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Showing posts from November, 2019

काहिवि : राष्ट्रपति को पत्र

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विजय झा काशी हिंदू विश्वविद्यालय के धर्म संकाय में गलत ढंग से एक अवांछित व्यक्ति की नियुक्ति के खिलाफ देश के 50 संस्कृत के मूर्धन्य विद्वानों ने राष्ट्रपति के पत्र लिखा है। पत्र लिखने वाले वो महान विभूति हैं , जिन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय समेत देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों में संस्कृत विभाग की स्थापना कराया। बीएचयू के धर्म संकाय में प्रोफेसर रहे विद्वानों के भी हस्ताक्षर है। धर्म संकाय से जाना तो इस प्रोफेसर का निश्चित है , बस इसके संरक्षक अपनी किरकिरी कराकर इसे बिदा करेंगे। © विजय झा फेसबुक वॉल से 

काहिवि : आवाज उठाओ

राजेश राय  बीएचयू प्रकरण पर आज बोलना ज़रूरी इसलिए हो गया कि 25-30 साल बाद जब बच्चे पूछें कि ‘ महामना के मंदिर ‘ को जब तोड़ने का कुचक्र रचा जा रहा था तब आप कहाँ थे ? और तब हम जबाब दे सकें। हिन्दू संगठन और सनातन धर्म के कार्य को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से पूज्य मालवीय जी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डा़ हेडगेवार जी और बाद में द्वितीय सरसंघ चालक बने माधव सदाशिव गोलवरकर जी को बुलाकर संघ कार्यालय खोलने के लिए बीएचयू परिसर में ला कालेज के पास दो भवन दिया था। आरएसएस कार्यालय का उन्होंने स्वयं शुभारंभ किया था। कांग्रेसियों और वामपंथियों के दबाब में ७५ में इमरजेंसी के दौरान तत्कालीन कुलपति कालूलाल श्रीमाली ने रातोंरात संघ कार्यालय का वह भवन गिरवा कर समतल करवा दिया था। तब से कई बार भाजपा व संघ समर्थित सरकारें आईं , पर संघ बीएचयू परिसर में अपना भवन ले नहीं पाया। आज फिर कुछ उसी तरह का धुंआ उठा है ,  मालवीय जी द्वारा सनातन धर्म की परम्पराओं के रक्षार्थ स्थापित संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय को वामपंथी और कांग्रेसी विचाराधारा के आचार्यों द्वारा तहस नहस किए

बीएचयू: पद तो ओबीसी का था

सर्वेश तिवारी श्रीमुख  तथ्यों के बीच एक तथ्य यह भी है कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के "संस्कृत धर्म विज्ञान संकाय" के जिस पद पर श्रीमान खान साहब नियुक्त हुए हैं , वह ओबीसी के लिए रिजर्व पद है। उस पद के लिए कुल सत्ताईस आवेदन पड़े थे , जिनमें छब्बीस हिन्दू लोगों के थे। यादव , पटेल , चौधरी , प्रसाद , सिंह आदि... एक व्यक्ति गैर हिन्दू थे , श्रीमान खान साहब। सेक्युलरिज्म का ताव देखिये , सारे ओबीसी वाले हिन्दू छांट दिए गए और खान साहब सेलेक्ट हो गए। चयन समिति ने छब्बीस लोगों को दस में से दो-दो नम्बर दिया था , और खान साहब को दस में से दस... कैसे न हो! कुलाधिपति महोदय को अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में जो लिखवाना है। और अब षड्यंत्र का स्तर देखिये , विरोध शुरू होते ही सबसे पहले वामपंथी मीडिया ने लोगों के दिमाग में यह बैठा दिया कि ब्राह्मण अपने लिए विरोध कर रहे हैं। ब्राह्मण उस पद पर स्वयं के अतिरिक्त किसी अन्य को देखना ही नहीं चाहते... यह विरोध ब्राह्मणवादी , मनुवादी कर रहे हैं। जबकि सच यह है कि उस पद पर कोई सवर्ण(कथित) उम्मीदवार ही नहीं , बल्कि वह पद सवर्णों के लिए है ही नहीं। उस प

काशी हिंदू विश्वविद्यालय और डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति

बेबाक बनारसी शिक्षा और समाज दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और एक-दूसरे को दिशा देते हैं और एक-दूसरे की दशा के लिए उत्तरदाई भी होते हैं। समाज के उत्तरोत्तर विकास और उत्थान में शिक्षा की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है और वहीं पर शिक्षा को भी नियंत्रित और संचालित करने में समाज की भूमिका रहती है और होनी चाहिए। काशी हिंदू विश्वविद्यालय इन कसौटियों पर कसा हुआ एक ऐसा विश्वविद्यालय है जिसको महामना पंडित मदनमोहन मालवीय ने इन्हीं आदर्शों और उद्देश्यों हेतु की थी। आज से तीन वर्ष पूर्व लगभग इसी समय काशी हिंदू विश्वविद्यालय में वहां की छात्राओं ने उद्वेलित होकर अपने छात्रावासों से बाहर आकर सिंहद्वार पर एकत्रित हो गईं थीं। उसी समय मैंने एक पूर्व छात्र होने के नाते मैंने एक टीवी चैनल के डिबेट में बहुत निष्पक्ष होकर कहा था कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय किसी की बपौती या संपत्ति नहीं है। न तो वह सरकार का है , न कुलपति का है , न तो छात्रों का है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय उन संस्कारों की बपौती और संपत्ति है जिसकी स्थापना महामना मालवीय ने की थी और उन संस्कारों पर समाज ने मोहर लगाई थी। आज काशी हिंदू विश्वविद्

बीएचयू विवाद

योगी अनुराग यों तो मैं उन विवादित विषयों से एकदम दूरी बना कर रखता हूँ , जिनपर स्वयं हिन्दू समाज ही एकमत न हो। किंतु अब लगता है कि ये भ्रांतिपूर्ण विवाद अपने विराट स्वरूप धारण कर रहा है। अतएव अब मौन का मार्ग दुर्गम होगा। सो , अनेकानेक प्रिय मित्रों के आग्रह पर मैं अपनी बात कहता हूँ! अव्वल तो ये प्रश्न ही भ्रामक है कि क्या एक मुस्लिम संस्कृत नहीं पढ़ा सकता ? इसपर मैं कहूँगा कि अवश्य पढ़ा सकता है। किंतु आप इस विवाद का आखेट वहाँ कर रहे हैं , जहाँ ये है ही नहीं। विवाद एक मुस्लिम द्वारा संस्कृत पढ़ाने को लेकर नहीं , बल्कि वेदांगों में से एक “ छंदशास्त्र ” को पढ़ाने का है। सो , प्रश्न का आधारभूत ढाँचा बदल लीजिए। वस्तुतः अब प्रश्न ये है : “ वैदिक विषय “ छंदशास्त्र ” का प्रवक्ता कोई मुस्लिम क्यों नहीं हो सकता ?” इस प्रश्न का उत्तर , प्रश्न की ही भाषा में निहित है। निषिद्धि को “ मुस्लिम ” शब्द के साथ इंगित कर दिया गया है। और इस्लामिक दर्शन के मुताबिक़ ये बात जमे जमाए तर्कों को पूर्णरूपेण श्रांति प्रदान करती है। “ छंदशास्त्र ” यानी कि वैदिक ऋचाओं की गेयता को सुनिश्चित करने वाला श

रेडिएशन, कटोरा और केकड़े

एक तरफ तो मोबाइल के टावरों से होने वाली रेडिएशन की बड़ी बात की जाती है. हजारों नुकसान गिनाए जाते हैं. और दूसरी तरफ हर शख्स के हाथ में दो-तीन फोन और उनमें पाँच-आठ सिम हैं. यही नहीं , सबको बहुत अच्छी कनेक्टिविटी भी चाहिए. चाहे बात करने के लिए हो या फिर सर्फिंग के लिए. बात करते वक्त आवाज़ साफ़ सुनाई देनी चाहिए , जरा सी घिचपिच नहीं होनी चाहिए , एक बार भी संपर्क नहीं टूटना चाहिए और नेट के मामले में गूगल पर कैचवर्ड डालते ही टेक्स्ट से लेकर फोटो और विडियो तक पूरा मसाला हाजिर हो जाना चाहिए. हम तो ट्रंककॉल वाली पीढ़ी से हैं. मेरी पीढ़ी के हर शख्स को ठीक से पता होगा कि हम सीधे मोबाइल पर नहीं आए. यहाँ तक कि एक से दूसरे शहर या कस्बे में बात भी लैंडलाइन फोन पर सीधे नहीं हो पाती थी. आपको अपने घर के फोन से केवल अपने शहर भर में बात करने की सुविधा थी. शहर से कहीं बाहर बात करनी हो तो पहले एक्सचेंज मिलाना पड़ता था. एक्सचेंज वाले बड़ी कृपा करके आपकी ट्रंक कॉल बुक करते थे. पता नहीं , तब एसटीडी-आइएसडी जैसी कोई व्यवस्था भी थी या नहीं. फिर एसटीडी आया. पीसीओ भी आए. पीसीओ का धंधा आया , बड़े जोर से पनपा

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