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हरिशंकर राढ़ी को दीपशिखा वक्रोक्ति सम्मान

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कहते हैं बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से खाय! अगर आदमी ढंग का हो, तो उसे अपमान भी ढंग का मिलता है, लेकिन जब आदमी ही ढंग का नहीं होगा तो सम्मान भी उसे कोई कहां से ढंग का देगा. पिछले दिनों कुछ ऐसी ही बात भाई हरिशंकर राढ़ी के साथ हुई. ज़िन्दगी भर इनसे-उनसे सबसे रार फैलाते रहे तो कोई पुरस्कार भी उन्हें ढंग का क्यों देने लगा! हाल ही में उन्हें देवनगरी कहे जाने वाले हरिद्वार में एक ऐसे पुरस्कार से नवाजा गया जिसका नाम दीपशिखा वक्रोक्ति सम्मान है.   यह सम्मान उन्हें हरिद्वार में दीपशिखा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच,ज्ञानोदय अकादमी के एक आयोजन में दिया गया. आचार्य राधेश्याम सेमवाल की अध्यक्षता में दो सत्रों में हुए इसी आयोजन में शायर जनाब अजय अज्ञात को भी दीपशिखा इकबाल सम्मान से नवाजा गया. आयोजन के दूसरे सत्र में कवि गोष्ठी भी हुई. निर्मला छावनी में हुए इस पूरे कार्यक्रम का संचालन कवि-कहानीकार के एल दिवान ने किया. हरिशंकर राढ़ी का स्वागत दीपशिखा मंच के अध्यक्ष डॉ. शिवचरण विद्यालंकार ने किया. श्री के0 एल0 दिवान ने अपने स्वागत भाषण में हरिशंकर राढ़ी को परसाई परम्परा का समर्थ वाहक बताते हुए कहा क...

मेरा गाँव मेरा देश !

[] राकेश 'सोहम' पिछले दिनों बारिश शुरू हुई । बारिश का मौसम है । लेकिन मेंढकों की टर्र टर्र सुनाई नहीं दी ? सिक्सटीज़ - सेवटीज़ में एक फिल्म रिलीज़ हुई - मेरा गाँव मेरा देश । यह एक डाकू की पृष्ठभूमि पर आधारित खूबसूरत फिल्म है । धर्मेन्द्र ने गाँव के नौजवान और विनोद्खन्ना ने डाकू जब्बर सिंह का किरदार निभाया है । इस फिल्म का वह दृश्य याद करें जब रात को डाकू जब्बर सिंह ने धर्मेन्द्र को अपने अड्डे पर रस्सी से बांधकर कैद कर रखा है । बैकग्राउंड में झींगुर और मेंढकों के टर टराने की आवाज़ दृश्य को भयानक बना रही है । जब्बर सिंह धर्मेन्द्र को मारना चाहता है लेकिन तभी उसकी सहायक खलनायिका बिजली सामने आती है और अपने तरीके से मारने की बात रखती है । डाकू जब्बर सिंह मान जाता है और खुश होकर अट्टहास लगाता है । बिजली हाथ में चाक़ू थामे धर्मेन्द्र पर हमला करने आती है लेकिन गबरू नौज़वान पर रीझ जाती है और मदहोश होकर थिरकने लगती है । उसके होंठों से लताजी का मखमली गीत फूट पड़ता है - 'मार दिया जाए कि छोड़ दिया जाए बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाए ?' जंगल की प्राकृतिक खामोशी में यह गाना क्या मस्त कर...

खून देने से कमजोरी आती है !!!

रक्त दान जीवन दान ! क्या यह शब्द समूह केवल एक वाक्य है ? क्या अब भी बहुतायत इसे केवल एक नारे की तरह उच्चारते हैं ? शायद हाँ । दो दिन पूर्व शहर के एक सरकारी अस्पताल में एक पति ने प्रसव के लिए अपनी पत्नि को भर्ती किया । पत्नि की शल्य क्रिया के दौरान ओ पाजिटिव रक्त की ज़रुरत थी । भाग्य से उसके पति का रक्त भी ओ पाजिटिव निकला । लेकिन पति ने रक्त देने से मना कर दिया ! उसका कहना था कि खून देने से कमजोरी आती है । अभागी पत्नि का भाग्य दुर्भाग्य में बदलते देर न लगी । उसके पति ने ही उसे रक्त दान करने से मना कर दिया तो चिकित्सक भौचक्के रह गए ! वह बार-बार दलील देता रहा कि वह कमज़ोर नहीं होना चाहता । पैथालौज़ी के कर्मचारियों ने जब रक्त देते अन्य अनेक का उदाहरण दिखाया तब जाकर वह माना । जागरूकता का आलाप छेड़ने वाले आला अधिकारी पहले खुद जागें ताकि जागरूकता की अलख की रौशनी तमाम सोये हुओं तक पहुँच सके । केवल मंत्र सा उच्चारती 'रक्त दान जीवन दान' वाली इलेक्ट्रोनिक मशीन लगा देने से मनोरंजन होता है और जेबें भरती हैं बस !!!

भाषाई आत्मा

--हरिशंकर राढ़ी भोजपुरी गानों की चर्चा हुई तो मेरी पिछली पोस्ट पर दो टिप्पणियाँ ऐसी आईं कि यह नई पोस्ट डालने के लिए मुझे विवश होना पड़ा।हालांकि इन टिप्पणियों में विरोधात्मक कुछ भी नहीं है किन्तु मुझे लगता है कि इस पर कुछ और लिखा जाना चाहिए। एक टिप्पणी में रंजना जी ने भोजपुरी गीतों में बढती फूहडता पर चिन्तित नजर आती हैं तो दूसरी टिप्पणी में सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी मनोज तिवारी मृदुल का नाम न लिए जाने को शायद मेरी भूल मानते हैं किन्तु वे स्वयं ही उस बात पर आ जाते हैं जिसकी वजह से मैंने उनका नाम नहीं लिया । इसमें संदेह नहीं कि मनोज तिवारी मृदुल आज भोजपुरी के एक बड़े स्टार हैं। अब बड़े स्टार हैं तो बड़ा कलाकार भी मानना ही पड़ेगा । भोजपुरी का उन्होंने काफी प्रचार-प्रसार किया है। भोजपुरी में पॉप संगीत का प्रथम प्रयोग करने वाले वे संभवतः पहले गायक हैं( बगल वाली जान मारेलीं )और बहुत लोकप्रिय भी हैं। मेरी जानकारी के अनुसार उनकी लोकप्रियता का ग्राफ शारदा सिन्हा और भरत शर्मा से कहीं ऊपर है। पर मैं यह बड़े विश्वाश से कह सकता हूँ कि उनके आज के गीतों में भोजपुरी की आत्मा नहीं बसती। एक समय थ...

ओकरे किरुआ परी

-- हरि शंकर राढ़ी उस समय लगभग साढ़े बारह बज रहे थे। धूप अपने पूरे यौवन पर थी। गर्मी से बुरा हाल था लेकिन इस सांस्कृतिक नगरी में बिजली गुल थी । भूख लगी हुई थी और हम खाना खाने एक होटल में गए। उसका इनवर्टर फेल हो चुका था और जेनेरेटर था नहीं । गर्मी से बैठा नहीं जा रहा था और हम अपनी भूख लेकर वापस आ गए। चारो तरफ जेनेरेटर दनदना रहे थे। रिक्शे पर बैठे और हम कैण्ट की तरफ चल दिए और उसी के साथ मेरे विचारों की श्रृंखला भी। पूरे यूपी में बिजली का बुरा हाल है और हम कहते हैं कि बड़ा विकास हुआ है। अब तो विकास दिखता नहीं , दिखाया जाता है। विकास के आंकड़ों से विकास सिद्ध किया जाता है।विकास हुआ कितना है यह तो भुक्तभोगी ही जानता है। मुझे याद है, मेरे गांव का विद्युतीकरण वर्ष १९८८ में हुआ था और वह भी व्यक्तिगत प्रयासों से ।उस दौरान बीस से बाइस घंटे बिजली रहा करती थी। न्यूनतम १८ घंटे तो रहती ही थी और कभी-कभी तो २४ घंटे भी मिल जाती थी । सरकार कह सकती है कि तब आबादी कम थी । तर्क ढॅँूढ लेना कोई बहुत मुश्किल कार्य नहीं होता ।आबादी बढ ी है पर बिजली की खपत व्यक्तिगत रूप में कम ,पारिवारिक रूप में ज्यादा होती...

काशी में एक दिन

---हरिशंकर राढ़ी गेस्ट हाउस में नहा - धोकर लगभग ११ बजे हम काशी विश्वनाथ जी के दर्शन के लिए चल पड़े। काशी में रिक्शे अभी बहुत चलते हैं, भले ही स्वचालित वाहनों की संखया असीमित होती जा रही हो। रिक्शे की सवारी का अपना अलग आनन्द और महत्त्व है। इधर रिक्शा चला और उधर विचारों की श्रृंखला शुरू हो गई। काशी यानी वाराणसी अर्थात बाबा विश्वनाथ की नगरी। उत्तर भारत की सांस्कृतिक राजधानी। एक ऐसा विलक्षण शहर जहाँ लोग जीने ही नहीं मरने भी आते हैं। मेरी दृष्टि में यह विश्व का ऐसा इकलौता शहर होगा जहाँ पर मरने का इतना महत्त्व है। इस शहर का इतिहास उतना ही पुराना है जितनी कि भारतीय संस्कृति। कितना पीछे जाएं ? सतयुग तक का प्रमाण तो हरिश्चंद की कथाओं में ही मिल जाता है। पौराणिक मान्यताओं पर विश्वास करें तो भोले नाथ की नगरी स्वयं भोलेनाथ ने ही बसाई थी। या तो वे कैलाश पर रहते या फिर काशी में । एक मित्र के मजाक को लें तो यह बाबा भोलेनाथ की शीतकालीन राजधानी थी क्योंकि शीतकाल में तो कैलाश पर रहने लायक ही नहीं होता। बनारस एक स्थान नहीं, एक संस्कृति का नाम है- ज्ञान की संस्कृति, अध्यात्म की संस्क...

यात्रा क्षेपक

--हरिशंकर राढ़ी मैं अपनी यात्रा जारी रखता किन्तु न जाने इस बार मेरा सोचा ठीक से चल नहीं रहा है। व्यवधान हैं कि चिपक कर बैठ गए हैं। खैर, मैं कोडाईकैनाल से मदुराई पहुँचूँ और आगे की यात्रा का अनुभव आपसे बांटूं , इस बीच में एक क्षेपक और जुड़ जाता है। इस क्षेपक का अनुभव और अनुभूतियां मुझे उस लम्बी यात्रा को रोककर बीच में ही एक और प्रसंग डालने पर बाध्य कर रही हैं। ऐसा कुछ खास भी नहीं हुआ है। बात इतनी सी है कि इस बार भी गर्मियों में गाँव जाना ही था। दिल्ली से पूर्वी उत्तर प्रदेश की यात्रा , ट्रेन की भीड -भाड , मारा-मारी , भागमभाग और उबालती गर्मी भी इस वार्षिक यात्रा को रोक नहीं पाते। आरक्षण लेने में थोड़ी सी देर हो गर्ई।हालांकि इसे देर मानना ठीक नहीं होगा। अभी भी निश्चित यात्रा तिथि में ढाई माह से ज्यादा का समय था। पता नहीं रेल मंत्रालय को ऐसा क्यों लगता है कि लोग अपने जीवन की सारी यात्राओं की समय सारणी बनाकर बैठे हैं और अग्रिम आरक्षण की समय सीमा तीन माह कर देना लोगों के हित में रहेगा! शायद पूर्व रेलमंत्री श्री लालू प्रसाद यादव का तथाकथित कुशल प्रबंधन यही हो। तीन माह पहले ही ही जनता के ...

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