इष्ट देव सांकृत्यायन 

भूमिका लिखे बिना उपसंहार करते हो
एक ही ग़लती तुम बार-बार करते हो
जिनके नकद का भी नहीं भरोसा कोई
कैसे सौदागर हो, उन पर उधार करते हो
जिगर का ख़ून ही जिस ख़ून की पहचान है
उनके वादे पर तुम ऐतबार करते हो
सुधरने का ख़याल ही हराम है जिन पर
किस तरह उनसे उम्मीद-ए-सुधार करते हो
जिनके रग-रग में भरा है फ़रेब केवल
हद है, उनसे दोस्तों सा करार करते हो
बजा रहे हो सिर्फ़ एक हाथ से ताली
अहमक हो, ये कैसा व्यवहार करते हो.



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