील, पत्रकार, व्यापारी, सरकारी कर्मचारी आदि सभी इस भारी फीस वृद्धि से उत्तेजित हैं। रोषपूर्ण प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। इसे लेकर कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने लगी तो जिलाधिकारी को स्कूल प्रबन्धकों के साथ समझौता वार्ता करनी पड़ी है। नतीजा चाहे जो रहे लेकिन इस प्रकरण ने मन में कुछ मौलिक सवाल फिर से उठा दिए हैं।भारतीय संविधान में ८६वें संशोधन(२००२) द्वारा प्राथमिक शिक्षा को अब मौलिक अधिकारों में सम्मिलित कर लिया गया है। मौलिक अधिकारों से सम्बन्धित अध्याय-३ में जोड़े गये अनुच्छेद २१-क में उल्लिखित है कि-“राज्य ऐसी रीति से जैसा कि विधि बनाकर निर्धारित करे, छः वर्ष की आयु से चौदह वर्ष की आयु तक के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध करेगा।”नागरिकों के लिए निर्धारित मौलिक कर्तव्यों की सूची, अनु.५१-क, में भी यह कर्तव्य जोड़ा गया है कि-५१-क(ट): छः वर्ष की आयु से १४ वर्ष की आयु के बच्चों के माता पिता और प्रतिपाल्य के संरक्षक, जैसा मामला हो, उन्हें शिक्षा के अवसर प्रदान करें।”शिक्षा को वा…

Ghazel

ग़ज़ल
(ये ग़ज़ल मैंने shashtriya परम्परा से हटकर एक नए मीटर पर लिखी थी जिसके sheron की पहली लाइन में मात्राएं कम रखी गई हैं। अटपटा लग सकता है परन्तु गेयता में व्यवधान नहीं है।)

साँप के घर में नेवले की षिकायत लेकर ।
मिलने जाते हैं कई लोग अदावत लेकर ।
खूब व्यापार सितम का करते,
हाथ में थोड़ा नमूना-ए -षराफत लेकर ।
खुदा का shukriya अदा करना
मरने पाओ जो जिन्दगी को सलामत लेकर।
कोई लेता तो अब थमा देते
हम परेषान हैं गांधी की अमानत लेकर ।
अब सजा और क्या गरीबों को?
ये सजा कम है क्या जीना और मुसीबत लेकर !
पूरी दुनिया खरीद बेच रहे
निकले थे जेब में थोड़ी सी सियासत लेकर ।
राढ़ी तुमने फरेब देखा है
जब तेरे लोग घूमते थे मुहब्बत लेकर ।
लोग देखेंगे दुखी ठग लेंगे
अब निकलना नहीं बिगड़ी हुई हालत लेकर ।

सामाजिक रिश्ता

मुल्ला नसरुद्दीन के पास समय की बड़ी कमी थी. बेचारे अपनी बीवी को समय दे ही नहीं पाते थे. तो उन्होंने सोचा कि क्यों न उसे तलाक़ ही दे दिया जाए. लिहाजा वे शहरक़ाज़ी के दफ्तर गए और वहां तलाक़ की अर्जी डाल दी. क़ाज़ी ने नसरुद्दीन को बुलाया. मुल्ला हाज़िर हुए.
क़ाज़ी ने सवाल किया, ‘तो तुम्हारी बीवी का नाम क्या है मुल्ला?’
‘अरे! ये तो मालूम ही नहीं है’, मुल्ला ने जवाब दिया.
‘अच्छा’, क़ाज़ी ने आश्चर्य जताया, ‘तुम लोग कितने दिनों से साथ रह रहे हो?’क़ाज़ी ने फिर पूछा.
‘मेरा ख़याल है 20 साल से कुछ ज़्यादा हो गए’, मुल्ला ने कुछ सोचते हुए बताया.
‘ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम 20 साल से साथ रहो और नाम भी न जानो?’ क़ाज़ी बौखलाया.
‘हो सकता है हुज़ूर! बिलकुल हो सकता है.’ मुल्ला ने सफ़ाई पेश की, ‘असल में हमारा उसका कोई सामाजिक रिश्ता ही नहीं है.’

कविता - tumhaari deh

तुम्हारी देह
प्रिये
तुम अपनी देह में बंधी रहो
क्योंकि
तुम्हारी देह मेरा अन्तिम सत्य है
तुम्हारी
देह एक जीवन है,
जीवनयात्रा है
कर्म है
धर्म है
आस्था और आकर्षण है
देह की परिधि के बाहर
कुछ
नहीं बस shoonya है
इस देह ने ही तुम्हें
मेरी प्रियतमा बनाया है
जब तुम्हारी याद आई है
tumhara तन ही याद आया है ।
तुम्हारी देह
कुन्दन है,
कामाग्नि एवं विरहाग्नि में
तपकर इसका रूप निखरा है।
तुम्हारा तन सप्त सरोवर है
निर्मलहै
निर्झर है
हिमषीतल है ।
तुम्हारा तन
श्नल है
मैं जल जाता हूँ
जब तुम मेरे पास होती हो
सर्दियों में जब
मेर सीने पर सिर रखकर सोती हो,
तुम्हारी देह दर्पण है
अंग-अंग में तुम्हारा प्रतिबिम्ब है
प्रतिबिम्ब मेरा भी है
किन्तु वह तुम्हारी देह पर अर्पण है
और कदाचित नारीमय भी है।
तुम्हारी देह
खाद्य है
पेय है
पथ्य है
भोग्य है
सेव्य है
ओषधि है
संजीवनी है
तुम्हारी देह
शृंगार है
रति है
रतिपति है
पुष्पबाण है
बसन्त है
सुगन्ध है
पुष्प है,मकरंद है
पूजा है तुम्हारी देह
साधना है
यज्ञ है
हवन है
हवि है
होत्री भी है
यजमान है तुम्हारी देह।
सार्वभौमिक साहित्य है
तुम्हारी देह,
मूलपाठ है
षाब्दिक कृतियाँ तो इसकी टीकाएँ हैं।
तुम्हारी देह
अmrit और मदिरा की
लबालब भरी हुई
गाग…

खजूर से इतर

यह कहानी मैंने बहुत पहले लिखी थी. शायद सन 2000 में और मन में चल तो यह उसके भी बहुत पहले से रही थी. लेकिन लिखने के बाद भी केवल आलस्यवश मैंने इसे भेजा कहीं नहीं. बहुत दिनों बाद मैंने इसे एक जगह भेजा भी तो लंबे अरसे तक कोई जवाब नहीं आया और न मैंने कोई पूछताछ ही की. फिर पिछले साल इसे भाई फ़ज़ल इमाम मल्लिक ने मांगा तो मैंने उन्हें दे दी. तब यह सनद में छप कर आई. मुझे लगता है अब इसे दुबारा पढ़ा जाना चाहिए. शायद इसे पढ़े जाने के लिए यह एक मुफ़ीद वक़्त है. तो लीजिए आप भी देखिए और अपनी राय भी दीजिए.                                                                                                       इष्ट देव सांकृत्यायन

बहुत गहरा कुआं था. कुआं जितना गहरा था, उतना ही संकरा. कुएं में ढेर सारे मेढक थे. बहुत बड़ा तालाब था. तालाब जितना बड़ा था, उतना ही छिछला. तालाब में ढेर सारी मछलियां थीं. यूं उनमें कोई रिश्ता न था. तालाब न तो कुएं का पड़ोसी था और न कुआं तालाब का. संबंध फिर भी दोनों में थे और गहरे थे. ऐसे ही मछलियां न तो मेढकों की पड़ोसी थीं और न मेढक मछलियों के. संबंध फिर भी दोनों में थे और बहुत उथले थे.…

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