लादेनवादियों के लिये नो लास गेम

जंग में अपनी जमीन पर किये हमले की रणनीति का पूरा लाभ उठाया है इस बार लादेनवादियों ने। 12 नकाबपोश थे और इस बार एक भी हाथ नहीं लगे। लादेनवादियों के लिये यह नो लास गेम था। उनके सामने पाकिस्तान प्रशासन पंगु है और वो जानते हैं कि अपनी जमीन पर कैसे हमला किया जाता है। यह आधुनिक गुरिल्ला स्टाइल का नकाबबंद हमला है, जो सवालों का अंबार खड़ा करता है और इन सवालों के जवाब लादेन और मुल्ला ओमर जुड़े हुये हैं, जिन्होंने इस्लाम की एक धारा को तालिबान के रूप में अफगानिस्तान में सफलतापूर्वक स्थापित किया था और आज भी इस्लाम से जुड़ा एक तबका इस धारा से संचालित हो रहा है। अपने ब्लाग कला जगत पर डाक्टर उत्तमा ने अफगानिस्तान में तालिबानी उफान में एक गंभीर आलेख लिखा है,किस तरह से तालिबानी अफगानिस्तान में कला और कलाकारों को ध्वस्त कर रहे हैं। श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर हमला और अफगानिस्तान के इलाकों में कला को जमीन से उखाड़ने की रणनीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, दोनों सभ्यता पर चोट है, एक सभ्यता के वर्तमान रूप पर दो दूसरा इसके विगत पर। लादेनवाद की धारा अफगानिस्तान से निकल कर पाकिस्तान पहुंच चुकी है और वहां की सरकार, चाहे जिसकी भी हो, इस धारा के आगे विवश है। यदि लोग दूसरे देश की क्रिकेट टीम को निशाना बना सकेत हैं तो वहां की सरकार में बैठा कोई भी व्यक्ति इनकी पहुंच से बाहर नहीं है। इस हमला के बाद पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर ने कहा है, ये साधारण हमलावर नहीं,बल्कि प्रशिक्षित अपराधी थे। एसा करते हुये वे थोड़ी सी चूक कर गये। वे प्रशिक्षित तो थे पर अपराधी नहीं। वे एक टारगेट को हिट कर रहे थे, और इस टारगेट का आयाम अंतरराष्ट्रीय मंच से जुड़ा हुआ था। इस टारगेट में अंतरराष्ट्रीय स्तर के कई क्रिकेटर थे, जिनके जलवों से पूरा क्रिकेट जगत झूमता रहा है। इनके टारगेट पर विश्व समुदाय का क्रिमी लेयर था, दुनिया के ए क्लास के सिटीजन। यदि सब का सफाया हो जाता तो विश्व समुदाय सकते में पड़ सकता था, श्रीलंका और पाकिस्तान की तो सांसे ही थम जाती, कूटनीतिक मोर्चे पर चाहे वे जो कसरत करते। पाकिस्तान में तालिबानी कभी भी अपनी सरकार की घोषणा कर सकते हैं,इस बात से इनकार करना अपने आप को मुगालते में रखने जैसा है। अमेरिका से बुश के जाने के बाद भारतीय उप महाद्वीप में तालिबान खुलकर के नंगा नाच करने लगा है। पाकिस्तान पर यदि घोषित रूप से वो काबिज हो जाते हैं तो आणविक बटन भी उनके हाथ में चला जाएगा,और इसका इस्तेमाल वो भारत पर जरूर करेंगे। इसके पहले कि तालिबानी यहां तक पहुंचे, भारत को अपनी आंतरिक सुरक्षा को चाक चौबंद करते हुये एक आक्रमक विदेश नीति के तहत पाकिस्तान में हस्तक्षेप करने के लिए तैयार होना होगा, क्योंकि पाकिस्तान में तालिबान का उत्थान सीधे भारत की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। पाकिस्तान सरकार तालिबान पर काबू पाने में अक्षम है, या फिर यह मान लिया जाये कि पाकिस्तान की सत्ता से तालिबान कुछ कदम की दूरी पर हैं। मुंबई से लेकर लाहौर में होने वाले हमलों में जिस तरह से छोटे बड़े इस्लामिक संगठनों के नाम उछाले जा रहे हैं वह एक तरह से भारतीय जनता को दिगभ्रमित करने वाले हैं। इन सभी संगठनों को समग्र रूप में देखने की जरूरत है। ये सभी संगठने तालिबान के ही ब्रांच हैं, जो विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में विभिन्न तरीके से एक उद्देश्य विशेष के लिये सक्रिय हैं और इनका एक मात्र उद्देश्य हैं लंबा समय तक संघर्ष करते हुये पूरी दुनिया में इस्लाम का पताका फहराना। इस्लाम की इस धारा की आलोचना करने में मात्र से यह धारा कुंद नहीं होगी, क्योंकि यह धारा व्यवहारिकतौर पर विश्व के किसी भी हिस्से पर अपना खौफनाक रूप दिखाने में सक्षम है। इस पर काबू पाने के लिए पहली शर्त है इस हकीकत को स्वीकार करना। तभी इसके खिलाफ लोगो को कमर कसने के लिए तैयार किया जा सकता है। लादेनवादियों ने राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर पूरी दुनिया को रणभूणि में तब्दील कर दिया है। हमें अपनी जमीन और अपने लोगों की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम करने की जरूरत है।

Comments

  1. ऊपर वाला न करे ऐसा हो .

    जगाने -जागने में काफी देर तो नहीं हूई? ,भारत को ऐसी स्थिति में एकजूट रखना मुख्य लक्ष्य होना चाहिए ,क्योकि भारत पर बुरी नज़र करने से पहले ये सबसे पहले फ़ुट डाल कमज़ोर करना चाहेंगे जो की देश में पहले से छुपे बैठे उनके आतंकी और एजेंट कर सकते हैं ,गुर्रिला युद्ध ने ताकतवर सोविअत संघ को तोड़ दिया और अमेरिका को थका दिया इसीलिए भारत को समयपूर्व सचेत हो विश्व समुदाय को लामबंद करना शुरू कर देना चाहिए . बर्बर अधकपारियों के हाथों में आणविक हथियार विश्व समुदाय की भी चिंता का विषय है और पाकिस्तान ने भारत पर पटकने के लिए कितने सैकड़े बोम्ब बना के रखे हैं कोई नहीं कह सकता .


    isi ,सेना और राजनैतिक कट्टरपंथी जमातों में से कौन कौन आतंकवादियों के साथ है या उसके दबाव में है कुछ भी कहा नहीं जा सकता .इनके द्वारा २६ /ii के ई मेल भले ही फर्जी नाम से हो पर इनकी मनसा को दर्शाता था ,ये लोग हमे स्तब्ध कर रख देने के लिए मौके की फिराक में होंगे जब मंदी से जूझ रहे देश के नेता हड्डियों के लिए भूकने-काटने में मशगूल हों . कौन जानता है उसी समय पाकिस्तानी सरकार कश्मीर से लगे प्रान्तों को भी आतंकवादियों को समर्पित कर दे और हमारी सीधी टक्कर हो जाए ?
    पहले से ही डर है कि पपडी बन चुकी पाकिस्तानइ लोकतंत्र फिर कब उखड जाए कौन जनता है?

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  2. २६-II को अंजाम दे ये लोग हमारी तैयारी भांप चुके हैं .

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  3. बिल्कुल सच्चे खतरे की ओर आपने इशारा किया है। मैं भी इस खतरे को काफी समय से महसूस कर रहा हूँ। हमारे देश के नेता इस खुशफहमी में जी रहे हैं कि अमेरिका पाकिस्तान से तालिबान का सफाया कर देगा और हमें कुछ करना ही नहीं पड़ेगा। असलियत यह है कि अमेरिका अफगानिस्तान की गलती को दुहराने का दुस्साहस/मूर्खता नहीं करेगा। बल्कि वह तो चाहता है कि भारत अब इस इस्लामी आतंकवाद से लड़ाई में खुलकर शामिल हो जाय और वह अपनी सेना को धीरे-धीरे वापस ले जा सके।

    भारत में मुसलमानों की संख्या पाकिस्तान से भी अधिक है। लेकिन इनमें से बहुत बड़ी संख्या ऐसी है जो कट्टर तालिबानी इस्लाम को अच्छा समझ कर उसके प्रति मौन सहमति और समर्थन का भाव रखती है। ऐसे देशद्रोहियों से सबसे पहले निपटना होगा। दुर्भाग्य से ऐसे तत्वों की पहुँच राजनीति के गलियारों में भी हो गयी है।

    असल संकट भीतर से ही है। इससे उबरने के लिए कट्टर इस्लामी तत्वों के विरुद्ध आन्दोलन करना होगा। तथाकथित सेकुलर पार्टियाँ तो इनके वोट के लिए नतमस्तक हो देशद्रोह के इस खेल में शामिल हो चुकी हैं।

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  4. सिद्धार्थ जी भारत का एक और विभाजन न चाहते हों तो मान लीजिये कि हिन्दु और मुस्लिम शब्द गाली है . पता नहीं हो सकता है लादेनवाद का जवाब या तो माओवाद में या कट्टर मानवतावाद में हो .
    अधकपारी भगवा अतिवादियों की हर हरकत अदूरदर्शितापूर्ण घटिया रणनीति से ग्रसित होती है. पता नहीं लादेंप्रेमियों के खिलाफ आपके प्रत्यक्ष आन्दोलन के विचार से विपरीत असर हो ? . यहाँ कुटिलता एवं त्वरितता फायदेमंद हो सकता है ?. पता नहीं लादेनवाद कि बर्बरता का महिमामंडन कर हर समुदाय कि औरतों को आगे कर देने से कुछ काम बने ?.

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  5. बांग्लादेश से जुड़ी हुई भारत की सीमाओं की स्थिति चौकाने वाली है...लादेनवादियों के लिये यह बहुत बड़ा बेस लो सकता है...और इस सीमा पर उनका ध्यान ना नहीं हो एसा नहीं हो सकता...देश के दोनों ओर की सीमायें घिरी हुई है...और एक बार जब दोनों सीमायें डिस्टर्ब होंगी तो इसे संभाल पाना मुश्किल होगा...लादेनवाद से मुकाबला करने के लिए बेहतर होगा यहां के लोगों को तैयार किया जाये...पीढी दर पीढ़ी...एसी कुछ व्यवस्था बनती दिख नहीं रही है...सरकार के भरोसे बैठा नहीं जा सकता....उन्हें लादेनवादी कभी अपने सामने झुकने पर मजबूर कर सकते हैं...यदि 100 लोगों की टुकड़ी भारत में घुस गई तो फिर संभले नहीं संभलेगी...और उनके लिए यह बायें हाथ का खेल है....संसद पर वे हमला कर चुके हैं, मुंबई में भी अपना करिश्मा दिखा चुके हैं...यह जबरदस्त खतरा है....इधर से अनदेखी करने की कीमत भावी भारत को चुकाना पड़ेगा...वर्तमान तो चुका ही रहा है...इससे बचने के लिए नकारात्मक आंदोलन की जरूरत नहीं है...सकारात्मक तरीके से लोगों को जोड़ना होगा...आवाम को सेना के रूप में तब्दील करना होगा...और यह करते रहना होगा..इनसे जंग अनिवार्य है, इसकी तैयारी करनी ही होगी...यह जंग अपने लोगों की सुरक्षा और देश में शांति के नाम पर होगी...जो इस हकीकत को नहीं देख रहा है...वह या तो कायर है या फिर गद्दार...लादेनवाद के खिलाफ गोलबंदी करनी ही होगी...नहीं तो स्वात की घाटी की हवा यहां भी फैल सकती है....

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