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Showing posts from July, 2007

मीडिया का संकट

पत्रकारिता पर इधर ख़ूब लिखा जा रहा है. अविनाश भाई की सदारत वाला मोहल्ला इन दिनों मीडिया को ही लेकर हल्ले का केंद्र बन गया है. इस हल्ले की शुरुआत वैसे तो काफी पहले हो चुकी थी, पर इसे गति दीं दिलीप मंडल के एक पोस्ट ने. दिलीप ने इसमें मीडिया के अतीत का कच्चा चिटठा खोलते हुए कहना चाहा है कि आज दिखाई दे रही यह मूल्यहीनता कोई नई बात नहीं है और इसलिए युवा पत्रकारों को किसी हीनताग्रंथि का शिकार होने की जरूरत नहीं है. दूसरी बात यह कि मीडिया के इस पतितपने के पीछे कुछ मजबूरियां हैं उन्हें भी समझा जाना चाहिए. तीसरी बात यह कि मीडिया अगर इधर बिगडा है तो वह कई मायनों में बहुत कुछ सुधरा भी है और वह सुधर भी देखा जाना चाहिए. बस. मेरी समझ से उनका मंतव्य यहीं तक था. इसके बाद मोहल्ले में बहुत लोगों ने बहुत कुछ प्रतिक्रियाएँ कीं. मामला मोहल्ले से कस्बे तक पहुंच गया. आखिरकार टाउन एरिया चेयरमैन रवीश भाई को बोलना पड़ा. उनहोंने नए दौर को हिंदी पत्रकारिता का प्रश्न काल कहा और बताया कि मीडिया आज अपनी आलोचना के संदर्भ में जितनी अंतर्मुखी है उतनी कभी नहीं थी. यह बात सौ फीसदी सच है.
एक ऐसे दौर में जबकि इस लोकतंत्र…

सवाल है प्राथमिकताओं का

पिछले दिनों वरिष्ठ टीवी पत्रकार दिलीप मंडल ने एक लेख लिखा था "एड्स का अर्थशास्त्र और राजनीति". नवभारत टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित इस लेख को दिलीप जी की अनुमति से इयत्ता पर लिया गया था. लेख पढा गया और हमारे प्रबुद्ध ब्लोगरों ने अपनी प्रतिक्रियाएँ भी दर्ज कराईं. संजय मिश्रा और दर्द हिंदुस्तानी तो जमीनी हकीकत से वाकिफ होने के नाते दिलीप से सहमत थे, लेकिन इनमें एक प्रतिक्रिया रवि मिश्र की भी थी. रवि मिश्र ने अपनी यह प्रतिक्रिया अपने ब्लोग पर भी दी थी. दिलीप जी ने तुरंत उसका जवाब भी मुझे भेज दिया था. लेकिन मैं चाहता था कि रवि मिश्र की प्रतिक्रिया का हिंदी में अनुवाद कर उसे ब्लोग पर एक पोस्ट की ही तरह दिया जाए. इस बीच अन्यत्र व्यस्तताओं के कारण समय की कमी के नाते मैं यह कार्य नहीं कर सका था, पर अब यह सब इकट्ठे दे रहे हैं.
रवि मिश्र पेशे से चिकित्सक हैं. उनका आग्रह यह है कि एचआईवी/एड्स के नाम पर जो खर्च किया जा रहा है, उस पर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए. हाँ, अगर उसका उपयोग सही तरीके से न हो रहा हो तो जरूर आपत्ति दर्ज कराएं. बेशक वह एक चिकित्सक के नजरिए से सही सोच रहे …

तुम नहीं हो दूर मुझ से

मन तुम्हारा जब भरे तब नयन मेरे भीग जाते ,
शूल चुभता जब तुम्हें तब पांव मेरे टीस पाते,
तुम नहीं हो दूर मुझ से मुझ में ही हो तुम समाये,
तुम हंसो जब खिलखिलाकर जन्म कई गीत जाते.
अनिल आर्य

बस कुछ नहीं

कहती हो हर बात में कि कुछ नहीं, कुछ मन कहे पर होंठ कहते कुछ नहीं, गुनगुनाती मन ही मन पर पूछ लूं तो, कुछ नहीं, बस कुछ नहीं, बस कुछ नहीं। अनिल आर्य

कोर्स में सेक्स

शर्मा जी और सलाहू भाई को एक ही बेंच पर बैठे होने के बावजूद पिले पडे देख कर अपने कदम भी ठहर गए. सोच लिया कि वाक् तो रोज ही करते हैं, आज का दिन सिर्फ मोर्निंग पर ही संतोष कर लेते हैं. बहुत हुआ तो बाद में थोडा हाथ-पैर आगे-पीछे, ऊपर-नीचे कर लेंगे. मुल्ला जी से मुखातिब हुआ और पूछ ही पड़ा, 'क्या बात है भाई? बरसात तो अभी रात में ही हुई है, फिर क्यों दोनों लाल-पीले हुए जा रहे हो सुबह-सुबह?'
मालूम पड़ा शर्मा जी को एक टीनएजर जोडे की हरकतें नागवार गुजरीं हैं. 'हालांकि उनने इसके साथ कुछ भी नहीं किया. जो किया आपस में किया. पर ये सज्जन उन्हें डांट भी आए और उससे भी मन नहीं भरा तो अब यहाँ बैठ कर सरकार पर बिसूर रहे हैं.' यह सलाहू थे.
जोडे को डांट आए सो तो चलिए बात थोड़ी-बहुत समझ में आती है, पर अब सरकार पर बिसूर रहे हैं; शर्मा जी का यह स्टैंड मेरे भी समझ में नहीं आ रहा था. मान लीजिए अगर मुंडे-मुंडी ने कुछ किया भी हो उल्टा-सीधा तो इसमें सरकार कहॉ से आ गयी भाई. लेकिन नहीं साहब लोकतंत्र की यही तो मुसीबत है. बीवी ने दाल में नमक ज्यादा डाल दिया आफत सरकार की. बेटे ने दो-चार सौ रुपये फालतू मांग …

एड्स का अर्थशास्त्र और राजनीति

एड्स कोई बीमारी नहीं है. बल्कि यह सिर्फ एक स्थिति है. एक ऎसी स्थिति जिसमें शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र धीरे-धीरे नष्ट हो जाता है. यह संक्रामक है और फैलता है शरीर के कुछ खास द्रवों के माध्यम से. यह बात आज देश का बच्चा जानता है. इसी साल जून तक बताया जाता रहा है कि हमारे देश के हर सौ में एक आदमी एचआईवी पोजिटिव है. इस बात पर भरोसा करें तो हमारे आसपास ऐसे लोगों की भीड़ होनी चाहिए, जो नहीं है. फिर भी संयम में विश्वास और उस पर अमल करने वाले देश के नागरिकों को हर चौराहे पर बोर्ड लगाकर बताया जा रहा है कि वह चलें कंडोम के साथ. यानी स्वयं अपने चरित्र-अपने ईमान पर भरोसा करना छोड़ दें. गोया पूरा देश राजनेता हो गया हो. आखिर ऐसा क्यों किया जा रहा है? मलेरिया, डायरिया, टीबी, कैंसर, एनीमिया जैसी बीमारियों के बजाय एड्स पर हम अरबों रुपये की रकम हर साल फूंक रहे हैं. आख़िर क्यों? इस सवाल का जवाब तलाश रहे हैं टीवी पत्रकार दिलीप मंडल. उनका यह लेख आज ही नवभारत टाइम्स में छपा है. इयत्ता में उसे यथावत लिया जा रहा है दिलीप जी की अनुमति से.

एड्स और एचआईवी इनफेक्शन अजीब बीमारी है. इसके बीमार आपको शायद ही कहीं नजर आएंग…

चुलबुली यादें

हम और बिरना खेलें एक संग मैया, पढ़ें इक संग, बिरना कलेवा मैया ख़ुशी -ख़ुशी दीनों, हमरा कलेवा मैया दीयो रिसियाए . मुझे याद है कन्या भ्रूण की सुरक्षा हेतु और बालक-बालिकाओं को सम।नता का दर्जा देने के लिए उन दिनों दूरदर्शन पर इक बड़ा ही प्यारा विज्ञापन आता था. जिसके जरिये पूरा संदेश भी था और वो इस क़दर मन में बसा जो हूबहू मुझे आज तक याद है. तब शायद चैनलों की बाढ़ नहीं आयी थी. तभी तो अश्लीता की गुंजाइशें भी नहीं होती थीं. खैर अब तमाम चैनलों के चलते दूरदर्शन का एंटीना कहीं कुचल गया. क्योंकि इसको लगा डाला तो लाइफ झींगालाला. इतने चैनलों को देखने के लिए बस बटन दबाते रहो, कुछ दिखे तो वहीं रोक दो वरना आगे बढ जाओ. खैर इसमें बढने की कोई कोशिश नहीं करनी होती क्योंकि इसमें एक के साथ एक फ्री जो मिल जाता है. हम वापस पुराने विज्ञापनों की बात करें तो एक और याद आ रहा है हॉकिंस की सीटी बजी खुशबू ही खुशबू उड़ी......... उस वकत सौम्यता का जामा पहने ऐसे न जाने कितने विज्ञापन होंगे. आपको शायद याद हो एक छोटी सी डाँक्युमेंटरी फिल्म आती थी बच्चों के लिए प्रायोजित कार्यक्रम था " सूरज एक चन्दा एक, एक-एक करके तार…

प्रधानमंत्री का लतीफा

सुबह-सुबह अख़बार के पहले ही पन्ने पर एक जोरदार लतीफा पढ़ कर तबीयत हरी हो गई. लतीफा पढने से भी ज्यादा ख़ुशी यह जान कर हुई कि हमेशा गम्भीर से दिखने वाले अपने अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री इतना बढ़िया मजाक भी कर लेते हैं. मैं शर्तिया कह सकता हूँ कि कई लोगों ने तो उनके लतीफे को भी सच्ची बात समझ लिया होगा. निश्चित रुप से वे उनकी इस बात के प्रति उतने ही गम्भीर भी हुए होंगे जितने कि उनके प्रधानमंत्री होने के प्रति. खास तौर से वे लोग जिनका लिखने-पढने से कुछ संबंध है और उनमें भी वे जो हिंदी में लिखते हैं, तो इतने गम्भीर हुए होंगे कि पूछिए मत. औरों को क्या कहूं, मैं खुद ही थोड़ी देर के लिए संशय में फंस गया. तय ही नहीं कर प रहा था कि इसे क्या मानूं. 'ख्वाब है तू या कोई हकीकत ....' टाइप का मामला हो गया था.
बड़ी देर तक गहरे संशय में फंसा रहा मैं कि आखिर इसे मानूं क्या? भीतर बैठा लेखक मन बार-बार कह रहा था, मान लो भाई, सच ही कहा जा रहा है. दूसरा दुनियादार मन कहता, बेवकूफ हो क्या? पागल हो गए हो? इतना तो प्री नर्सरी का बच्चा भी जानता है कि ऎसी बातें सच हो ही नहीं सकतीं. कुछ बातें होती हैं ऐसे ही क…

जालिब की गज़लें

हबीब जालिब वाली पोस्ट पर प्रतिक्रिया करते हुए उड़न तश्तरी वाले भाई समीर जी ने अनुरोध किया है कि हो सके कुछ पूरी कविताएँ पढ़वाएं. वैसे उनकी एक कविता 'पाकिस्तान का मतलब क्या' पहले ही इयत्ता पर पोस्ट की जा चुकी है. यहाँ मैं जालिब साहब की कुछ गजलें दे रहा हूँ, जो मुझे. बहुत पसंद आईं.

......गली में ना आएं हम

ये और बात तेरी गली में ना आएं हम
लेकिन ये क्या कि शहर तेरा छोड़ जाएँ हम
मुद्दत हुई है कू-ए-बुताँ की तरफ गए
आवारगी से दिल को कहाँ तक बचाएं
हम शायद बाक़ैद-ए-ज़ीस्त ये साअत ना आ सके
तुम दास्ताँ-ए-शौक़ सुनो और सुनाएं हम
बेनूर हो चुकी है बहुत शहर की फजा
तारीक रास्तों में कहीँ खो ना जाएँ हम
उस के बग़ैर आज बहुत जी उदास है
'जालिब' चलो कहीं से उसे ढूँढ लाएं हम

इस शहर-ए-खराबी में ......
इस शहर-ए-खराबी में गम-ए-इश्क के मारे
ज़िंदा हैं यही बात बड़ी बात है प्यारे
ये हंसता हुआ लिखना ये पुरनूर सितारे
ताबिंदा-ओ-पा_इन्दा हैं ज़र्रों के सहारे
हसरत है कोई गुंचा हमें प्यार से देखे
अरमां है कोई फूल हमें दिल से पुकारे
हर सुबह मेरी सुबह पे रोती रही शबनम
हर रात मेरी रात पे हँसते रहे तारे
कुछ और भी हैं काम हमें ए गम-ए-जा…

...इसी सूरत लिखना

अपने सारे दर्द भुला कर औरों के दुःख सहता था.
हम जब गज़लें कहते थे वो अक्सर जेल में रहता था.
आख़िरकार चला ही वो रूठ कर हम फर्जानों से
वो दीवाना जिसको ज़माना जालिब जालिब कहता था.

हबीब जालिब का परिचय देने के लिए कतील शिफाई की ये पंक्तियां मेरे ख़याल से काफी हैं. आज ही दिन में मैंने जालिब साहब की एक रचना 'पाकिस्तान का मतलब क्या' इयत्ता पर पोस्ट की है. यह रचना मुझे इंदिरा जी ने पढाई. वह उस वक़्त गूगल से कुछ सर्च रहीं थीं, जब उन्हें अनायास ही वह कविता दिखी. अच्छी लगी, अपने माना जैसी बात लगी. लिहाजा उन्होने यह कविता मुझसे शेयर की. रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेसी नामक साईट पर है यह रचना. हमने वह साईट और खंगाली. उस पर जालिब साहब की कुल दस रचनाएँ मिलीं, लेकिन उनके बारे में वहां कोई जानकारी उपलब्ध नहीं थी. संयोग कि इसके पहले तक मैं जालिब साहब के बारे में जानता भी नहीं था. इसे आप चाहे मेरी कम-अक्ली कह लें या बेखयाली, पर ये सच है कि मैंने अब तक उनका नाम भी नहीं सुना था. आज उनकी कुछ कविताएँ देखीं तो लगा कि गलती हुई. अफ़सोस हुआ. जो भी हो इस रचनाकार के बारे में जानना चाहिए. लिहाजा हम फिर गूगल के दरवाजे पहुं…

पाकिस्तान का मतलब क्या?

रोटी, कपड़ा और दवा
घर रहने को छोटा सा
मुफ़्त मुझे तालीम दिला
में भी मुसलमान हूँ वल्लाह
पाकिस्तान का मतलब क्या
ला इलाह इल्लल्लाह …


अमरीका से मांग ना भीख
मतकर लोगों की तजहीक
रोक ना जम्हूरी तहरीक
छोड़ ना आज़ादी की राह
पाकिस्तान का मतलब है क्या
ला इलाह इल्लल्लाह…


खेत वदेरों से ले लो
मिलें लुटेरों से ले लो
मुल्क अंधेरों से ले लो
रहे ना कोई आलीजाह
पाकिस्तान का मतलब क्या
ला इलाह इल्लल्लाह…

सरहद, सिंध, बलूचिस्तान
तीनों हैं पंजाब कि जान
और बंगाल है सब कि आन
आई ना उन के लब पर आह
पाकिस्तान का मतलब क्या
ला इलाह इल्लल्लाह…


बात यही है बुनियादी
घसिब कि हो बर्बादी
हक कहते हैं हक आगाह
पाकिस्तान का मतलब क्या
ला इलाह इल्लल्लाह …
हबीब जालिब

परत-दर-परत

परत दर परत
छिपा आदमी-
परत डर परत
खुल रहा है कहीं.

प्याज की झिल्लियों से
सृष्टी के राज-
खुल रहे हैं अभी.
अलग हो-हो कर
कहीं ना कहीं -
मिल रहे हैं सभी.

आसमानों
हवाओं में
बादल -
परत दर परत
घुल रहा है कहीं.

अजब खेल है
अँधेरा-उजाला
उजाला-अँधेरा.
मौत के साथ
क्यों
न जाने है
ज़िंदगी का बसेरा.

हजार परतों में
सूखा हुआ
मन-
परत दर परत
धुल
रहा है कहीं.

भाई अनामदास जी कृपया नोटियाएं. मैं ईमानदारी से अक्सेप्टिया रहा हूँ. लिहाजा कापीराईट का मुकदमा न ठोंकेंगे. वरना आगे से अक्सेप्टियाऊंगा ही नहीं. वैसे यह सच है कि यह गीत उनके ही एक चिठारस से प्रेरित है.

इष्ट देव सांकृत्यायन

शास्त्री जी और उनका 'आवश्यक' आनंद

पिछले दिनों भाई मसिजीवी ने अपने चिट्ठे पर एक पोस्ट किया था. शास्त्री जे सी फिलिप के चिट्ठे सारथी के बारे में उन्होने कुछ अंदेशे जताए थे. जाने क्यों उन्हें लगा कि यह मामला कुछ अतिमानवीय टाईप का हो रहा है। उसमें उन्होने शास्त्री जी के बारे में संक्षेप में पर्याप्त जानकारी दीं है और साथ ही यह सवाल भी उठाया है-
100000 से ज्‍यादा वितरित प्रतियों वाली ईपुस्‍तक के लेखक शास्‍त्रीजी पुरातत्‍व पर डाक्‍टरल शोध करते हुए हर चिटृठा पढ़ लेते हैं- इतने ट्रेफिक को मैनेज कर लेते हैं- हरेक को उत्‍तर दे देते हैं- इतने सारे टूलोंकी समीक्षा कर पाते हैं- अमरीकी विश्‍वविद्यालय के मानद कुलपति के दायित्‍व निवाह ले जाते हैं- अपने अराध्‍य के प्रति उपासना दायित्‍व पूरे कर लेते हैं- अन्‍य अनुशासनो के प्रति अपने अकादमिक दायित्‍व भी पूरे कर लेते हैं....कुछ कुछ दैवीय हो रहा है बंधु। हमारा शक है कि सारथी कोई निजी चिटृठा नहीं है।
शास्त्री जी से इसके पहले तक मेरा परिचय बस चिट्ठेबाजी तक सीमित था. चिट्ठेबाजी के दौरान शुरुआत में मुझे मुश्किलें बहुत झेलनी पडती थीं. शास्त्री जी के सारथी पर चूंकि मैंने कई बार तकनीकी लेख भी देखे…

एक चेहरा ज़िंदगी का

Image
उस वक़्त मैं गाजियाबाद के प्रताप विहार में था, जब 'सारे जहाँ से अच्छा' की धुन सुनायी पडी. मैंने मोबाइल निकला तो पता चला संस्थान का नंबर था. पहले तो लगा कि भला रविवार को किसे मेरी जरूरत पड़ गई और क्यों? उठाया तो उधर से एक चिर-परिचित और बिल्कुल अनौपचारिक आवाज थी. फिर पूछा आपने सखी में बहुत पहले चंद्रशेखर जी पर कुचह लिखा था. मैंने कहा हाँ. 'उसकी एस्टीवाई फ़ाइल चाहिए.' उधर से आवाज आयी. 'वह तो अब नहीं मिल सकती' मैंने उन्हें तकनीकी समस्या बताई और उसे जागरण डॉट कॉम से उठा लेने को कहा. उन्होने बताया कि असल में चंद्र शेखर जी नहीं रहे. जान कर अचानक धक्का सा लगा. बीमार तो वह काफी दिनों से चल रहे थे, पर अचानक यह दुखद खबर मिलेगी ऐसा सोचा नहीं था. आम तौर पर राजनेताओं के निधन की खबर मुझे दुखी नहीं कर पाती. पर यह खबर मुझे हिला सी गई. इसलिए नहीं कि चंद्रशेखर से मेरी कोई बड़ी घनिष्ठता थी, इसलिए कि उन्हें इस देश की गरीब जनता की आख़िरी उम्मीद के तौर पर देखा जा सकता था. धनकुबेरों और रईसजदों द्वारा अपहृत भारतीय राजनीति के इस दौर में वह एक ऎसी शख्सियत थे जिसे भारतीय जनता के जीवन का सच …

सात अजूबे हमने देखे

भाई नितिन बागला ने आज ही ताज वाले सवाल को लेकर अपने इन्द्रधनुष पर सात नए अजूबे गिनाए हैं। उनके सातों अजूबे मुझे सही लगे हैं. पर कुछ अजूबे मुझे भी सूझ रहे हैं. मैं उन्हें गिना रहा हूँ.
१. अपने को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताने वाले देश में प्रधानमंत्री पद पर एक ऐसा व्यक्ति बैठा है जो कभी ग्राम प्रधान का चुनाव भी नहीं जीत सका.
२. राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी एक ऐसे व्यक्ति को बनाया जा चुका है और पूरी संभावना है कि वह राष्ट्रपति हो भी जाए, जिसके ईमान पर सवाल उठ चुके हैं.
३. गरीबी की जो रेखा निर्धारित की गई है उसके नीचे के एक भी व्यक्ति के लिए एक जून की रोटी का भी जुगाड़ मुश्किल है. उस पर तुर्रा यह कि उनके बच्चे हाई-फाई स्कूलों में पढेंगे.
४. भारत में हिंदी पढने वालों के लिए रोटी जुटानी मुश्किल है पर हम अमेरिका में जाकर हिंदी सम्मेलन कर रहे हैं.
५. हर कोई अच्छी फिल्मों, अच्छे साहित्य की कमी का रोना रोता है पर अच्छी चीजें बाजार में आते ही औंधे मुँह गिर जाती हैं।
६. फांसी की सजा पाए अपराधी को माफ़ किया जाए या नहीं, इस फैसले में भी वर्षों लग जाते हैं.
7. और साहब साहित्य से दुनिया बदलने का…

... तो मैं समझदार हूँ?

मैंने ग्रेजुएशन के दौरान एक निबंध पढा था 'ऑफ़ ताज'. इसे अंगरेजी मानसिकता से प्रभावित होने का नतीजा न माना जाए, लेकिन यह सच है कि मैं उस लेखक के तर्कों से प्रभावित हुआ था और ताज को लेकर मेरे मन में जो भी रूमानी ख़याल थे वे सारे दूर हो गए. यह भी सच है इन सामंती चोंचलों से मेरी कोई सहमति पहले भी नहीं थी. भूख और गरीबी से बेहाल एक देश का बादशाह जनता की गाढी कमाई के करोड़ों रुपये खर्च कर एक कब्र बनवाए, इससे बड़ी अश्लीलता मुझे नहीं लगता कि कुछ हो सकती है.
संयोग से उसी दौरान मुझे ताज देखने का अवसर मिला और मुझे कहना पड़ेगा कि मुझे उस लेखक के तर्कों से सहमत होना पड़ा. स्थापत्य के नाम पर मुझे वहाँ कुछ खास नहीं दिखा. उससे बेहतर राजस्थान की छतरियाँ हैं और अगर इसे धर्मनिरपेक्षता का अतिक्रमण न माना जाए तो कोणार्क, खजुराहो के मंदिर हैं, भोपाल की बेगमों की बनवाई मस्जिदें हैं. गोवा के चर्च हैं और पंजाब व दिल्ली के गुरूद्वारे हैं. देश के सैकड़ों किले हैं. वहाँ अगर कुछ खास है तो वह सिर्फ शाहजहाँ के आंसू हैं. अगर मुझे आंसू ही देखने हों तो यहाँ करोड़ों ग़रीबों के आंसू क्या कम हैं, जो एक बादशाह के घ…

उजले कपडों वाले लोग

वैद्य राज नमस्तुभ्यम
यमराज सहोदरः.
एकः हरति प्राणं
अपरः प्राणानि धनानि च..
पिछले दिनों सामान्य बातचीत में यह श्लोक डा. देवेन्द्र शुक्ल ने सुनाया था. उन्होने ही बताया कि यह पंचतंत्र की किसी कहानी में किसी संदर्भ में आया है. अब पंचतन्त्रकार यानी विष्णु शर्मा ने भले ही यह बात मजाक में कही हो, पर पुराण इस मामले में साक्ष्य हैं कि यह बात है सही. ऐतिहासिक न सही, पर पौराणिक तथ्य तो है ही. यमराज और वैद्यराज अगर सगे न भी सही तो सौतेले भाई जरूर हैं, ऐसा पुराणों में वर्णित है. आप कहेंगे कैसे? तो साहब जान लीजिए. सूर्य की पत्नी संज्ञा उनके तेज से घबरा कर भाग गयी थीं और जंगल में छिपी थीं. इतना तो आप जानते ही होंगे. उन्ही दिनों छाया सूर्य के घर में संज्ञा का रुप लेकर रहीं. इस बीच उनके दो पुत्र हुए- शनि और यम. लेकिन जल्दी ही सूर्य को यह आभास हो गया कि यह संज्ञा नहीं हैं और फिर वह चले संज्ञा को तलाशने. वह जंगल में मिलीं, अश्विनी यानी घोड़ी के रुप में. वहाँ सूर्य ने उनके साथ रमण किया और उनसे भी उनके दो पुत्र हुए. ये थे अश्विनी कुमार. आयुर्वेद में सर्जरी की हैंडबुक के तौर पर अब सुश्रुत संहिता जरूर प्रतिष्ठ…

देख लो अब भैया

सच की खिंचती खाल देख लो अब भैया.
झूठ है मालामाल देख लो अब भैया..

आगजनी ही जिसने सीखा जीवन में ,
उनके हाथ मशाल देख लो अब भैया..

चोरी लूट तश्करी जिनका पेशा है,
वही हैं द्वारपाल देख लो अब भैया..

माली ही जब रात में पेड़ों पर मिलता है ,
किसे करें रखवाल देख लो अब भैया..

बंदूकों से छीन के ही जब खाना हो-
भांजे कौन कुदाल देख लो अब भैया..

-विनय ओझा स्नेहिल

वही होगा जो .....

एक बार मैं घूमते-घूमते एक अनजाने कस्बे में पहुंच गया. छोटी सी पहाड़ी पर बसे इस कस्बे की आबो-हवा मुझे बहुत अच्छी लगी और पास ही कस्बे के बाहर एक ऊंची जगह पर एक खाली घर भी दिख गया. फिर क्या था, मैं वहीं ठहर गया. चूंकि यह जगह शहर से बाहर थी और वहां कोई खेती भी नहीं होती थी, इसलिए वहां तक पहुंचने का पूरा रास्ता कंटीली झाडि़यों से भर गया था. कुछ दिनों तक तो मेरे वहाँ होने के बारे में किसी को पता ही नहीं चला. मैं चुपचाप अल्लाह की इबादत में लगा रहा. पर आखिरकार लोगों को पता चल ही गया और फिर लोग मेरे पास पहुंचने भी लगे. पहुंचा हुआ फकीर मानने के नाते लोग तरह-तरह से मेरी खुशामद भी करते, पर मैं कुछ बोलता ही नहीं था. एक दिन हुआ यह कि कस्बे के लोगों द्वारा पाले गए सारे मुर्गे मर गए. तब गांव के तमाम लोग भागे हुए मेरे पास पहुंचे और मुझे यह हाल बताया. मैंने उन्हें कहा, 'कोई बात नहीं। समझो कि खुदा की यही मर्जी थी.' खैर लोग लौट गए. थोड़े दिनों बाद कस्बे में मौजूद सारी आग भी बुझ गई. उनके पास खाना पकाने तक के लिए भी आग नहीं बची. कस्बे के लोग फिर मेरे पास आए और मैंने फिर वही जवाब दिया. कुछ दिनों बाद…

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