फाल्गुन आया रे !

गोरी को बहकाने
फाल्गुन आया रे ।
रंगों के गुब्बारे
फूट रहे तन आँगन,
हाथ रचे मेंहदी के
याद आते साजन ॥
प्रेम-रस बरसाने
फाल्गुन आया रे ।
यौवन की पिचकारी
चंचल सा मन,
नयनों से रंग कलश
छलकाता तन ॥
तन-मन को भरमाने
फाल्गुन आया रे ।
[] राकेश 'सोहम'
आ गया है. स्वागतम
ReplyDeleteगली-गली में घूम रहीं हैं, हुलियारों की टोली।
ReplyDeleteनाच उठी चञ्चल नयनों में, रंगों की रंगोली।।
उड़ते हैं अम्बर में गुलाल,
नभ-धरा हो गये लाल-लाल,
गोरी का बदरंग हाल, थिरकी है हँसी-ठिठोली।
नाच उठी चञ्चल नयनों में, रंगों की रंगोली।।
बहुत अच्छी प्रस्तुति।
ReplyDeleteइसे 20.02.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/
गोरी को बहकाने
ReplyDeleteतन-मन को भरमाने
फाल्गुन आया रे ।
बहुत सामयिक रचना...आभार.
Bahut acchi rachna..
ReplyDeleteआ गया फ़ागुन, झंकार होने लगी है।
ReplyDeleteफागुनी रंगों की अद्भुद छटा बिखेरती सरस मुग्धकारी रचना....
ReplyDeleteपढवाने के लिए बहुत बहुत आभार...