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परमाणु करार का सच - 1

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माकपा के पोलित ब्यूरो ने पार्टी नेतृत्व को यह फैसला लेने का हक दे दिया कि यूपीए सरकार को मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए. क्या होगा यह तो बाद की बात है, लेकिन यह बात गौर किए जाने की है कि पार्टी नेतृत्व ने पोलित ब्यूरो से तब ऐसा कोई हक मांगने की जरूरत नहीं समझी जब उसकी सहानुभूति का केंद्रीय वर्ग (लक्ष्य समूह इसलिए नहीं कह रहा हूँ क्योंकि यह पूंजीवादी कोष का शब्द है) यानी सर्वहारा अपने को सबसे ज्यादा तबाह, थका-हरा और सर्वहारा महसूस कर रहा था. महंगाई और बेकारी, ये दो ऎसी मुसीबतें हैं जो इस वर्ग को जमींदोज कर देने के लिए काफी हैं और यूपीए सरकार के कार्यकाल में ये दोनों चीजें बेहिसाब बढ़ी हैं. ऐसा नहीं है कि अब ये घट गई हैं या नहीं बढ़ रही हैं, पर कामरेड लोगों ने इन मसलों पर थोडा-बहुत फूं-फां करने के अलावा और कुछ किया नहीं. यह बात भी सुनिश्चित हो गई कि परमाणु करार वाले मसले पर भी ये लोग इससे ज्यादा कुछ करेंगे नहीं. प्रकाश करात ने कह दिया है कि हम सरकार अस्थिर करने के पक्ष में नहीं है, लेकिन इसके बाद भी सरकार को करार पर कदम बढाने से पहले अपने भविष्य का भी फैसला करना होगा. सवाल यह है कि जब आप ...

हम ठहरे विश्वगुरू

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चाय की गुमटी पर बैठे-बैठे ही अच्छी-खासी बहस छिड़ गई और सलाहू एकदम फायर. सारे बवेले की जड़ में हमेशा की तरह इस बार भी मौजूद था मास्टर. कभी-कभी तो मुझे लगता है इस देश में विवादों की ढ़ेर की वजह यहाँ मास्टरों की बहुतायत ही है. ज्यादा विवाद हमारे यहाँ इसीलिए हैं क्योंकि यहाँ मास्टर बहुत ज्यादा हैं. एक ढूँढो हजार मिलते हैं. केवल स्कूल मास्टर ही नहीं, ट्यूशन मास्टर, दर्जी मास्टर, बैंड मास्टर, बिजली मास्टर ..... अरे कौन-कौन से मास्टर कहें! जहाँ देखिए वहीँ मास्टर और इतने मास्टरों के होने के बावजूद पढ़ाई रोजगार की तरह बिल्कुल नदारद. तुर्रा यह कि इसके बाद भी भारत का विश्वगुरू का तमगा अपनी जगह बरकरार. ये अलग बात है कि मेरे अलावा और कोई इस बात को मानने के लिए तैयार न हो, पर चाहूँ तो मैं खुद भी अपने को विश्वगुरू मान सकता हूँ. अरे भाई मैं अपने को कुछ मानूं या कहूं, कोई क्या कर लेगा? हमारे यहाँ तो केकेएमएफ (खींच-खांच के मेट्रिक फेल) लोग भी अपने को एमडी बताते हैं और कैंसर से लेकर एड्स तक का इलाज करते हैं और कोई उनकी डिग्री चेक करने की जरूरत भी नहीं समझता. तो विश्वगुरू बनने की तो कोई डिग्री भी नहीं होती...

अखबार की बातें

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है मन में इनकार की बातें ऊपर से इकरार की बातें मतलब की है दुनिया सारी हर जगहा व्यापार की बातें हो भद्दी सी गाली कहते हैं प्यारी सरकार की बातें हत्या लूट डकैती चोरी यह सब है अखबार की बातें आये सुकूं जो बातें सुनकर मुद्दत हो गईं यार की बातें गुल गुलशन गुलफ़ाम की बातें आओ कर लें प्यार की बातें रतन

फिर क्या कहना ?

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लोकतंत्र में अपराधी को माल्यार्पण फिर क्या कहना ? जेल से आकर जनसेवा का शपथग्रहण फिर क्या कहना ? जिनके हाथ मे ख़ून के धब्बे चौरासी के दंगो के- बापू की प्रतिमा का उनसे अनावरण फिर क्या कहना ? एक विधेयक लाभों के पद पर बैठाने की खातिर। लाभरहित सूची मे उसका नामकरण फिर क्या कहना ? फाँसी पर झूले थे कितने जिस आज़ादी की खातिर - सिर्फ दाबती खादी ही के आज चरण फिर क्या कहना ? बार बार मैं दिखलाता हूँ अपने हाथों मे लेकर - नहीं देखते अपना चेहरा ले दर्पण फिर क्या कहना ? विनय ओझा स्नेहिल

बन टांगिया मजदूरों की दुर्दशा

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सरकारें देश भर में वृक्षारोपण के लिए करोडो रुपये खर्च करती है, लेकिन वन समाप्त होते जा रहे हैं. वनों को लगाने वाले बन टांगिया मजदूरों का आज बुरा हाल है जिन्होंने अंग्रेजों के ज़माने मे गोरखपुर मंडल को पेड लगाकर हरा भरा किया था. मंडल मे ३५ हजार से अधिक बन टांगिया मजदूर अपने ही देश मे निर्वासित जीवन जीने को विवश हैं. उन्हें राशनकार्ड, बेसिक शिक्षा,पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नही हैं.आख़िर स्वतंत्र भारत में भी ये परतंत्र हैं. घर के मारल बन मे गइली, बन में लागल आग. बन बेचारा का करे , करमवे फूटल बाय. ये अभिव्यक्ति एक बन टांगिया किसान की सहज अभिव्यक्ति है। महाराजगंज और गोरखपुर जिले के ४५१५ परिवारों के ३५ हजार बन टांगिया किसान दोनो जिलों के जंगलों मे आबाद हैं. नौ दशक पहले इनके पुरखों ने जंगल लगाने के लिए यहाँ डेरा डाला था. इस समय इनकी चौथी पीढ़ी चल रही है. सुविधाविहिन हालत मे घने जंगलों कि छाव मे इनकी तीन पीढी गुजर चुकी है. इनके गाव राजस्व गावं नही हैं इसलिये इन्हें सरकार की किसी योजना का लाभ नही मिलता है. हम स्वतंत्रता की ६० वी वर्षगांठ मना चुके , लेकिन अपने ही देश मे बन टांगिया मजदू...

रू-ब-रू पाया

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तुमको अपने है चारसू पाया पल में इन्सान और जादू पाया मौत तुमको भी है पसंद नहीं जींद की तुझमें आरजू पाया सबकी खातिर है तेरे दिल में जगह न जुबां पर है दू-ब-दू पाया सीधे कहते हैं सब तुम्हें लेकिन मैंने तुझमें वो जन्गजू पाया बताएं किसको तेरे बारे में हर मुसीबत में चाह्जू पाया बदल चुकी है ये सारी दुनिया पर तुम्हें मैंने हू-ब-हू पाया मैं जानता हूँ कि हो योजन दूर यार तुमको है कू-ब-कू पाया सभी कहते हैं तुम जहाँ में नहीं याद जब आई रू-ब-रू पाया रतन

ख्वाहिश

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सिर्फ चाहे से पूरी कोई भी ख्वाहिश नहीं होती. जैसे तपते मरुस्थल के कहे बारिश नहीं होती.. हमारे हौसलों की जड़ें यूँ मज़बूत न होतीं - मेरे ऊपर जो तूफानों की नवाज़िश नहीं होती. . हमे मालूम है फिर भी सँजोकर दिल मे रखते हैं- जहाँ मे पूरी हर एक दिल की फरमाइश नहीं होती. . कामयाबी का सेहरा आज उनके सिर नहीं बंधता - पास जिनके कोई ऊँची सी सिफारिश नहीं होती. . हज़ारों आंसुओं के वो समंदर लाँघ डाले हैं- दूर तक तैरने की जिनमे गुंजाइश नहीं होती. . खुदा जब नापता है तो वो फीता दिल पे रखता है- उससे इन्सान की जेबों से पैमाइश नहीं होती.. -विनय ओझा स्नेहिल

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