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पेड न्यूज क्या है?

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  प्रकाश अस्थाना जब भी आम चुनाव निकट होते हैं , तो चुनाव आयोग और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से एक निर्देश जारी होता है कि मीडिया में पेड न्यूज नहीं चलाई जाएं अन्यथा समुचित कार्रवाई होगी। आम पाठक भले ही इसे अधिक गहराई से न समझ सके , लेकिन मीडिया से जुड़े लोग इस बात को समझते हैं। होना यह चाहिए कि पाठकों या चैनल दर्शकों तक पेड न्यूज की बारीकियों को कोई ठीक तरीके से पहुंचाए या उन्हें समझाए...मीडिया खुद ऐसा करेगा नहीं , क्योंकि यह अपने पांव में कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा !! तो फिर कौन करेगा ? ऐसे में सूचना प्रसारण मंत्रालय को ही कमर कसनी होगी , वह भी पूरी ईमानदारी के साथ..। साभार: https://www.indianfolk.com/menace-paid-news-edited-2/ पेड न्यूज... चुनावों के दौरान किसी पार्टी विशेष या चुनाव में खड़े उम्मीदवार का महिमामंडन करने जैसी खबरें पैसे लेकर दिखाने अथवा छापने को अभी तक पेड न्यूज समझा जाता है.. लेकिन अब इसका रूप भी बदल चुका है और समय सीमा की कोई LOC भी निर्धारित नहीं है। यानि , बारहों महीने..। .. जी हां , है कड़वा लेकिन सच तो यही है। अब खबरों के बदले पैसा बनाने का खेल चुनावी मौसम ...

आईआईएमसी प्रवेश परीक्षा के परिणाम अगले सप्ताह

नई दिल्ली। भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) द्वारा 8 पीजी डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के लिए रविवार को प्रवेश परीक्षा का आयोजन किया गया। इस वर्ष प्रवेश परीक्षा को कराने की जिम्मेदारी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) को दी गई थी। यह पहला मौका है जब परीक्षा एनटीए द्वारा आयोजित करवाई गई है। इससे पूर्व आईआईएमसी द्वारा स्वयं परीक्षाओं का आयोजन किया जाता था। कोरोना महामारी के कारण इस वर्ष प्रवेश परीक्षा ऑनलाइन आयोजित की गई। एनटीए द्वारा 4 बैचों में सुबह 10 बजे से शाम 7 बजे तक प्रवेश परीक्षा का आयोजन किया गया। आईआईएमसी के 6 परिसरों में संचालित होने वाले 8 पाठ्यक्रमों की 476 सीटों के लिए इस वर्ष लगभग 4600 विद्यार्थियों ने आवेदन किया था। इनमें से 3773 विद्यार्थी परीक्षा में शामिल हुए। प्रवेश परीक्षा का परिणाम अगले हफ्ते आईआईएमसी की वेबसाइट पर घोषित किया जाएगा। कोरोना महामारी की वजह से इस वर्ष सत्र नवंबर के पहले हफ्ते से शुरू होगा।

साहित्यिक कमी को पूरा करेगी अनुस्वार: प्रो. राजेश कुमार

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कामिनी मिश्र इंडिया नेटबुक्स प्रकाशन की नई पत्रिका अनुस्वार के आवरण का विमोचन करते हुए सुप्रसिद्ध साहित्यकार और समालोचक प्रोफ़ेसर राजेश कुमार ने कहा कि यह पत्रिका एक बहुत बड़े साहित्यिक वैक्यूम को पूरा करेगी। ऐसा इसलिए कि इस समय ऐसी स्तरीय पत्रिकाओं की बहुत कमी है जो साहित्य का विकास करते हुए पाठकों को रुचिपूर्ण और सार्थक साहित्य उपलब्ध करवा सकें। हर्ष का विषय है कि अनुस्वार पत्रिका रंगारंग पत्रिका होगी जिसमें सभी विधाओं की रोचक और श्रेष्ठ रचनाएं प्रकाशित होंगी और प्रतिष्ठित साहित्यकारों को स्थान दिया जाएगा। राजेश जी ने आगे कहा कि त्रैमासिक आधार पर प्रकाशित होने वाली है इस पत्रिका का पाठकों को पहले से ही प्रतीक्षा बढ़ गई है और आकर्षण का विषय बन चुकी है। सभी लोग इसका उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हैं। अनुस्वार पत्रिका के आवरण के लोकार्पण के अवसर पर साहित्य अकादेमी से सम्मानित साहित्यकार डॉ दिविक रमेश ने अपने संदेश में कहा कि आज जबकि साहित्य को स्थान देने वाली पत्रिकाएँ बंद हो गई हैं या बंद होने के कगार पर हैं तथा ऐसे कितने ही समाचार पत्रों के साहित्यिक पृष्ठ शुष्क हो चुके हैं , साहित्यि...

नवरात्र का भाषा-वैज्ञानिक महत्व

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कमलेश कमल माँ दुर्गा को आदिशक्ति कहा गया है अर्थात् सभी शक्तियाँ उन्हीं से निःसृत होती हैं। लेकिन इस आदि शक्ति और इनके नामों की क्या व्याख्या हो ? अलग-अलग संदर्भों में भक्त , साधक , शोधार्थी , जिज्ञासु , ज्ञानी और अर्थार्थी इस आदि शक्ति के नामों और संबध्द उपासना पद्धति के अलग-अलग अर्थ व्याख्यायित करते हैं। मनोभिलषित वस्तु या स्थिति की प्राप्ति के लिए वर्ष की चारों ऋतु-संधियों (चैत्र , आषाढ़ , आश्विन , माघ) पर शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाने वाला , आदिशक्ति की आराधना का यह महान् पर्व नवरात्र भाषा-विज्ञान के दृष्टिकोण से भी अत्यंत ही रोचक है। इनमें भी शारदीय नवरात्र का विशेष महत्त्व है। शाक्त संप्रदाय में दुनिया की पराशक्ति , सर्वोच्च देवी के रूप में अधिष्ठित श्री दुर्गा की आराधना का यह पर्व अपने में भारतीय संस्कृति , धर्म और जीवन-दर्शन के विविध पहलुओं को समाहित किए हुए है। अगर दुर्गा शब्द को ही लें , तो वेदों में दुर्गा का उल्लेख नहीं है। उपनिषदों में उमा या हेमवती शब्द हैं , जबकि पुराण में आदिशक्ति की चर्चा की गई है। दुर्गा शब्द ‘ दुर्ग ’ में ‘ आ ’ प्रत्यय   जोड़कर बना ...

इस डाक विभाग का क्या होगा?

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हरिशंकर राढ़ी  आज भारतीय डाक विभाग ने दो ऐसी भयावह कर्तव्यपूर्ति की कि दंग रह गया। कुछ कहते नहीं बन रहा कि ये क्या-क्या चमत्कार करेंगे और कहाँ तक गिरेंगे। पिछले दिनों ‘ समकालीन अभिव्यक्ति ’ के दो विशेषांक आए थे - एक तो आत्मकथ्य विशेषांक और दूसरा रामदरश मिश्र एकाग्र। ये दोनो विशेषांक कोरोना काल की चुनौतियों को झेलते हुए किसी तरह हमने एक साथ छपवाया और भारतीय डाक विभाग से पंजीकृत डाक से भेजना शुरू किया। लेट-लतीफ तो चल जाएगा , उसे हमने स्वीकार कर लिया है। किंतु आज हमें हमारी पत्रिका के दो रजिस्टर्ड पोस्ट वापस आ गए , Not Address लिखकर। गया में एक सज्जन हैं श्री राजेंद्र वर्मा जी। वे केनेरा बैंक से रिटायर्ड मैनेजर हैं और देश की लगभग सभी पत्रिकाओं के विशेषांकों का संग्रह कर रहे हैं। उन्हें कहीं से मेरा नंबर मिला और मुझसे आग्रह किया कि समकालीन के जितने विशेषांक निकले हों , उनकी प्रतियां भिजवा दें। इसके लिए वर्मा जी ने बैंक खाता नंबर लेकर डाक व्यय सहित शुल्क भेज दिया। हमने उनके पते पर पत्रिका के उपलब्ध चार विशेषांक रजिस्टर्ड डाक से भेज दिए। बहुत दिनों तक कुछ सूचना न मिलने पर आज जब ट्रै...

आइए, हम हिंदीजन तमिल सीखें

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इष्ट देव सांकृत्यायन मैंने किशोरावस्था में तमिल सीखना शुरू किया था। वर्णमाला सीख भी ली थी लेकिन उसके आगे नहीं बढ़ सका। तब मैं गोरखपुर में था और मेरा कोई तमिल मित्र भी नहीं था। अपेक्षाकृत छोटा शहर होने के कारण वहाँ तमिल जनसंख्या न के बाराबर है। मेरे सहपाठियों में दक्षिण भारत एक-दो बच्चे रहे जरूर, लेकिन वे खुद तमिल या मलयालम केवल बोलना जानते थे। लिखने-पढ़ने में इतने अच्छे नहीं थे कि सिखा पाते। मेरे परिचय क्षेत्र में तमिल जानने वाला ऐसा कोई नहीं था। इंटरनेट तब था ही नहीं। ऐसी कोई दुभाषी किताब भी नहींं मिली जिससे मैं हिंदी या अंग्रेजी के माध्यम से तमिल सीख पाता। ऐसी स्थिति में वर्णमाला से आगे बढ़ने का कोई उपाय ही नहीं था। दिल्ली आने पर कुछ तमिल लोगों से मित्रता तो हुई लेकिन वे हिंदी माध्यम से तमिल सीखने लायक कोई पुस्तक उपलब्ध नहीं   करा सके। मुझे मानना होगा कि जिंदगी की आपाधापी में मैंने खुद भी यह बात किनारे रख दी थी। कह सकते हैं कि लगभग भूल सा गया था। कभी-कभी हूक सी उठती जरूर कि भाषाओं के मामले में दक्षिण भारत ही क्यों छोड़ा जाए, लेकिन फिर दूसरी प्राथमिकताएँ आड़े आ जातीं। समय सचमुच बहुत ...

डिजिटल इंडिया पर लालित्य ललित की पैनी नज़र: प्रो.राजेश कुमार

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नई दिल्ली। नई दिल्ली स्थित प्रेस क्लब में डॉ लालित्य ललित के ताज़ा व्यंग्य संग्रह डिजिटल इंडिया का लोकार्पण बुधवार को किया गया। यह व्यंग्य संग्रह गीतिका प्रकाशन की सुश्री गीता पंडित ने किया। इस अवसर पर व्यंग्य समालोचक व केंद्रीय हिंदी संस्थान के न्यासी सदस्य प्रो राजेश कुमार ने कहा- आज हमारी सारी दुनिया डिजिटल हो चुकी है. आज हम चाहे किसी से बात करने की सोचें , चाहे हम किसी खरीदारी करने की सोच है या हम किसी से कोई व्यवहार करने की बात सोचें या हम कोई व्यापार करने की बात सोचें या हम कोई आंदोलन करने की बात सोचें , हर जगह है डिजिटल दुनिया हावी है. डिजिटल दुनिया के माध्यम से हम गरीबों के लिए आंदोलन करते हैं , नेताओं के लिए समर्थन जताते हैं और और इसके साथ ही हम अपने दैनिक जीवन की रोजमर्रा की चीजें भी डिजिटल दुनिया के माध्यम से ही करते हैं. ऐसे में लेखक कैसे इस दुनिया से अलग हो सकता है. लालित्य ललित ने इस महत्वपूर्ण विषय पर अनेक कोणों से विचार किया है. चाहे वह मीडिया की दुनिया हो , चाहे वह सामाजिक मीडिया की दुनिया को , चाहे वह सामान्य रूप से हमें प्रभावित करने वाले डिजिटल दुनिया हो , उनकी कलम उ...

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